6/20/2017

बीसवीं सदी की खदकती कविताएं

पुस्तक का नाम-बीसवीं सदी की आख़िरी दहाई, कविता-संग्रह लेखक-अभिज्ञात प्रकाशक-बोधि प्रकाशन, एफ 77,सेक्टर 9,रोड नम्बर 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006 मूल्य-175 रुपये
पुस्तक समीक्षा
- राहुल शर्मा -
 अभिज्ञात समकालीन कविता जगत का एक परिचित नाम है जो अब भारतीय कविता की श्रेष्ठतम दहाई में शामिल हो चुका है। उनका हालिया प्रकाशित कविता संग्रह ‘बीसवीं सदी की आखिरी दहाई’ इस बात की सत्यता को प्रमाणित करता है कि एक अच्छे कथाकार में ही एक सफल कवि का हृदय धड़कता है। इस संग्रह में संकलित कविताएं कई खंडों मे विभक्त है जिस पर अरूण कमल जी ने अपनी सार्थक लेखनी चलाते हुए इसे ‘समय को समझने की कवि मेधा’ कहा है।
संग्रह की भूमिका ही पूरे संग्रह को स्पष्ट कर देती है। बीसवीं सदी वह दौर है जब पूरी दुनिया में एक बदलाव आया जिसका बिम्ब इन कविताओं में नज़र आता है। एक अदहन हमारे अंदर, भग्न नीड़ के आर पार, सरापता हूं, आवारा हवाओं के खिलाफ चुपचाप तथा दी हुई नींद उपशीर्षकों से सजा अनुक्रम समय की भली-भांति पहचान करता जान पड़ता है।
‘एक अदहन हमारे अंदर’ शीर्षक के अंतर्गत आने वाली कविताओं में ‘सच के पास आदमी नहीं है’ कविता समय के सबसे बड़े सच को बयां करती है। यह समय की सबसे बड़ी बिडम्बना है कि हर तरफ़ हज़ार-हज़ार सच के आंखों से देखे जाने के बावजूद भी उस सच के पीछे खड़े होने वाले लोग नहीं। यहां समय की एक ऐसी चाल देखने को मिलती है जिसने सच को उस परछाईं में तब्दील कर दिया है जो साथ तो चलती है पर उसका कोई अस्तित्व नहीं होता।
वर्ष 1988 में पंजाब को संदर्भ बना लिखी गई कविता है ‘आदमी के मांस की गंध’। यह सन 80 का दौर भारतीय इतिहास क एक ऐसा दौर था जिसमें सन 47 फिर से जी उठा, जिसने एक शुबहे को जन्म दिया, विश्वास पर शुबहे को, इंसान का इंसानियत पर शुबहे को। तभी तो वातावरण में फैले आदमी के मांस के गंध, आदमी को भा रही थी। कविता जिस चित्र को पाठकों के समक्ष पेश करती है वह देश का वह राजनैतिक माहौल है जो श्मशान में बदल गया था। यह कविता आज के संदर्भ को दर्शाने में अपनी प्रासंगिक उपस्थिति दर्ज करती है-
वह आदमी ही है/ कितना बड़ा आश्वासन है अखबार/ आदमी के मांस की गंध/ आदमी को भाती है/ इन दिनों यह आम खबर है।
‘एक अदहन हमारे अंदर’ जो कि पुस्तक के पहले अंश का शीर्षक भी है अवसरवादिता पर तंज कसती कविता है। यहां कवि के मानव मनोविज्ञान की गहरी समझ का भी पता चलता है। वह निरंतर एक कश्मकश से गुज़रता रहता है-
हम/ जो कि एक साथ/ पूंछ और मूंछ/ दोनों की चिंता में व्यग्र हैं/ बचाते हैं अपना घर/ जिस पर हम सारी उम्र/ पतीले की तरह चढते हैं।
यही है मनुष्य का वह द्वंद्व जिससे वह आजीवन संचालित होता रहता है।
