Tuesday, February 14, 2012

अभिज्ञात अपने नये सांचे व ढांचे के कवि हैं -नामवर सिंह


दूरदर्शन पर 7 जनवरी शनिवार को प्रसारित 'आज सवेरे' टीवी कार्यक्रम के प्रस्तोता सुपरिचित कवि मदन कश्यप व हिन्दी के शीर्ष आलोचक डॉ.नामवर सिंह
डॉ.नामवर सिंहः मेरे देखने में यह पहले-पहले संग्रह आया है 'खुशी ठहरती है कितनी देर'। और एक भूमिका भी लिखी है, जिससे मालूम होता है इस भूमिका से कि कविता से इनका जो सरोकार है, वह बहुत गहरा है। और कविता को बहुत महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली विधा वे मानते हैं। उन्होंने कहा भी है विवेक-सम्मत आवेग की अभिव्यक्ति है कविता। तो आवेग के साथ विवेक ज़रूरी है इसे वे इसे मानते है और यह उनकी कविताओं में भी झलकता है। पहली ही कविता जो उन्होंने दी है। भूमिका न भी देते तो कोई हर्ज न था लेकिन इनके सरोकार जो हैं, बहुत गंभीर हैं। भूमंडलीकर और उदारवाद बाजार व्यवस्था के बीच कविता का जो महीन जाल बुना गया है, उसमें कविता के लिए कितनी जगह रह गयी है इसकी चिन्ता के साथ उन्होंने लिखी है। पहली ही कविता इनके विचार को भी प्रकट करती है और उनकी कविता का जो सांचा और ढांचा है वह भी मालूम होता है। 'खुशी ठहरती है कितनी देर'। मैं सोचता हूं कि कोई टिप्पणी करने से पहले इस कविता को देख लें
'मैं दरअस खुश होना चाहता हूं

मैं तमाम रात और दिन
सुबह और शाम
इसी कोशिश में लगा रहा ता उम्र
कि मैं हो जाऊं खुश
जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता

नहीं जानता कि ठीक किस
किस बिन्दु पर पहुंचना होता है आदमी का खुश होना
कितना फर्क होता है दुःख और खुशी में
कि खुशी आदमी को किस अक्षांश और शर्तों और
कितनी जुगत के बाद मिलती है
वह ठहरती है कितनी देर
क्या उतनी जितनी ठहरती है ओस की बूंद हरी
घासों पर
या उतनी जितनी फूटे हुए अंडों के बीच चूजे
हालाॉकि वह समय निकल चुका है विचार करने का
कि क्या नहीं रहा जा सकता खुशी के बगैर
तो फिर आखिर में इतने दिन कैसे रहा बगैर खुशी के

