12/16/2018

कविता में हाशिये पर जाते मुद्दों पर विमर्श


पुस्तकः अहसास/लेखकः कुशेश्वर/प्रकाशकः समन्वय प्रकाशन, के.बी.97 प्रथम तल, कविनगर, गाज़ियाबाद-201002, उत्तर प्रदेश
कुशेश्वर की कविताएं क्रमशः तीक्ष्ण होती जाती टीस व गहरे दंश वाली हैं। और उनका काव्य स्वभाव हमारे पथराते जाते अहसासों की गहरी पड़ताल से और कसैला होता जाता है। मारक होती जाती निःसंगता के कारकों की शिनाख्त भी उन्होंने की है। पहली कविता ही हमारे काव्यास्वाद को बदलता है। 'अनंत में लीन' कविता की एक बानगी देखें-'वे सभी लौट गये/जो मेरे मित्र थे/ जो मेरे अपने थे../हां, वे उसे तरह भी नहीं लौटे/जैसे लौटते हैं कुछ लोग कब्रिस्तान से/जैसे लौटते हैं कुछ लोग श्मशान से/और बिखर जाते हैं/बातें करते-करते इधर-उधर/वे सभी अचानक इस तरह से लौटे/जैसे देखते ही देखते डूब जाता है सूरज/आख़िर वे मेरा साथ देते भी तो कैसे/मैं तो अनंत अंधकार में लीन हो रहा था।' कुशेश्वर उन कवियों में से नहीं हैं जिन्हें दुनिया जहान से तमाम शिकायतें हों और वह लहजा भी नहीं है। वे तो बस स्थितियों को समझने-समझाने के हिमायती हैं। इस कविता में भी उनका लहजा नर्म है। 'अपनों का सपना' में भी यही लहजा है। दिखावे की क्रांति वाले दोस्तों के व्यावहरिक सच को बयां करते हुए-'और जो मेरे साथ था/ढूंढ़ने नहीं निकला सपनों को/वो पालता रहा सपनों को/आज भी मुस्तैद है/अपनों के बीच/बांटता है सपने/अपनों को।' उनकी कई कविताएं व्यवस्था में बदलाव की चाहत वाली हैं और कई पंक्तियों में उन्होंने विचारों की चिंगारियां यत्र- यत्र बोयी हैं। 'आग' कविता का एक अंश यूं है-'आग भड़काने वाला/कभी सामने नहीं आता/इसलिए ईश्वर बना रहा स्वर्ग में/हवा बनी रही अदृश्य।' इन पंक्तियों में विनम्र बने रहने वाला कवि परवर्ती पंक्तियों में सहसा अपने मंतव्य को मारक बना देता है-'अाग उतनी ही सच है/जितनी की पेट की भूख/दोनों की एक-दूसरे पर आश्रित हैं/अंतर केवल इतना है/आग दिख जाती है/भूख नहीं दिखती/लेकिन जब दिखती है/तो चूल्हे की आग-सी पवित्र नहीं रह जाती।' कुशेश्वर की काव्य शैली, उनके रचना के मर्म और धर्म को समझने के लिहाज से उनकी कविता 'क़लम' की यह पंक्तियां मौजूं हैं-'सुबह का सूरज लिखें/तो ज़रूरी नहीं कि चौंधियाये क़लम/ चाहिए केवल उंगलियों की निष्ठा।' कुशेश्वर उन कविताओं की जमात के रचनाकर्मी हैं, जो कविता को क्रांति मानते हैं, इसलिए हर शब्द का चयन वे अपने हमले के लिए जाल बिछाने की तरह करते हैं और फिर जहां कहीं घटनाक्रम और विमर्श में उन्हें गुंजाइश दिखती है वे धमाका कर देते हैं या उसकी स्थितियां पैदा कर देते हैं। अपनी कविताओं में जहां वे गांव को लेकर नॉस्टेल्जिक बने रहते हैं वहीं रचनाकर्म की शुचिता, वैचारिक निष्ठा, आचरण की नैतिकता, भुखमरी और गरीबी पर कभी तंज तो कभी तल्ख रुख अख्तियार करते हैं और पाठकों को अपने विमर्श में शामिल होने की चाहत जगाते हैं। कई कविताओं में वे एक किस्सागोई का माहौल रचते हैं और अपने कथ्य को घटनाक्रम से स्पष्ट करते हैं यथा 'कलावती', 'कुछ चीज़ें कभी खोती नहीं', 'ख़तरे और कबीर', 'दुर्गंध', 'पेटी और बेटी', 'चौराहा', 'एक शब्द' आदि। 'मेरी ज़गह' कविता भी इनमें से है जिसमें वे जाति व्यवस्था के विमर्श का साथ साथ हाशिए के लोगों की व्यथा को पुरजोर तरीके से उठाते हैं। 'ज्वालामुखी पर खिला हुआ फूल' कविता संग्रह के अरसे बाद उनका यह दूसरा संग्रह 'अहसास' आश्वस्त करता है कि कविता के ज़रिये बदलाव के स्वप्न पर उनका यक़ीन बना हुआ है। जीवन में हाशिये पर जाते मुद्दों को उन्होंने पूरी शिद्दत से अपनी कविताओं में केन्द्रीय स्थान दिया है और उन पर संवाद के लिए लोगों को प्रेरित किया है।उनकी कुछ कविताएं शुभेच्छाएं हैं, जिनमें काव्यत्मकता अधिक है। ऐसी ही एक कविता है 'स्वप्न भरे मकई के दाने'। उसकी बानगी देखें-यदि स्वप्न को/मकई के सफ़ेद दानों की तरह/गिरते और पिछलते देखना हो/तो खड़े हो जाओ तुम/बलखाती बदली के नीचे/हरी दूब के ऊपर।-डॉ.अभिज्ञात   