‘भग्न नीड़ के आर पार’ जिसका प्रकाशन स्वतंत्र संग्रह के रूप में सन 1990 में हुआ इस संग्रह के अंतर्गत आने वाला दूसरा शीर्षक है। इस शीर्षक के अंतर्गत आने वाली कविताओं के केंद्र में ‘भग्न नीड़’ है। ‘भग्न नीड़’ शीर्षक से बात पूरी स्प्ष्ट हो जाती है कि यहां समाज की सबसे मज़बूत इकाई जिसे परिवार के नाम से जाना जाता है मौजूदा दौर में उसके अस्तित्वहीन होने जाने को शीर्षक की कविताओं का केंद्रीय विषय है। इस शीर्षक के अंतर्गत दो कविताएं हैं-
प्रथम खंड: स्त्री और द्वितीय खंड: पुरूष।
प्रथम और द्वितीय खंड की कविताओं के माध्यम से कवि रिश्तों की उन बारीकियों की ओर इशारा करता है जो किसी भी रिश्ते को आगे बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रिश्तों में आ रहे स्खलनों की एक सबसे बड़ी वजह है ‘विश्वास’ का कम होते जाना जिन्हें इन पक्तियों में अनुभूत किया जा सकता है-
मुझे उससे प्यार है/था/ जिस दिन से तुमने ये सिद्ध किया/कराया।/ बस, मैं हो गया पराया॥
सन 1992 में आए संग्रह ‘सरापता हूं’ शीर्षक के अंतर्गत आने वाली कविताएं पिछले शीर्षकों से भिन्न हैं। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि 90 का दौर भारतीय इतिहास में अपनी महत्वपूर्ण स्थिति दर्ज करता है। दूसरे शब्दों में इसे ‘विचारधाराओं की असफलता’ का दौर भी कहा जा सकता है क्योंकि यहीं से पूंजीवाद का छ्द्म चेहरा प्रकट होना शुरू होता है। ‘दूर नहीं है हिमांक’ कविता न केवल ‘सरापता हूं’ शीर्षक को पुख्ता करती है अपितु पूंजीवाद के प्रभाव को भी अभिव्यक्त करती है-
बड़ी तेजी से दुनिया/ व्याकरण से बाहर हो रही है/ दुनिया अपनी कोख में समा जायेगी/ व्याकरण विहीन होकर/ जबकि सब कुछ जल रहा है/ यह जम रही है/ जम कर क्या रह जायेगी दुनिया?
कवि का यह प्रश्न सदी का सबसे बड़ा प्रश्न है जिसमें वह समय के इस बदलाव से चिंतित है और वह उसे बचाने के लिये लिये भी प्रयासरत दिखता है-
व्याकरण से बाहर जाती दुनिया के लिए/ एक व्याकरण/ जो हमारी धमनी में है/ हो सके तो मित्रों, उसे ढूंढो/ और इस निरंतर जमती हुई दुनिया को/ आग से बचाओ।
‘सरापता हूं’ शीर्षक कविता जो सन 1992 में आए संग्रह ‘सरापता हूं’ में संकलित है, परम्पराओं से मुक्ति की छटपटाहट की कविता है दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ‘एक निरीह कवि द्वारा अपने पूर्वजों द्वारा प्रदत्त अस्तित्व से मिलने वाली यातना’ से मुक्ति के छटपटाहट की कविता है। जोंक की तरह हमारे शरीर से चिपक गई इन परम्पराओं से मुक्त होकर ही एक नयी सदी जन्म ले सकती है। तभी तो कवि कहता है-
तुमसे सुरक्षित नहीं हूं कत्तई कहीं भी/ मेरी पीठ दुख गई है तुम्हें ढोते-ढोते।
वर्ष 1993 में आया संग्रह ‘आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप’ जो कि ‘बीसवीं सदी की आखिरी दहाई’ संग्रह का चौथा उपशीर्षक है, अपने मिजाज़ से ही वक़्त की विसगतियों को आईना दिखाती हैं। इस उप शीर्षक के अंतर्गत आने वाली कविता ‘लिखा है एक क़िताब में’ कवि उस राजनैतिक विसंगति कि ओर इशारा करता है जो ‘घर की दीवारों को पोस्टरों में’ तब्दील कर रही है। राजनीति की गंदी चाल उस आवारा हवा का रोल प्ले करती है जिसके खिलाफ़ खड़े होने का माद्दा बहुत कम रह गया है या यूं कहा जाए कि है ही नहीं। ‘नागरिक’ होने की महज भूमिका निभायी जा रही है-