शायद खुशी की तलाश में जी जाता है आदमी
पूरी-पूरी उम्र

और यह सोचकर भी खुश नहीं होता
जबकि उसे होना चाहिए
कि वह तमाम उम्र
खुशी के बारे में सोचता
और जीता रहा
उसकी कभी न खत्म होने वाली तलाश में'
सीधी-सादी सपाट सी लगने वाली यह कविता उम्मीद को ओर इशारा करती है कि आज भी आदमी अपनी उम्मीद को और खुश होने की उम्मीद को, सबसे बड़ी चाह एकमात्र यह रह गयी है यह नहीं कि हम सम्पन्न हों, बड़े समृद्ध हों, अनेक आशाएं लोग पालते हैं। कोई क्रांतिकारी बात नहीं कही गयी है लेकिन जिस ढंग से पूरी चीज़ कही गयी है, वह क्रांतिकारी लगती है।
मदन कश्यप- कहने का ढंग अपना है। हृदय को छूने वाला ढंग है।
डॉ.नामवर सिंहः सवाल यह है कि खुशी भी तो मिले लेकिन मिलने के बाद वह ठहरती है कितनी देर है। करीब उनकी पैंतालीस कविताएं हैं। और उनकी दूसरी कविता है 'तोड़ने की शक्ति'। उनकी कुछ कविताएं उनकी बेटी पर हैं।
मदन कश्यप-पांच कविताएं बेटी पर हैं।
डॉ.नामवर सिंहः बहुत अच्छी। उसकी आखिरी कविता है 'उपलब्धि'। बच्चियों के बारे में बहुत सी कविताएं लिखी गयी हैं लेकिन जिस आत्मीयता से यह लिखी गयी है, उन्होंने केवल पिता की दृष्टि से नहीं लिखी हैं बल्कि माता-पिता दोनों की दृष्टि लिखी हैं-
'तुम वह हो जहां मुझमें खुद को पाया है तुम्हारी मां ने
जहां हम दोनों ने मिटा दिया है अपना स्वतंत्र अस्तित्व
तुम हमारी संधि हो
तुम हो हमारा सेतु
तुम हो वह
जहां से
हम चाहें भी तो लौट नहीं सकते अपने आप तक
तुम हमारे स्व के खोने की परिभाषा हो
तुम हमारे विलय की उपलब्धि हो.
तुममें झांकती है मेरी मुस्कान
तुम्हारे स्वर में है तुम्हारी मां की तान
तुममें मेरी शरारतें कहीं छिपी हैं
मां की आदतें तुममें रची बसी हैं
मेरी संवेदनशीलता तुमसे बंधी है
तुम्हारी मां की काया तुममें नधी है.
पर हम नहीं चाहते
तुम बनो हमारा प्रतिरूप
तुम पाओ प्रकृति से अपने होने की धूप
अपना छंद ही तुम्हें साधेगा
हम दोनों में वह शत्रु होगा
जो तुम्हें बांधेगा.'
मदन कश्यप-पुराने समय से लिखी जा रही हैं ऐसे कविताएं। मदन वात्स्यायन ने लिखी है स्वाति के लिए. और उस समय से लेकर एक लम्बी परम्परा है उसमें वे कुछ अलग जोड़ते हैं..
डॉ.नामवर सिंहः इस कविता के अन्त में कहा है..हम तुमको मुक्त करते हैं। यह नहीं कि तुम हमारी अनुकरण बन रही हो। कुछ हमारे गुण हो कुछ मां के गुण हों इसके अलावा भी तुम स्वतंत्र हो अपना व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए। यह अपनी बेटी को शुभकामना
अनेक कविताएं इसमें संवाद के लिए,,
मदन कश्यप- कोलकता का जो महानगरीय जीवन है, जो लोकल में चढ़ने का जो संघर्ष है, वहां के यथार्थ को, मुझे लगता है वहां भी वे एक अच्छे कवि के रूप में...
डॉ.नामवर सिंहः 'हंसी की तासीर' एक कविता है, 'करतूतें' भी हैं, तो यह कविताएं, 'सपने' के बारे में हैं तो
मदन कश्यप-अभिज्ञात चूंकि रहते हैं बंगाल में, हैं तो हिन्दी भाषी ही। वहां शायद लम्बे अरसे से रहते हैं
डॉ.नामवर सिंहःअपने अनुभव की बात को लिखा है कि शायद उन्नीस साल बाद लौटा था गांव और इन्तजार कर रहा था कुंए पर बैठे लौटने वालों का। बच्चे जो गये थे स्कूल वगैरह वगैरह..। तो शहर कलकत्ता से जो अपने गांव आते हैं, उसका भी अनुभव है।
मदन कश्यप-यह दो यथार्थ है वह दूर-दराज के कवियों के माध्यम से व्यक्त होता रहा है। और उस पर ध्यान कम ही जाता है लोगों का। मुझे लगता है कि हिन्दी कविता की शक्ति है वह।
डॉ.नामवर सिंहः अपना एक अलग व्यक्तित्व व्यक्त करता है यह आदमी जो आम तौर पर जो कविताएं लिखी जाती हैं उसी तरह की ये नहीं हैं।
मदन कश्यप- यह जो प्रचलित सांचा प्रचलित ढांचा है, हमारे समय में जो काव्य-रूढ़ियां हैं उनसे ग्रस्त नहीं हैं ये कविताएं
डॉ.नामवर सिंहः बिल्कुल मुक्त भाव से अपनी छाप, अपने निजीपन की छाप उनकी हर कविता में है। वह चीज आकृष्ट करती है मेरा खयाल है ऐसे ज़माने में जब सांचे में ढली कविताएं दिखायी पढ़ती हैं शहरों में रहने वाले लोगों को तो हिन्दी इलाके से दूरदराज कलकत्ते में रहता हुआ कवि एक अपनी पहचान अलग बनाती हुई कविताओं को सामने ले आया है और परिपक्व हो चुके हैं क्योंकि यह सातवां कविता संग्रह है।
मदन कश्यप- यहां आते-आते उनका मुहावरा बन चुका है और आपने उनके उस मुहावरे की और उनकी पहचान को रेखांकित कर दिया तो वे और भी आगे जायेंगे। आपको बहुत बहुत धन्यवाद
डॉ.नामवर सिंहःआपको भी।