11/10/2018

दफ़न होते भावों को कविता में ढालने का हुनर


पुस्तकः अपने हिस्से का सूरज/लेखक: शिव प्रकाश दास/ प्रकाशकः उदंत मरुतृण, म.स. 46/2/2, 15 नापित पाड़ा मेन रोड, विधान पल्ली, बैरकपुर, पो.नोना चंदन पुकुर, बैरकपुर, उत्तर 24 परगना, कोलकाता-700122
'अपने हिस्से का सूरज' संग्रह की पहली कविता की आखिरी पंक्तियों से बात शुरू करता हूं, पहले इन्हें देखें-.'.इस तरह कई यात्राएं/मैं करता हूं/जब शहर की उमस/काटने लग जाती है मन को/मैं निकल पड़ता हूं खुटहना/पूरी करने अनंत यात्रा।' कवि शिव प्रकाश दास का यह पहला संग्रह है। इसकी कविताओं में जीवन के दृश्य हैं, उनके बारीक विवरण हैं, भाषा बोली से ओतप्रोत है, त्रासद यथार्थ, मूल्यों को खोने की टीस और कसक विस्तार से है लेकिन इन सबके बीच कविता..उसका इन्तज़ार कवि को भी है और पाठक को भी। वह जहां-जहां छिपी बैठी है पंक्तियों के बीच या फिर शब्दों के अन्तराल में। यह जो अनंत यात्रा है वह तमाम हलचलों के बीच सहसा कविता को पाने की है। इस पहली कविता में कविता कहां है वह देखें-'..आमों के पेड़ों पर/चलाने लगता हूं चीपा/कि कोई आम/चीपे के बुलावे पर/झट उतर आयेगा धरा पर।'अब तक फलों पर पथराव हमले के लिए रूढ़ हो चला है ऐसे में उसे आमंत्रण के तौर पर पेश करना एक नया लहजा है। 'पिता और पेड़' कविता में भी ऐसी ही पंक्तियां हैं-'कल की बारिश में/टूट चुके पपीते को देख/कोने में बैठ/सुबक रहे थे पिता।'
संग्रह में ग्रामीण परिवेश को व्यक्त करती कई कविताएं एक ही मनोभूमि पर हैं, उन्हें एक ही कविता का हिस्सा भी बनाया जा सकता है। हालांकि कुछ ऐसी भी हैं, जो तल्ख टिप्पणियों से बची हुई होकर भी अधिक प्रभावी हैं जिनमें 'अनाज के दाने' कविता रेखांकित करने योग्य है।
कभी-कभी तो पूरी बात मिलाकर एक काव्याभास देती है पर पूरी कविता की कोई पंक्ति काव्यात्मक नहीं लगती जिसमें 'छूटना गांव का', 'दस पांच की लोकल ट्रेन', 'नदी के आर-पार', 'कर्ज़ में', 'शिक्षा से जुड़ी लोककथा', 'बच्चे सीख रहे हैं', 'भूख' कविताएं शामिल हैं। चूंकि यह उनका पहला संग्रह है इसलिए वे अपनी रचना में क्या