हम केवल अपने राशन कार्ड में नागरिकता निभाते हैं/ और डाल दिए जाते हैं/ हमसे पहले ही हमारे वोट/ हम देते रहते हैं धन्यवाद।
यही है आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुप्पी जो सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है।
सदी की एक और त्रासदी है समस्याओं का बहानों में तब्दील हो जाना और सदी की इस दूसरी सबसे बड़ी त्रासदी को बयां करती कविता है ‘अदृश्य दुभाषिया’। यहां कवि विस्थापन की उस पीड़ा को दर्शाता है जिसमें दुभाषिया विपरीत अर्थ को लेकर प्रकट होता है। दुभाषिया जो एक भाषा की अंतर्वस्तु को दूसरी भाषा में प्रकट करने का कार्य करता है। इस कविता में क़ागज़, अंतर्देशी, लिफ़ाफ़े, पोस्टकार्ड उस दुभाषिये की भूमिका में है जो दर्द के दु:ख को ‘सुख’ कहकर व्यक्त करते हैं-
क्या कागज़, अंतरदेशी, लिफ़ाफ़े, पोस्टकार्ड/ यह गुस्ताख दुभाषिए हैं/ जो समस्या को बहाने में तब्दील कर देते हैं।
‘आवारा हवाओं के खिलाफ़’ जो कि समीक्ष्य कृति का एक उपशीर्षक भी है, शीर्षक कविता व्यक्ति और समाज के बीच की खाई को दर्शाती कविता है जिसके केंद्र में हैं तो बेटियां पर उससे भी बढकर वह बाप है जो निरंतर ‘आवारा हवाओं के खिलाफ़’ ‘चुपचाप’ संघर्ष करता रहता है। अभिज्ञात जी की इस कविता में उनकी गहरी समाजिक दृष्टि और उनका दायित्व बोध स्पष्ट नज़र आता है-
हमें बेटी के लिए/आवारा हवाओं के खिलाफ़/होना होता है चुपचाप खड़ा/पान की दुकान की फ़ब्तियों से डरना/है बेटी का बाप होना।
‘दी हुई नींद’ जिसका प्रकाशन वर्ष 2000 है, अंतिम उपशीर्षक के अंतर्गत आने वाली कविताएं पत्थर होती जाती उस व्यवस्था की शिनाख्त है जिसने मनुष्य की इच्छओं को आक्रमणकारी बना दिया है जिनकी स्पष्ट हूक इनमें सुनाई पड़ती हैं। ये कविताएं एक मिज़ाज़ की कविताएं हैं जिन्होंने कवि की नींद में सेंध लगा दी है और उसकी लेखनी से फूट पड़ी हैं।
उपशीर्षक के अंतर्गत आने वाली कविता ‘विडम्बना’ समाज के उस वर्ग की ओर इशारा करती है जो बौधिक स्तर पर श्रेष्ठ तो है पर यही वर्ग जब बिलल्लेपन का शिकार हो ‘उल्टे’ और ‘सीधे’ के बीच का फ़र्क नहीं समझ पाता तो एक भयानक स्थिति जन्म लेती है –
उन्होंने सोचा/वाह यह भी खूब रही/उन्हें पता नहीं चला कि/वह कलाकृति उल्टी थी/वस्तुत: हो जाना चाहिए सावधान/कि उन्हें पता नहीं चल सका/कलाकृति उल्टी थी।
कवि इसी संदेश को कविता के माध्यम से पूरे समाज में प्रेषित करना चाहता है ताकि इस भयावह स्थिति से बचा जा सके।
जहां तक भाषा की बात है उसमें कवि ‘भाषाओं की चाशनी’ में पगा हुआ है। देशज (अदहन, टोनही) शब्दों के साथ-साथ अंग्रेजी (हिमोग्लोबिन) और संस्कृत (कृत्रिम, विजयोल्लास, अपरास्त आदि) के शब्दों के प्रयोग से कविताएं अपने ‘भावों’ को व्यक्त करने में पूरी तरह से सक्षम हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो ‘बीसवीं सदी की आखिरी दहाई’ बीती शताब्दी का आईना है।

