5/03/2014

एक आजाद देश का इतिहास: पुनर्पाठ

कहानी

1.आदिमपुर गांव की कथा
यह कहानी एक ऐसे गांव की है जिसने विकास की नयी ऊंचाइयों को छुआ। अंग्रेज़ी राज की गुलामी ने उसे नयी ताकत दी। ऐसी कि लोग अचम्भित रह गये। वहां के लोगों को यह ठीकठाक ज्ञात नहीं था कि उनका देश किस अक्षांश, किस महाद्वीप, किस समुद्र से कितनी दूरी पर है। हालांकि वहां का जीवन ठीक-ठीक कबीलों की जीवन नहीं था किन्तु उससे बहुत उन्नत भी नहीं था। किसी तथ्य को उस देश के नागरिक पूरी तरह पुष्टि नहीं कर सकते थे और ना ही उसकी जहमत उठाते थे। सुना है कहते हैं..शायद...लगता है, हो सकता है, संभवत: की शैली लोकप्रिय थी और कोई इसका बुरा नहीं मानता था और लोगबाग उसके अभ्यस्त थे। गांव का नाम था आदिमपुर। गांव भौगोलिक रूप से बड़ा था और किसी बड़े देश का एक टुकड़ा था। और उसकी एक रियासत थी। पशुपालन व कृषि वहां से लोगों के उद्यम का क्षेत्र था। लोग आरामतलब थे इसलिए गपोड़। आरामतलबी ने समय काटने के लिए इस कौशल को स्वत: अर्जित लिया था।
2.प्रभाव व नेतृत्व क्षमता का विकास
गप्प मारने की कला के कारण सच और झूठ का फासला यहां के लोग कब खत्म कर देते यह जानना मुश्किल था। इन यहां वार्ता में किसी प्रकार की रुकावट नहीं थी। वे कोई बात कहते तो सच अपनी बात की रोचकता में आड़े नहीं आने देते थे। वे बात करते समय यह भूल जाते थे कि सच की जमीन वे कब की पीछे छोड़ आये हैं लेकिन वे आदत से मजबूर थे। उनके लिए सच से बड़ा मूल्य बन गया था बातचीत की रोचकता। कहना न होगा कि इस कला के कारण उनकी बातचीत बेहद दिलचस्प हुआ करती थी और वह श्रोता पर अपना जबरदस्त प्रभाव डालती थी। अपनी बात से प्रभाव पैदा करने के कारण उनमें नेतृत्व क्षमता का विकास भी हुआ।
3. अंग्रेजी शासन 
उन्हें पता नहीं था कि वे लोग कौन हैं और क्यों उनके अंचल में आये पर उनका अदृश्य आगमन हुआ। वहां रेल पटरियां बिछा दी गयीं। उन्हें नहीं पता था कि कब और कैसे वे उनके मालिक बन बैठे। मालिक कौन तय करता है और किस आधार पर यह भी उन्हें पता नहीं था। उन्होंने यह भी नहीं पूछा कि तुम हम पर हुक्म बजाने वाले कौन? बस उन्होंने पाया कि कुछ लोग बड़े ही रुआब के साथ उन्हें हुक्म दे रहे थे सो उनकी बात उन्होंने मान ली। होगा कोई जो हुक्म दे रहा है.. उसे होगा अधिकार तभी तो वह जता रहा है..होगी उनमें कोई बात तभी तो वह हुक्म देने योग्य अपने आप को समझता है। वे तो ताबेदार थे और रहेंगे..हुक्म बजाना है कोई हो..गुलाम के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि मालिक कौन है...जिसमें ताब हो..आग हो..कुछ कर गुज़रने या करवाने की ख्वाहिश हो वह बने मालिक..सबसे अच्छी गुलामी की जि़न्दगी है कोई चयन नहीं.. कोई विकल्प नहीं.. कोई स्वप्न नहीं..इसलिए कोई बेचैनी भी नहीं। चैन की जि़न्दगी होती है गुलामों की..कोई तोहमत नहीं कि यह क्यों किया..ऐसे क्यों किया..यही क्यों किया..जो कहा गया था..जो तय किया गया था..जो करना चाहिए था वही किया..बस और क्या चाहिए..।