करना चाहते हैं यह व्यक्त करने की विकलता है। इसे वे एकाधिक कविताओं में व्यक्त करते हैं-अपने हिस्से का सूरज कविता में वे कहते हैं-'मैं अपने हिस्से का सूरज लिए/दौड़ता हूं हर ठांव/कि बचाये रखूं उसमें/झुर्री पड़े चेहरों के लिए आशाएं/बची रहे पहली बारिश में/भींगी मिट्टी की सोंधी गंध/और अंत में थोड़ी मिठास/आने वाले कल के लिए।' 'आदमीयत से बनती है कविता', 'पन्नों का इतिहास' भी इसी क्रम में पढ़ी जा सकती हैं। 'पत्र', 'अनाज के दाने' आदि कविताओं पर केदारनाथ सिंह की कविताओं की छायाएं मिलेंगी, जो संभवतः उनके प्रिय या आदर्श कवि होंगे। शिव प्रकाश ने केदार जी की कविताओं की ज़मीन पर अपनी कविताएं लिखी हैं। अपने परम्परा से कवि ग्रहण ही नहीं करता बल्कि उसे विकसित करने का भी प्रयास करता है। 'समय की रेत पर', 'बिस्तर की सिलवटें', 'कठपुतली' आदि कविताओं के लिए यह संग्रह अलग से जाना जायेगा क्योंकि उसमें उन्होंने वह सब कुछ अर्जित कर लिया है जो किसी कवि को अपनी ही तरह का कवि बनाती है। इस कविता की बानगी देखें-'कुछ ख़त भी होते हैं गुमनाम/जो हर थपेड़े में तलाशते रहते हैं अपना पता/घूमते हैं डाकिये की झोली में ताउम्र/और बिना किसी पूर्व सूचना के/किसी अनजान बस्ते के नीचे/ हो जाते हैं दफ़न।'यह सुखद है कि अनजान बस्ते के नीचे दफ़न होने वाले भावों को वे कविता में ढालते हैं।स्त्री के प्रति जिस नज़रिये से उन्होंने कविताएं लिखी हैं उसके कारण भी उनका काव्य-व्यक्तित्व उदात्तता की ओर बढ़ा है।व्यवस्था से मुठभेड़ के लिहाज़ से 'पागल हाथियों का ताण्डव', 'अरे! ओ प्रेतात्माओ', 'विकास का रथ', 'बकरियां', 'मरे हुए लोग', 'सपनों पर शोध' कविताएं उल्लेखनीय हैं और कवि के विकासक्रम की भावी दिशा का भी संकेत देती हैं।
-डॉ.अभिज्ञात

10/27/2018

उहापोह की स्थितियों के बीच काव्य -सृजन की ज़मीन की तलाश


पुस्तक समीक्षा
पुस्तकः शिखर से नीचे..मेरी ही बात/लेखक: सत्य प्रकाश 'भारतीय'/ प्रकाशकः उदंत मरुतृण, म.स. 46/2/2, 15 नापित पाड़ा मेन रोड, विधान पल्ली, बैरकपुर, पो.नोना चंदन पुकुर, बैरकपुर, उत्तर 24 परगना, कोलकाता-700122