सम्पर्क सूत्र- राहुल शर्मा, ग्राम-कोदालिया, पोस्ट-बंडेल, जिला- हुगली, पिन- 712123 (पश्चिम बंगाल) फोन- 968104094ई-मेल- rahul9681s@gmail.com

5/26/2017

मेरी रचना प्रक्रिया

एक इंटरव्यू में
डॉ.अभिज्ञात
मैं जो कुछ लिखता हूं वह उसी समय की मनःस्थिति का बयान नहीं होता। वह रचना क्षण महज़ अरसे से भीतर पल रहे के बाहर आने का क्षण होता है। बहुत चौकन्ना नहीं रहता तब मैं। कविता लिखने की स्थिति बनती है तो मैं जो भी कागज़ मिल जाये उसी पर लिख लेता हूं। यहां तक कि ट्रेन में भी या प्लेटफार्म पर। क्योंकि यह अभिव्यक्ति का झोंका गुज़र जाने के बाद कुछ भी याद नहीं रहता। दुबारा उस विचार या अनुभूति की वापसी नामुमकिन लगती है। तो कभी पैदल राह से गुज़रते हुए, ज़रा रुककर भी लिखा है। मैं साफ़-सुथरे व कोरे कागज़ पर प्रायः नहीं लिख पाता। मुझे पता नहीं होता कि कितना क्या लिख पाऊंगा। रद्दी छपे हुई पत्रिकाओं पर खाली जगहें काफी होती हैं। कई बार तो मैं लिखकर भूल जाता हूं और इसी क्रम में लिखा हुआ कई बार शहीद हो चुका है। लिखा हुआ फिर याद नहीं आता। कई बार अपने लिखे को पहचानने में दिक्कत होती है कि लिखी हुई बात मेरी अभिव्यक्ति है या किसी और की बात किन्हीं कारणोंवश लिख छोड़ी है। यह रचना प्रक्रिया कविता की है।
कहानी-आलोचना के लिए मैं इतमीनान के साथ बैठता हूं और योजना बनाकर लिखता हूं। काफी टालमटोल के बाद।

5/05/2017

कविता/भेंट की गयी किताब



डॉ.अभिज्ञात
---------
नहीं
अब मैं नहीं भेंट करूंगा किसी को अपनी लिखी किताब
उसका नाम लिखकर

नाम लिखने से हो जाती है वह किसी की निजी सम्पदा
उसकी अकड़ का सबब
प्रदर्शन और यार दोस्तों में रौबदाब की चीज़
किताब नहीं रह जाती पढ़ने-पढ़ाने के लिए
वह बदल जाती है देखने दिखने की शै में

जैसे ही मैं किसी का नाम लिखता हूं क़िताब पर
सारे शब्द करने लगते हैं उस नाम की ओर इशारा
उसी को सम्बोधन
ढहा दी जाती है उस व्यक्ति के प्रति मेरी तमाम असहमतियां
जैसे आग से निकाल ली गयी हो उसकी आंच