इसलिए अंग्रेज़ी राज आदिमपुर में आसानी से स्थापित हो गया। वहां के निवासी खुश थे कि वे अब पहले से अधिक ता$कतवर लोगों की प्रजा हैं। उन्होंने सुना कि अंग्रेजी राज का पूरी दुनिया में डंका बजता है। और उन्होंने अंग्रेज़ी साम्राज्य की फैली बातों को न सि$र्फ चाव से सुना बल्कि अपने मन से उसकी खूबियों के कसीदे भी काढऩे लगे। बैठे ठालों को क्या चाहिए.. दूसरों का हवाला दे वे अपने मन से अंग्रेज़ी राज की खूबियों और ताकत के बारे में बढ़चढ़ कर लंतरानियां बयान करने लगे।
लोगों की गप्पबाजी का सबसे मुफीद समय और स्थान धीरे-धीरे रेल पटरियां बन गयीं। सुबह उठकर रेल पटरियों तक जाना वहां फारिग होना और उसी दौरान डींगें हांकना उन्हें पसंद आने लगा। रेल पटरियों में सुविधा यह थी कि उन पर घास नहीं उगती थी, दूसरे कीड़े मकोड़े आदि की गुंजाइश भी कम रहती थी, पानी वगैरह जल्द नहीं पहुंचता था क्योंकि ज़मीन से कुछ ऊंची थीं। रेल पटरियों पर बैठकर गप्प मारना उन्हें इसलिए भी अच्छा लगता था क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके तार सीधे अंग्रेजी राज की तरक्की से जुड़े हैं। यह जो पटरियों के नीचे गिट्टी है और पटरियों में लगा जो फौलाद है वह कुछ विशिष्ट है और उनसे जीवंत सम्बंध उन्हें भी विशिष्ट बनाता है। पटरियों का स्पर्श उन्हें उनमें एक अजीब सी सिहरन भर देता और उनका मन करता है वे देर और बहुत देर तक रेल पटरियों पर पसरे रहें। उन्होंने यूं भी सुन रखा था कि शौच के समय ऊंचे खयाल आते हैं और यदि ऐसे में वातावरण भी मनमाफिक हो तो फिर कहने ही क्या?
जाड़े के दिनों में जब सब कुछ कोहरे में डूब जाता तब भी रेल पटरियों की पुकार उनके कदमों को रोक नहीं पाती.. और वे प्रात:काल लोटा हाथ में लिये फारिग होने वहीं पहुंच जाते। कई बार ठंड से बचने के लिए उनके कानों पर मोफलर या गमछा बंधा होता था या कनटोप होता था जिसके कारण ट्रेन के आने की आवाज या फिर उसकी सीटी सुनायी नहीं देती थी जिसके चलते हर जाड़े में आस पास के गांवों के पांच सात लोग ट्रेन से कटकर कालकवलित हो जाते थे किन्तु इसकी किसी को अफसोस नहीं। मौत तो आनी है किसी भी बहाने आये। यूं भी यहां के लोग दर्शन में गहरी रुचि लेते थे और गूढ़ से गूढ़ व्याख्या में उन्हें महारथ हासिल थी। जीवन मरण के प्रश्नों उनका दार्शनिक पहलू और प्रबल हो उठता था।
4. कबाडख़ाना
गांव में पहले कबाडख़ाना का निर्माण एक और बड़ी क्रांति लेकर आया। गांव का एक आदमी बाहर पता नहीं किन किन शहरों, देशों में रहकर लौटा तो उसने गांव में कबाडख़ाना खोल दिया.। वह एजेंट था जो दूसरे शहर अपने माल की सप्लाई करता। अब गांव के लोगों को पता चला कि दुनिया मेें कोई भी चीज बेकार नहीं जाती.