सुविधापरस्त और तेज़ रफ्तार ज़िन्दगी में 'रोज़ का रिक्शेवाला' कविता पढ़कर ही हमें यह आभास हो जाता है कि सत्य प्रकाश 'भारतीय' तयशुदा रास्ते पर चलने वाली कविताएं नहीं लिखते। अपने पहले काव्य-संग्रह में वे ऐसी स्थितियों को व्यक्त करते हैं कि पाठक आलोचक तय नहीं कर पाता की कि वह उस पर क्या प्रतिक्रिया दे। उनकी कविता पर फेंस के इधर और उधर जैसी कोई विभाजन रेखा नहीं मिलती, क्योंकि वास्तविक जीवन में भी उपापोह वाली स्थितियों की भरमार है, जिसका सामना कवि सत्य प्रकाश 'भारतीय' की कविता में अक्सर होता है। आगे निकलने के हथकंडों को अपनाने से कवि को गुरेज है। यह कविताएं उन तमाम लोगों को शब्द देती हैं, जो हथकंडों का निषेध करते हुए जीवन के विभिन्न मोर्चों पर पीछे छूट जाते हैं। ‘चूक गयी कविता’ भी हमें ऐसे ही उहापोह में डालती है। उसकी बानगी देखें-'कितना अशिष्ट लगता है/जब हम नयन झुकाये/भीड़-भाड़ वाली मेट्रो में/लिख रहे होते हैं कविता/किसी बुज़ुर्ग की परेशानियों के बारे में/वृद्ध आश्रम की बढ़ती मांग पर/रोष व्यक्त करते हुए/और जब समाप्त कर/राहत की सांस लेते हुए उठ खड़े होते हैं/उतर जाने के लिए/फिर देखते हैं/पितामह तुल्य किसी को खड़े/ठीक हमारे सामने/तब यह सोचते हैं/क्या कविता लिख लेना/ज़्यादा ज़रूरी था सीट छोड़ देने से पहले?/अाज के समय में/इस पल तो कविता का/ना लिखना ही कविता होती है/अफसोस होता है कि/कैसे चूक गया मैं/इतनी अच्छी कविता लिखने से।' इस कविता से यह भी स्पष्ट होता है कि सत्य प्रकाश के लिए कविता क्या है। वे अपने कथ्य को जिस तरह से रखते हैं वह मितकथन की ही मांग करता है किन्तु इस शैली में ज़रा सी भी शाब्दिक स्फीति अधिक लगती है। फिलहाल वे इस कौशल को साधने में लगे हैं। और यह आश्वस्तकारी है कि वे अभी प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं। वे लिखते हैं-'होश संभालने से लेकर आज तक/निरंतन ही/किसी न किसी प्रक्रिया से ही/गुज़र रहा होता हूं/....कभी/ तन को मथनी बना मन को/तो कभी मन को मथनी बना तन को/मथ रहा होता हूं।'
उनकी कविता में कई विस्मयकारी तत्व हैं। कल्पना की नयी उड़ानें हैं और वह अबोधता और सरलता भी, जो किसी कथ्य को काव्य बनाती है। इस लिहाज से ‘मैं और तुम क्यों एक ही काल में?’ कविता उल्लेखनीय है। इस संग्रह की कविताओं में स्थितियों से दो-चार होने का तरीका प्रहारक नहीं बल्कि विश्लेषणात्मक है। मौजूदा राजनीति को व्याख्यायित करते हुए वे कहते हैं-'सिर्फ तीस -पैंतीस प्रतिशत/लोगों के अपने पक्ष में एकत्रीकरण का/ गणित होता है वोट/इतने नम्बर पाकर तो/ हम फेल हो जाते थे बचपन में।' एक अन्य कविता 'राजनीति से विदाई' भी इस पृष्ठभूमि पर लिखी गयी है। कवि जीवन के नये-नये स्रोतों से कविता के लिए अपनी खुराक जुटाने में सक्षम है तो उसका कारण विषयवस्तु नहीं बल्कि उसकी दृष्टि है, जो विसंगतियों को आरपार देखने में सक्षम है। वे कविता में चीज़ों को ऐसे कोण पर रख देते है, जहां से कविता की धार फूट निकलती है। इस संदर्भ में एक उल्लेखनीय कविता है 'पता नहीं क्या सूझा'। उसकी बानगी देखें-'पानी में डूबते बिच्छू को/निकालने की व्यर्थ कोशिश में/कई बार डंक खाया/यह भूलकर कि/मेरा तन को महात्मा का नहीं/अब मन भर विष लिए/फिर रहा हूं।' -डॉ.अभिज्ञात