किसी का नाम लिखते ही हो जाती है क़िताब दूसरे लिए
वैसे ही जूठी जैसे दूसरे का भोजन

किसी अन्य का पहना हुआ कपड़ा

कई बार तो लगता है
जैसे हो किसी और की छोड़ी हुई सांस

कोई और नहीं पढ़ना चाहता
दूसरे का नाम लिखी हुई क़िताब

ऐसी क़िताबें प्रायः मिल जाती हैं फुटपाथ पर रद्दी के कुछ ही अधिक दाम पर

जैसे कम हो जाती है क़ीमत फटे नोट की
वैसे ही अवमूल्यन हो जाता है कि़ताब का कोई नाम लिखते ही
जैसे रिसेल में बेचा जाये नया मोबाइल फ़ोन
नयी कार
नयी बाइक

कई बार ऐसा ही हुआ है
किसी का नाम लिखकर डाक से भेजी क़िताब और वह लौट आयी
पता बदलने की वज़ह से
या उसके दुनिया से कूच कर जाने की वज़ह से
बन जाती है जी का जंजाल
न रखते बनता है और ना ही किसी को देते

एकाध बार वह सफ़ा फाड़ कर दिया है किसी और को या नाम काटकर
सामने वाले की मूक प्रतिक्रिया ने भी हिला दिया है
वह जानता है कि मैं उसे सौंप रहा हूं किसी अन्य को सम्बोधित क़िताब
जैसे कि मैंने उसे मान रखा हो उपेक्षित..और दिखावा करता हूं यूं ही क़रीबी होने का

मैं क़िताब को किसी एक का होने के ख़िलाफ़ हूं
ख़रीदने से भी किसी की सम्पत्ति नहीं हो जाती क़िताब
तो फिर किसी को भेंट कर
कैसे होने दूं किसी एक की

क्षमा करें दोस्तो
कोई किताब किसी के पास हो तो इतनी कृपा करें
पढ़ना पसंद हो तो ही पढ़ें और फिर
उसे किसी को भी सौंप दें प्रेम से
ब़गैर उसका नाम लिखे
ताकि वह पढ़े और छोड़ दे किसी बेंच पर किसी और अज़नबी के लिए
कोई भी क़िताब किसी एक की नहीं होती...

उसे जायदाद बनने से बचायें...

और मेरी क़िताबों मुझे माफ़ करना
अब तक की गयी मेरी इस बदसलूकी के लिए।


4/28/2017

वक़्त से आगे इस्मत चुगतई


-डॉ.अभिज्ञात
इस्मत चुगतई अपने वक़्त से काफ़ी आगे की रचनाकार थीं। सत्तर साल पहले ही उन्होंने स्त्री होने के नाते अभिव्यक्ति के जिन ख़तरों को उठाया, उसका साहस आज भी मुस्लिम समुदाय की महिलाएं नहीं कर पातीं। इस्मत आपा ने जो जिया उसे लिखा और जो लिखा उसे जिया। उनका जीवन उनकी रचना की खूराक थी। जो प्रयोग उन्होंने अपनी रचनाओं में किये वही प्रयोग जीवन में भी किये। वे केवल उदार नजरिये की ही नहीं बल्कि उदार जीवन की भी मिसाल हैं। उनकी रचनाओं और जीवन में कोई फांक नहीं है। वे दुहरा जीवन जीने वाली रचनाकार नहीं थीं। वे अपने समकालीन हिन्दी की साहित्यकार महादेवी वर्मा और पंजाबी की साहित्यकार अमृता प्रीतम की तरह एक रचना व्यक्तित्व को गढ़ने में सफल रही थीं।
इस्मत चुगतई ने आत्मकथात्मक या संस्मरणात्मक लेखन किया है और टेढ़ी लकीर जैसे उपन्यास तो उनके जीवन के काफी हिस्से को ही उजागर करता है। कहना न होगा कि कोई लेखक जब अपने जीवन की घटनाओं को सार्वजनिक करता है तो उसके साथ साथ उसके परिचितों, परिजनों का जीवन भी गोपनीय नहीं रह जाता। लेकिन आम दुनियादार व्यक्ति दोहरा जीवन जीते हैं ऐसे में ये लेखक अपने परिचितों के लिए मुसीबत का सबब बन जाते हैं। इस्मत को भी उसकी कीमत चुकानी पड़ी। इस्मत ने अपने परिवेश को निर्भीकता से चित्रित किया है और आपनी बातों के पक्ष में वे डट कर खड़ी रहीं और परिस्थितियों को मुकाबला किया। उनके लिए लिखना और जीना एक था।