हरेक का अपनी हैसियत के अनुसार मोल है। कागज, खाली बोतलें, पुराने जूते चप्पल, प्लास्टिक के टूटे मग, लोहे की बनी कोई भी टूटी फूटी चीज, लकड़ी के टुकड़े, टूटे खिलौने, पुराने कपड़े कुछ भी। कबाडख़ाने में हर चीज के लिए गुंजाइश थी और सबकी कुछ न कुछ कीमत मिलती थी। सबकी आंखें खुली, तो इस संसार में कुछ भी बेकार नहीं है, हर चीज, हर हाल में काम लायक है। आस पास के तमाम गांवों में उस कबाडख़ाने की शोहरत फैली और लोग वहां अपनी तमाम अनुपयोगी वस्तुओं के साथ पहुंचने लगे। ऐसी चीजों से जिन्हें वे व्यर्थ मानते आये थे, कुछ न कुछ मिल जाने में उन्हें असीम खुशी होती। कीमत क्या होगी उसका कोई ठिकाना नहीं था जो कबाड़वाला बोल देता वही उसकी कीमत थी..फिर भी मोल भाव करने का किसी में साहस नहीं था क्योंकि यह अपनी अनुपयोगी वस्तु को खपाने का एकमात्र और अंतिम विकल्प था। गांव वालों को बस यह पता था कि सबसे अच्छी कीमत बालों और लोहे की मिलती है। स्त्रियों के जिन बालों के खाने में पड़ जाने से लोग आगबबूला हो जाया करते थे अब हिदायत देने लगे थे कि टूटे बालों को संभाल कर रखो..जब कुछ अधिक जमा हो जायेंगे तो उसे कबाड़वाले के यहां अच्छी कीमत पर बेच दिया जायेगा।
बहरहाल, कुछ-कुछ दिन बाद कबाड़वाले के यहां कोई ट्रक आता और तमाम वस्तुएं लादकर ले जाता..और कबाड़वाले की कमाई के बारे में गांव वाले अलग-अलग अनुमान लगाते और उ्रसके भाग्य से ईष्र्या करते।वे सपने में देखते कि उनके परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर खूब बाल उग आये हैं और उन्होंने सिर मुंडवाकर खूब बाल बेचे हैं और मालामाल हो गये हैं। कभी कभी सपना बदलता और वे चारों ओर लोहा ही लोहा देखते। वे देखते कि वे लगातार लोहा ढो ढोकर कबाड़वाले के यहां पहुंचा रहे हैं और उनकी वापसी नोटों के बंडल के साथ हो रही है।
5.सूखा
गांव में सूखा पड़ा और मवेशी बिना चारे के मरने लगे। मरे हुए मवेशियों का कोई मोल नहीं था। बच्चों की सुघड़ शरीर कंकाल में बदलते जा रहे थे। स्त्रियों का सौंदर्य आभाहीन होता जा रही था और पर्याप्त भोजन न मिलने की वजह से वे स्वयं बीमारियों की गिरफ्त में जा रहे थे। इसी बीच कोहराम मच गया जब अंग्रेजी शासन ने खेतों पर मालगुजारी बढ़ाने की घोषणा कर दी और नहीं देने पर फसल जब्त करने, शारीरिक दंड, जमीन की नीलामी, जुर्माना आदि का फरमान सुना दिया। पहली बार गांव में अंग्रेजी शासन के कसाईपन पर उन्हें गुस्सा आया। पहली बार उन्हें लगा वे गुलाम हैं। वे अपना दुख दर्द किसे कहें, यह उनकी समझ के बाहर था..मालगुजारी का बढऩा अन्याय था, और प्रतिकार उन्होंने सीखा ही नहीं था।
6.लोगों की एकजुटता
गांव के लोग जो अपने आप में मस्त रहते थे और उन्हें दूसरे की बहुत अधिक जरूरत महसूस नहीं होती थी अब एकजुट होने लगे थे। पहले एकजुट होने के लिए शादी-ब्याह, मृत्यु और पारम्परिक त्यौहारों में होता था किन्तु अब यूं ही एक दूसरे से मिलने में अच्छा लगने लगा था। जहां दो लोग जुटते धीरे-धीरे जमावड़ा बढ़ता जाता था..यह सामूहिक दुख था जो उन्हें जोड़ रहा था..एक सामूहिकता उन्हें दुख से निजात पाने का रास्ता ढूंढने में कारगर साबित हो सकती थी..