Monday, February 13, 2012

बांग्ला फ़ीचर फिल्म में डॉ.अभिज्ञात का अभिनय व हिन्दी कविता


नेचर पार्क में बांग्ला फिल्म "एक्सपोर्टः मिथ्या किन्तु सत्य" के एक दृश्य में बाएं से डॉ.अभिज्ञात पुलक देव








नेचर पार्क में बांग्ला फिल्म "एक्सपोर्टः मिथ्या किन्तु सत्य" के सेट पर बाएं से डॉ.अभिज्ञात, समीर बनर्जी पुलक देव









कोलकाताः भ्रूण के निर्यात जैसे गंभीर विषय को पूरी शिद्दत से उठाने वाली बांग्ला फ़ीचर फ़िल्म "एक्सपोर्टः मिथ्या किन्तु सत्य" में हिन्दी के सुपरिचत कवि-पत्रकार डॉ.अभिज्ञात ने अभिनय किया है। इस फिल्म में न सिर्फ़ उन्होंने एक कवि की भूमिका निभाई है बल्कि स्वयं अपनी हिन्दी कविता सुनाई है। अपने नये कवि संग्रह 'खुशी ठहरती है कितनी देर' में संग्रहित कविता 'करतूतें' का कुछ अंश उन्होंने इसमें पढ़ा है। सोमवार 13 फरवरी 2012 को कोलकाता के 'नेचर पार्क' में उन्होंने फिल्म की अपनी शूटिंग पूरी की। अपने छात्र जीवन में डॉ.अभिज्ञात रंगमंच से जुड़े थे और उस दौर में उन्होंने अभिनय और नाट्य निर्देशन किया था। उसके कुछ वर्ष बाद उन्होंने एक बांग्ला धारावाहिक 'प्रतिमा' में अभिनय किया था और एक डॉक्टर की भूमिका निभाई थी। अब वे स्वयं अपने चरित्र को ही बड़े परदे पर साकार कर रहे हैं।
फिल्म का विवरण इस प्रकार है-फिल्म बी आइडियल की प्रस्तुति, प्रोड्यूसर-प्रसन्न कुमार राय, कहानी, स्क्रिप्ट और निर्देशन-समीर बनर्जी। अभिनयः शुभाशीष मुखर्जी, अरुण मुखर्जी, स्वागत, पुलकिता घोष, विश्वजीत चक्रवर्ती, महेश कौशिक, चंद्रचूर, पूजा बनर्जी, डॉ।अभिज्ञात, पुलक देव। प्रोडक्शन टीमः चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर-अरुणांशु चौधरी, असिस्टेंट डाय़रेक्टर-प्रतीति घोष, स्वपन नंदी, अरनब साह, समीर राय, सिनेमेट्रोग्राफी-विनोद गौतम, एडिटिंग-कृष्णा कान्त पाल, आर्ट डायरेक्टर-मानिक भट्टाचार्य, संगीत-राजा राय। कुल दो रवीन्द्र संगीत-जाते जाते एकला पथे व जा हासिए जाय। दोनों की गायिका जया विश्वास। फ़िल्म की शूटिंग का काम लगभग पूरा हो चुका है। कुछ दिन की शूटिंग और बची है।