वे साफ़ तौर पर मानती थी कि जगबीती और आपबीती में भी तो बाल बराबर का फ़र्क है। जगबीती अगर अपने आप पर बीती महसूस नहीं की हो तो वह इनसान ही क्या? और बग़ैर परायी ज़िंदगी को अपनाए, कोई कैसे लिख सकता है!
उन्होंने अपनी कहानियों में खानदान के कुछ लोगों को पात्रों के रूप में चित्रित किया है लेकिन उन्हें पात्र की तरह बाक़ायदा रचा और गढ़ा है।
इस्मत की कहानियों के चलते उर्दू कहानी में दृष्टि और कला के स्तर में बदलाव आया और कुछ नये आयाम जुड़े। उनका रचना समय प्रगतिशील साहित्यांदोलन के पहले उभार का था। उन्होंने सामाजिक न्याय के संघर्ष में स्त्री की मुक्ति को महत्वपूर्ण माना और उनके अधिकारों की बात को प्रगतिशील रचनाशीलता का प्रमुख हिस्सा बनाया।
जिसके कारण वे यथार्थ के परिचित स्वरूप से बाहर निकल कर जीवन के सर्वथा नये इलाकों में कहानी को ले गयीं। मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज के स्त्री के जीवन को कहानी की संवेदना बनाने के लिए इस्मत चुग़ताई अलग से पहचानी जाती हैं। और ये कहानियों संवेदना के स्तर से निकलकर  स्त्री के अस्तित्व व अस्मिता का व्यापक विमर्श में बन जाती हैं।
इस्मत ने निम्न मध्यवर्गीय तबक़े की दबी-कुचली सकुचाई मुस्लिम किशोरियों की मनोदशा को अपनी उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी यथार्थ व शिद्दत के साथ बयान किया है।  अश्लीलता के आरोप में उनकी मशहूर कहानी लिहाफ़ के लिए लाहौर हाईकोर्ट में मुक़दमा भी चला जो लेकिन ख़ारिज हो गया। उन्होंने शहीद लतीफ से शादी की जिनकी मदद से उन्होंने 12 फिल्मों की पटकथाएं लिखीं। उन्हें वर्ष फिल्म गर्म हवा के लिये सर्वश्रेष्ठ कहानी का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। उन्होंने श्याम बेनेगल की फिल्म जुनून के भी संवाद लिखे। फिल्म जुगनू में एक रोल भी किया तथा कुल 13 फिल्मों से वे जुड़ी रहीं।
इस्मत के पास एक स्पष्ट वैचारिक परिप्रेक्ष्य है और वे स्त्री बनाम पुरुष के बदले अलग-अलग स्तरों स्त्री को लेकर पुरुष की मानसिकता और शोषण को उजागर किया है। स्त्री के प्रति स्त्री की क्रूरता भी उनसे नहीं छिपी है जो उन्हें नारीवादी लेखिका बनने की परिधि से बाहर ले जाता है। इस्मत की कहानियां अपने समय का समाजशास्त्रीय अध्ययन हैं।
उनकी कहानियों में अनावश्यक स्फीति नहीं है बल्कि लगातार एक बेचैन गति है।
और दुर्लभ कलात्मक संयम है।
उनकी कहानियों में एक बेचैन करने वाली गति है। इशारे, संवाद और चरित्र चित्रण और दृश्यों की बारीकी का हुनर उन्होंने पटकथा लेखन के दौरान मांजा। यहां कह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि पटकथा लेखन से वे जुड़ी न होतीं तो शायद वैसा निखार उनकी रचनाओं में न आ पाता। प्रेमचंद ने भी गोदान की रचना तब की थी जब वे बंबई फिल्म जगत से जुड़े और पटकथा की समझ विकसित की। इसने कौशल के चलते गोदान उनकी रचनाओं में सर्वोत्तम बन गया। पटकथा मनोवेग को भी चाक्षुस बनाकर दिखाने का हुनर है जो कम रचनाकारों को आता है।
इस्मत के स्त्री पुरुष चरित्रों में एक अजब की कशिश और ज़िद है तो आकर्षक बनाती है और उनके निजीपन की छाप उसमें दिखायी देती है। हालांकि उनका कैनवास काफी विस्तृत है।
अपने ही जीवन को मुख्य प्लाट बनाकर रचने का साहस उनकी रचनाशीलता को सहज विश्वसनीयता से लैस करता है।
70 साल पहले के पुरुष प्रधान समाज में एक स्त्री का स्वतंत्र सोच कितना जोखिमभरा रहा होगा सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उनकी कहानियों के व्यंग्य, भाषागत प्रवाह, स्त्रियों का उनकी अपनी जुबान के साथ साहित्य में प्रवेश, निर्भीकता आदि विशेषताओं ने उन्हें उर्दू साहित्य में सआदत हसन मंटो, कृष्ण चंदर और राजेन्दर सिंह बेदी के खड़ा कर दिया। उनमें भी ज्यादातर अलोचक मंटो और चुगताई को ऊंचे स्थान पर रखते हैं।