7.स्वप्न को सच में बदलने का प्रस्ताव
लोहे के पहाड़ का स्वप्न देखते लोगों के सामने जब लोहे के जरिये स्थिति से लोहा लेने का प्रस्ताव आया तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गयी। तय यह हुआ कि आत्मरक्षा के लिए हर व्यक्ति कोई न कोई लोहे का औजार अपने पास रखेगा..और जिस दिन किसी को लगान न देने पर कोड़े पड़ेंगे, या जमीन की नीलामी होगी हर आदमी के हाथ में लोहा होना चाहिए..अब फैसला लोहा लेगा..यह भी तय किया गया कि अब हर जन्मने वाले बच्चे का नाम लोहा होगा..लोहा कुमारी, कुमारी लोहा, लौहप्रभा, लौहलता, लौहरमा, लोहा कुमार, लोहा प्रकाश, लोहा प्रताप इत्यादि.इत्यादि..
लेकिन लौह परायणता के निर्णय के बाद लोगों की आंखों से नींद उड़ गयी। तरह की आशंकाओं से लोगबाग कांप-कांप उठते..पता नहीं अंग्रेजी सरकार कितनी ताकतवर है..पता नहीं वह कैसी सजाएं देगी..पता नहीं उनके साथ क्या होने वाला है...पता नहीं विद्रोह करने वालों को कैसी कालकोठरियों में डाला जायेगा..कहीं ऐसा न हो पूरे गांव के लोगों को सरेआम फांसी पर लटता दिया जाये..कई लोगों को अपने गले पर फांसी का कसता हुआ फंसा भी महसूस हुआ..
8.पुनर्विचार
फिर सभा हुआ गांव में, फिर से सोचा जाये लोहा लेने के निर्णय पर..कैसी बचा जायेगा इस विपत्ति से। टकराव के बदले कोई सुरक्षित रास्ता निकाला जाये। तरह-तरह के प्रस्तावों के बीच गांव के सबसे बुजुर्ग के सुझाव पर भी गौर किया गया..उसका सुझाव था जैसे ही सरकारी महकमे को लोग आयें पूरे गांव के युवा, बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं सब एक साथ वहां जमा होकर एक साथ छाती पीट-पीट कर जोर-जोर से रोयें..सामूहिक रूदन से उन्हें दया भी आयेगी और उसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। गांव के सबसे उदंड युवक का सुझाव था..सरकारी कारिंदा पहुंचे तो सारे लोग एकत्र हों और एक साथ सारे लोग इकट्ठा होकर अपने अपने लोहे के धारदार हथियारों का प्रदर्शन करें..यह उन्हें दहला देने के लिए काफी होगा।
9.नेतृत्व
भले लोगों को किसी का नेतृत्व पसंद नहीं हो और जरूरत तक महसूस न करते हों लेकिन आपदा के समय दिशाहारा लोगों को नेतृत्व की जरूरत महसूस होने लगती है। मुसीबत से उबरने का जो सही सही सुझाव देता है वह आसानी से नेता बन जाता है। इस क्रम में ऐसे लोग भी नेता बन जाते हैं, जिनमें नेतृत्व का कोई गुण नहीं होता है..और एक बार नेता मान लिये जाने के बाद उसमें नेतृत्व के गुणों का विकास जिम्मेदारियों के कारण अपने-आप आ जाता है। नेतृत्व का जन्मजात गुण भले किसी में हो लेकिन कामयाब तो वे ही होते हैं जिन्हें नेता बनने का अवसर मिलता हो..बहुत कम होते हैं जिन्हें अवसर मिलता है..जन्मजात गुण वाले लोग प्राय: कार्यकर्ता या नेता के दायें बाएं हाथ बन कर रह जाते हैं। यही हुआ शुक्रवार के साथ। 25 वर्षीय शुक्रवार का नाम शुक्रवार इसलिए पड़ा क्योंकि वह शुक्रवार को पैदा हुआ था। पंडित जी ने उसके घरवालों से कहा था कि लड़का जिस लग्न नक्षत्र में पैदा हुआ है उसका नाम श से रखा जाना जाहिए..