10/14/2018

आद्योपांत पुनः न मिल पाने की मारक कसक से रचा काव्य -संसार


पुस्तक: कुछ अनकही../ लेखक: भागीरथ कांकाणी/प्रकाशकः इंडिया ग्लज़ेज़ लिमिटेड/6, लॉयस रेंज, 4 तल्ला, सूट न.3 और 4, कोलकाता-700001/मूल्यः 250 रुपये
भागीरथ कांकाणी का यह तीसरा काव्य-संग्रह दाम्पत्य जीवन और उसकी उपलब्धियों को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। दिवंगत पत्नी के बिछोह में उनके साहचर्य की स्मृतियों की पूंजी को उन्होंने जिस गहरी संवेदनशीलता के साथ व्यक्त किया है वह उसका उल्लेखनीय पक्ष है। विरह काव्य होते हुए भी यह अतीत के क्षणों को जीवंत करता चलता है और जीवन के उल्लास के अध्याय को बार-बार खोलता है। न होने पर होने के अहसास की गहराई अधिक शिद्दत से महसूस होती है, यह इस संग्रह को पढ़कर हमें लगेगा। यह संग्रह दरअसल स्वतंत्र कविताओं का नहीं है, बल्कि अलग-अलग क्षण अलग-अलग जीवन खण्ड की स्मृतियों को कुछ अंतराल में महसूस करने की विकल अभिव्यक्ति है। यह पूरा एक खण्ड-काव्य ही है। इसमें काव्य का लालित्य या छंद आदि उपादान उतने महत्वपूर्ण नहीं रह गये हैं जितना किसी के खोने का एहसास और उसके होने की सार्थकता और अर्थवत्ता। शब्दों में आद्रता है और हर कविता में न होने की एक टीस बराबर झांकती रहती है। यह संग्रह उन्हें भी पसंद आयेगा जिनका कविता से कोई लेना देना नहीं है। एक भरेपूरे जीवन में एकाएक पैदा हुए अपूरणीय शून्य से महाकाव्यात्मक फलक पर रची गयी यह काव्यकृति किसी के होने के बहाने यह बताती है कि किसी मनपसंद जीवनसाथी का होना जीवन में क्या महत्त्व रखता है। एक कविता का अंश देखें-‘रंग बिरंगी तितलियां/आज भी पार्क में/उड़ रही हैं/गुनगुनी धूप आज भी/पार्क में पेड़ों को/चूम रही है/फूलों की खुशबू आज/भी हवा को महका/रही है/कोयलिया आज भी/आम्र कुंजों में/ गीत गा रही है/हवा आज भी/टहनियों की बाहें पकड़/ रास रचा रही है/लेकिन तुम्हारी/चूड़ियों की खनक आज/सुनाई नहीं पड़ रही है।’ विरह को काव्य में ढालने की लम्बी परम्परा चली आ रही है। इस कृति को भावात्मक स्तर पर उस क्रम में भी पढ़ सकते हैं, हालांकि इसमें मिलने की बेताबी की जगह आद्योपांत पुनः न मिल पाने की मारक कसक है, जो इसे शोककाव्य की परम्परा के अधिक करीब ले जाता है।-डॉ.अभिज्ञात