4/11/2017

गाय आरती

डॉ.अभिज्ञात
(श्रीमती जी की फरमाइश पर उनके गाने के लिए लिखी )

गौ मां, तू है जगजननी माता
तू सबकी भाग्य विधाता
तेरी कृपा न कभी हारती
गऊ मां नित-नित उतारूं तेरी आरती
-1-
तुम बिन कोई यज्ञ न पूरा होवे
कामधेनु कहलाती हो
तुमको जिसने पूजा मैया
उसके भाग जगाती हो
पीयूष पिलाने वाली
निर्मल बनाने वाली
कष्टों से तुम ही उबारती
मैया, नित नित उतारूं तेरी आरती
-2-
तुझपे रीझे ग्वाल बाल
राधा-गोपी सब वारी थे
तुझपे मोहित हे माता जी
श्यामल मुरली धारी थे
तन मन हर्षाने वाली
करुणा बरसाने वाली
सबकी तुम बिगड़ी संवारती
मैया, नित नित उतारूं तेरी आरती
-3-
मंगलकारी तुम हो मैया
तुमही सारे तीरथ हो
वेदवंदिता तुम कपिला हो
भारत मां का गौरव हो
यमुना गंगा की धारा
सबको वैतरणी तारा
गिनती न तेरे उपकार की
मैया, नित नित उतारूं तेरी आरती
-4-
पीठ पे ब्रह्मा गले में विष्णु
मुख में शिवजी रहते हैं
सारे देव विराजे तुममें
ऋषि मुनी सच कहते हैं
पूजें सारे नर नारी
हर लो विपदाएं सारी
शोभा हो तुम हर द्वार की
मैया, नित नित उतारूं तेरी आरती
-5-
सागर मंथन से निकले जो
उन रत्नों की शान हो
तर जाता है भवसागर से
जिसने किया गोदान हो