नाम खोजने की जहमत उसके पिता ने नहीं उठायी..वह शुक्रवार को पैदा हुआ था सो उसका नाम शुक्रवार ही रख दिया गया। वह अपने नाम के कारण भी अलग से जाना जाता था..सुनने वाले को पहली बार नाम अजीब लगता था किन्तु फिर वह अभ्यस्त हो जाता था..कोई नहीं जानता था शुक्रवार एक दिन नेता बनेगा..पर वह बना। उसने जो सुझाव दिया लोगों को पसंद आ गया और उसे गांव वालों ने अपने पर आयी आफत से निजात पाने के लिए उसे अपना नेता मान लिया और कहा कि सारी योजना वही बनाये हम तो बस उस पर अमल करेंगे..चाहे जो हो भला-बुरा उसे दोष नहीं देंगे।
10.नेता का सुझाव
गांव वालों के नेता शुक्रवार ने जो सुझाव दिया था वह भी लोहे से ही जुड़ा हुआ था। लोगों को अपने अपने लोहे के हथियारों को नयी धार देनी थी और आधी रात के बाद ब्रह्म मुहूर्त से ठीक पहले रेल पटरियों के पास पहुंच जाना है। गांव के बुर्जुगों, बच्चों और महिलाओं को लोहे के हथियारों से लैस होकर युवकों होने वाले किसी आक्रमण से रक्षा करनी है। युवक लोहे की रेल पटरियों को लोहा काटने वाली आरियों से काट-काट कर टुकड़े करेंगे और उन्हें उठाकर ट्रक में लोड कर देंगे जिसे कबाड़वाला शहर में बेच आयेगा..जो रकम मिलेगी उससे पूरे गांव के लोगों का लगाम अदा कर दिया जायेगा। कबाड़वाला तैयार था और नियम समय, नियत स्थान पर वह दो ट्रक लेकर सूरज की किरण फूटने से पहले हाजिर हो जायेगा।
11. योजना पर अमल और मुश्किलें
शुक्रवार की योजनाओं पर अमल हुआ पर आंशिक। आधी रात को ही गांव के सारे लोग हाथों में लालटेन और लोहे के धारदार हथियार लिये रेल पटरी की ओर निकल पड़े। युवाओं के हाथों गैंता, साबल और लोहे काटने वाली आरियां थीं, जिन्हें उन्होंने कबाडख़ाने वाले से काफी संख्या में पहले ही मंगा रखा था और आपस में बांट लिया था। यह खरीद उधार थी और कबाड़वाले से कहा गया था कि हिसाब लोहे के भुगतान से काट लिया जाये। वक्त से कुछ पहले ही लोग जमा हो गये। युवा अपने काम में जुटे गये। जगह जगह से आरियों से रेल पटरियां काट दी गयीं...गैंता और साबल की सहायता से उन्हें उखाड़ भी लिया गया किन्तु यह क्या वहां ने तो कबाड़वाला पहुंचा और ना ही उसके भेजे हुए ट्रक। लोगों पर इंतजार भारी पड़ रहा था और उनकी घबराहट बढ़ रही थी। लोग शुक्रवार से पूछ रहे थे अब क्या करें। शुक्रवार को काटो तो खून नहीं। उसने कहा थोड़ा और इन्तजार करते हैं वरना अब गांव वापसी के सिवा कोई चारा नहीं। पटरियों के टुकड़ों को और छोटा किया जायेगा और वे सब उठा कर गांव ले चलेंगे। शुक्रवार ने दौडऩे में तेज एक किशोर को कबाडख़ाना के मालिक के यहां दौड़ा दिया-पता करो क्यों नहीं पहुंचे अभी तक ट्रक और वह खुद कहां है? इधर, लोगों के सब्र का बांध टूटने टूटने को था..तभी ट्रेन की सीटी की हल्की आवाज लोगों के कानों में पड़ी..लोगों को लगा कलेजा मुंह को आ जायेगा..कुछ लोगों ने यह कहकर दूसरे को दिलासा दिया..यह वहम है..कुछ का कहना था यदि ट्रेन न रुकी और धड़धड़ाकर आगे बढ़ी और उलट गयी तो..