कविता में मानवीय संवेदनाओं के इतिहास की रचना


पुस्तक समीक्षा
पुस्तकः खुशियों का ठोंगा/लेखक: अमित कुमार अम्बष्ट ‘आमिली’/प्रकाशकः उदंत मरुतृण, म.स. 46/2/2, 15 नापित पाड़ा मेन रोड, विधान पल्ली, बैरकपुर, पो.नोना चंदन पुकुर, उत्तर 24 परगना, कोलकाता-700122
देश के एक सामान्य व्यक्ति के देहाती व कस्बाई लगते लगाव, स्वप्न, संघर्ष और उसके विस्तार, उसकी इच्छाओं-आकांक्षाओं की उड़ान को संवेदनशीलता और भोलेपन के साथ व्यक्त करता काव्य-संग्रह है 'खुशियों का ठोंगा'। अमित कुमार अम्बष्ट ‘आमिली’ की यह पहली ही कृति आश्वस्त करती है कि उनके पास बहुत कुछ है, जो आने वाले समय में बेहतर लिखवायेगा। इस कृति में उन्होंने हमारी परिचित दुनिया की भूली-बिसरी, हाशिए पर पड़ी साधारण लगती हलचलों को अर्थवान तरीके से व्यक्त किया है। उनकी बानगी में हड़बड़ी नहीं है। उनकी कविता में खिचड़ी आराम से पकती है, जो हमारी परम्परा से निकलकर पश्ती के गझ्झिन दिनों, गरीबी व खाना बनाने के कौशलहीनता के दौर में ताक़त बन जाती है।
उनकी कविता में वह पिता हैं, जो संयम का जीवन जीते हैं। लेकिन इतना भर नहीं है। कवि कहता है- ‘खुद को संयमित कर/ सिखाया है मुझे कि/मेरे पांव टिके रहें ज़मीन पर/तब भी-जब मैं उड़ सकता हूं/आसमानों पर।’ उनकी कविता में वह मां है जो ईश्वर सदृश्य है-'मां के ममत्व की परिधि/कई बार कोशिश की है/मापने की-/भूतल के गहराई से/विस्तृत आकाश से भी/नापा है कभी/और झांका है/क्षितिज के पार भी/पर, न जाने क्यूं/सब छोटे पड़ जाते हैं/मां के आगे!' इन दोनों कविताओं में कवि जिस निष्कर्ष तक पहुंचता है, वही उसका मूल स्वर है। और वह उनकी कई कविताओं तेजतर हुआ है।
इसी क्रम में हरे रंग की लालटेन गौरेया आदि कविताओं से एक नास्टेल्जिक लगाव झरता है और पाठक को अपने विस्मृत लोक में ले जाता है। वे संवेदनाओं की पोटली में मूल्यों को जतन से सहेज कर बांधे रखने वाले व्यक्ति हैं। फिर इस पोटली के संसार को अपनी कविता में धीरे-धीरे खोलते हैं। वे नहीं चाहते उनके न होने पर उनके पेशेवर काम-काज की उपलब्धियों की चर्चा हो। वे चाहते हैं चर्चा हो उनकी भावना और आचार-विचार की। आदमीयत की। वे खुदाई में मिले डायनासोर के जीवाश्म की चर्चा के दौरान इस कसक को भी व्यक्त करते हैं कि काश पुरातत्व शोधक मानव अवशेष के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं के चिह्न भी खोज पाते।
उनके पास संवेदना का पूरा संसार है जिसमें उनकी प्रियतमा पत्नी भी है। वे लिखते हैं-'अब पतीले में/चावल संग इश्क़ उबलता है घर में/शायद वो आटे संग/उल्फत का चोकर मिलाती है/मेरी रसोई के जूठे बर्तन से भी/अब मुहब्बत की खुशबू आती है।' प्रेम व दाम्पत्य जीवन पर पूरा एक खण्ड ही है इस संग्रह में। 'हरे पत्ते' कविता में वे लिखते हैं-'पुरानी क़िताबों के बीच/दफ़न हैं कुछ पुराने ख़त/जो लिखे तो सही मैंने/लेकिन कभी दिये नहीं।'
जीवन की आपाधापी व दैनंदिन की कठोर होती जाती चुनौतियों से भी कवि दो-चार हुआ है। सेल्समैन का टारगेट, लक्ष्य जैसी कविताएं इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इन सब के बीच देहव्यापार से जुड़ी स्त्रियों पर लिखी कविता 'सेमल की रुई'अलग किस्म की और अलग से रेखांकित करने योग्य है। कविता की एक बानगी देखें-'उनकी आंखों में/सिर्फ़ पुतलियां नहीं/तेज-धार बंसी जड़ी होती है/मछलियां पकड़ने वाली/जिसमें वो कर लेती हैं बड़े-से-बड़े/सफ़ेदपोश जानवर का शिकार/वो रोज़ नहाती भी नहीं हैं/पर उनके जिस्म से/बदबू नहीं आती कभी/वो सेमल की रुई की तरह/हल्की भी होती हैं/तोल दी जाती हैं/चंद सिक्कों के एवज में/और हर रोज़ धुनी भी जाती हैं/बिस्तर गर्म करने के लिए।' यह कविता में चंद सिक्कों के लिए तोल दिया जाना और रुई की तरह धुन दिया जाना है, वह देर तक पाठक के मन में को वेधता रहता है। इन शब्दों का अर्थ विस्तार उनकी कविता को नयी ऊंचाई तक ले जाता है। कवि अमित के लिए कविता मानवीय संवेदनाओं का इतिहास है। ऐसा वे 'मत छोड़ना लिखना तुम' कविता में कहते हैं, तो संकेत मिलता है कि वे स्वयं मानवीय संवेदनाओं के इतिहास को अपनी रचना का सर्वोत्तम गुण और लक्ष्य मानते हैं। और यह बहुत बड़ा गुण है।-डॉ.अभिज्ञात