पता नहीं कितने लोग मरेंगे..कुछ लोग शुक्रवार के निर्णय के खिलाफ भी राय देने लगे..इसी बीच..जो लड़का कबाडख़ाने में दौड़कर गया था लौट आया..शुक्रवार को उसने जो बताया गांव वाले सन्न रह गये-कबाड़वाला तो चादर तानकर अपने ओसारे में सो रहा है..उसने बताया कि वह पिछली देर रात को घर लौटा है..ट्रक वालों ने इस काम के लिए अपना ट्रक देने से मना कर दिया है..और कबाड़ जहां सप्लाई करना है उसने भी रेल पटरी के टुकड़ों को खरीदने से मना कर दिया है..वे सरकारी जांच के डर से मना कर रहे हैं..वह सबको यह जानकारी दे देता लेकिन उसका शरीर बुखार से तप रहा है और घर में कोई दूजा ऐसा नहीं था जिससे वह गांव वालों तक यह खबर पहुंचा सके।.. अभी यह सब चल ही रहा था कि वे सब तेज रोशनी से नहा उठे।
12. पुलिस फायरिंग
चारों तरफ से तेज प्रकाश था...किसी को कुछ दिखायी नहीं दे रहा था..सभी ने अपने अपने लोहे के अस्त्र संभाल लिये..किसी संभावित हमले से अपनी जान बचानी थी..शुक्रवार ने नारा लगाया-अंग्रेजी राज, मुर्दाबाद..
सबने मुर्दाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाये..क्योंकि उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें..
शुक्रवार ने फिर आदेश दिया..सामने बढ़ो और टूट पड़ो..हमला..
लोगों ने ऐसा ही किया..तेज रोशनी के आगे कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था कि किन्तु जो जिधर था तेजी अपने हथियार लेकर आगे की ओर दौड़ा..बच्चे बूढ़े जवान और औरतें सब से सब। धांय-धांय की आवाजें और लोगों की चित्कार से वातावरण दहल उठा.. दहशत में जो जिधर पाया भागा..मगर वे चारों ओर से घिरे हुए थे...बस यही सुनायी दे रहा था..बगावत करने वालों अपने हथियार फेंक दो तुम चारों ओर से घिरे हुए हो...हथियार फेंको और जमीन पर पट लेट जाओ वरना गोली मार दी जायेगी कोई जिन्दा नहीं बचेगा..लोगों ने ऐसा ही किया.. लोग तब तक जमीन पर लेटे रहे जब तक कोई उन्हें उठाकर नहीं ले गया..उन्हें पुलिस वालों ने एक एक कर उठाया और लात जूतों को ठोकर मारते हुए पुलिस वैन तक ले गये और उसमेें बिठा दिया..
13.पूछताछ
दिन का सूरज गांव वालों के लिए तकलीफें ले आया। लात जूते और डंडों से पुलिस ने रात में जो उनकी खातिर की थी अथवा भगदड़ में जो गिरने पडऩे से उन्हें जो चोटें लगी थीं वे अब दुखने लगी थीं..वे सब थाने में थे। उन्हें बड़ी बड़ी कोठरियों में रखा गया था जिसके दरवाजे पर ताला था..और बाहर पुलिस तैनात थी। पुलिस ने कुछेक वालों से यह पूछा था तुम्हारा नेता कौन है और सबका जवाब एक था-शुक्रवार।
शुक्रवार से एक विशेष कमरे में ले जाकर पूछताछ की जा रही थी..उसके सामने तरह तरह के नाश्ते की प्लेटें सजी थीं..वह झिझकते हुए खा रहा था..उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके साथ इतना अच्छा सलूक क्यों किया जा रहा था...उसने पुलिस अधिकारी को बेलाग लपेट स्पष्ट शब्दों में जो सच था बता दिया था...जिसके बाद पुलिस अधिकारी से माथे पर बल पड़ गया था..
14.पुलिस का अपना आदमी 
शुक्रवार को पुलिस वालों ने अपना आदमी बना लिया। पुलिस ने उसे समझाया-' हम जैसा कहते हैं-करो..वरना सब के सब मारे जाओगे...सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया है तुम लोगों ने..लेकिन सच कहने की जरूरत नहीं है..सभी लोगों को छोड़ दिया जायेगा लेकिन हमारी बात माननी होगी..Ó शुक्रवार के पास और विकल्प नहीं था..उसके चलते पूरे गांव के लोगों पर आफत आयी थी..वह लोगों को और मुश्किलों में झोंकना नहीं चाहता था..।
15.पुलिस की मुश्किलें
फायरिंग में मासूम बच्चों, महिलाएं, बुर्जुग लोगों सहित 43 लोग मारे गये थे..थाने के सामने लोगों को मजमा लगा था लाशों को देखने के लिए..देखने वालों की आंखों में आंसू और दिल में अंग्रेजी रात के खिलाफ नफरत थी.भीड़ बढ़ती जा रही थी...आस पास के तमाम गांवों-कस्बों तक लोगों को मारे जाने की खबर कानों कान पहुंच रही थी और लोगों को सैलाब उमड़ता जा रहा था..और पुलिस के लिए लोगों की भीड़ पर काबू पाना मुश्किल हो रहा था..बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों का थाने तक पहुंचना शुरू हो गया था..थाने में शुक्रवार के साथ फिर आला अधिकारियों की बैठक हुई और उसके सामने कई और बातें रखी गयीं..वह अपने देश का नेता बनने जा रहा है..उसका गांव ही नहीं उसका देश आजाद होने जा रहा है..और स्वतंत्र देश का वह निर्विवाद नेता माना जायेगा..
16. आजादी का मूल कारण
लोहा चुराने जैसे मामूली अपराध पर 43 लोगों की गोली मारकर बर्बर हत्या करने जैसे जघन्य मामले को अंग्रेजी राज से जुडऩे पर सरकार की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता को ठेस पहुंचेगी। दूसरे सारे आला पुलिस अधिकारी नप जायेंगे। इसलिए असली बात उजागर नहीं की जायेगी...इसलिए इस घटना को ऐसा मोड़ देना है जिससे गांव को लोग भी लाभांवित हों और पुलिस अधिकारियों पर भी गाज न गिरे..शुक्रवार को तो खैर लाभ मिलेगा ही।
17. अंग्रेजी इतिहास की नज़र में घटना
शुक्रवार के सम्पर्क स्वतंत्रता संग्राम में लगे विभिन्न देशों के नेताओं से थे। उसके पास से जो साहित्य और दस्तावेज बरामद हुए हैं, जिससे इसके पुख्ता सबूत मिले हैं। उसने गोरिल्ला युद्ध का बाकायदा प्रशिक्षण लिया हुआ था और गांव के तमाम लोगों को इसका अरसे से प्रशिक्षण दे रहा था..वह अंग्रेजी राज को उलटने की कोशिश में काफी अरसे से लगा हुआ था..और कई गांवों में उसने अपना संगठन तैयार कर लिया था..उसने सशस्त्र विद्रोह का व्यापक योजना बनायी थी..अस्त्र से लैस गांव के लोगों ने रेल पटरियां उखाड़ दी थीं और वे थाने पर हमला करने जा रहे थे, आत्मरक्षा के लिए और विद्रोह को कुचलने के लिए पुलिस के पास फायरिंग के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था..लोगों के हमले में तीन पुलिसकर्मी धारदार हथियारों से जख्मी हुए हैं..फायरिंग में 43 लोगों की जान गयी..जिससे बगावत के और फैल गयी...हालत बेकाबू देखते हुए देश को आजाद किया जाता है...सत्ता के हस्तांतरण के सम्बंध में विद्रोह के नेता शुक्रवार से अंग्रेजी सरकार ने करार किया है...देश आजाद किया जाता है..।
18. उपसंहार
आजाद देश में शुक्रवार राष्ट्रप्रमुख थे और उनके गांव का हर व्यक्ति स्वतंत्रता सेनानी...जहां रेल पटरियां उखाड़ी गयी थीं वहीं बनी थी शहीद बेदी..जो फायरिंग में मरे लोगों को स्मृति में थी।