Tuesday, December 20, 2011

तुम्हारा साथ रहे तो नर्क तक की यात्रा भी सुखद रहेगी-अदम गोंडवी

अदम गोंडवी की मौत की खबर सदमा देने वाली है। उस मनहूस सुबह यह खबर मुझे सबसे पहले जयपुर से लेखक-पत्रकार मित्र चंडीदत्त शुक्ल ने दी। जिस सांकेतिक भाषा में वह एसएमएस था उससे मुझे सिर्फ यह लगा कि उनकी सेहत को लेकर चिन्तित हैं और सरकार-गैरसरकारी सुविधाओं की कमी उन्हें खल रही हैं। सन्मार्ग के दफ्तर पहुंचा तो भाषा व वार्ता दोनों पर उनकी मौत की खबर थी। वे एक क्रांतिकारी शायर थे लेकिन व्यक्तित्व में उतने ही मोहक आत्मीय और सादगीपसंद। उनसे कुछेक मुलाकातें हैं और विदिशा से लेकर कोलकाता तक संग साथ की यादें। फिलहाल उनका एक पत्र आपसे शेयर कर रहा हूं आग उगलने वाले शायर के कोमल भावों को व्यक्त करता है। उन पर और बातें जल्द...
5 अप्रैल 1992
प्रिय भाई,
आपने कभी लिखा था-क्यों अच्छे लगते हो केदारनाथ सिंह। अब उसे मूर्त रूप देते हुए लगभग 50-60 पेज पृष्ठों में समायोजित करके मेरे पास भेज दीजिए। यहां अवध विश्वविद्यालय कुछ कवियों पर एक लेख माला छपवा रहा है उसका संपादन मेरे मित्र प्राध्यापक श्री जयनारायण बुधवार कर रहे हैं। मैंने उनसे वादा कर लिया है कि केदार जी पर आप लिखेंगे। लेख धांसू होना चाहिए एकदम कलेजा फाड। मई के पहले सप्ताह तक भेज दें कृपा होगी।
मैंने पहले भी कहा था शांतिनिकेतन या पुरी के लिए कार्यक्रम बनाइए। वैसे तुम्हारा साथ रहे तो नर्क तक की यात्रा भी सुखद रहेगी।
आटा- परसपुर, गोण्डा, उत्तर प्रदेश

Friday, November 25, 2011

सुपर ब्लास्ट


कहानी
साभारःकथादेश, नवम्बर 2011

दुनिया भर में दिमागी तनाव से मरने वालों की संख्या में लगातार इज़ाफा हो रहा था। युवाओं और छात्रों में दिमागी तनाव के बढ़ने से पूरी दुनिया चिन्तित हो उठी थी। कुछ वैज्ञानिकों का कहना था कि यह ग्लोबल वार्मिंग के घातक नतीज़ो में से एक है तो कुछ ने आधुनिक जीवन शैली को इसका कारण बताया। कुछ लोगों का मानना था कि बच्चों पर अध्ययन का अत्यधिक बोझ इसका कारण है। कुछ वैज्ञानिक फास्ट फूड
, कोल्डडिं्रक्स के सेवन को इसका कारण मान रहे थे। सामाजिक अध्ययन से जुड़े विद्वानों का कहना था कि सामाजिक मूल्यों में विघटन और असुरक्षा की बढ़ती प्रवृत्ति इसका कारण है तो कुछ ने माता-पिता के बीच तलाक को इसका कारण गिनाया था। लेकिन किसी एक निष्कर्ष तक पहुंचना कठिन था। ये घटनाएं उन समाजों में भी घट रही थीं जहां आधुनिक जीवन-शैली का बहुत प्रभाव नहीं था फास्ट फूड का प्रचलन कम था या तलाक की घटनाएं विरल थीं।

लेकिन वस्तु-स्थिति यही थी कि किशोरों-युवाओं में ब्रोन हेमरेज से होने वाली मौतों में लगातार इज़ाफा हो रहा था। इन मौतों की जांच के लिए संयुक्त राष्ट्र ने एक विशेष अंतर्राष्ट्रीय प्रकोष्ठ का गठन किया। जिसमें भारतीय दल का नेतृत्व अप्रतिम सिंह को सौंपा गया था। तेरह वर्षीय इकलौती बेटी श्रेया और शास्त्रीय संगीत की गायिका पत्नी शोभा उनके साथ रहती थी। माता-पिता उत्तर प्रदेश के जौनपुर के एक गांव में थे। छत्तीस वर्षीय अप्रतिम एक मनोवैज्ञानिक थे और उन्होंने साइको सिमेटिक इफेक्ट पर कैम्ब्रिाज में शोध किया था। हालांकि गणित उनकी व्यक्तिगत रुचि का विषय था, लेकिन पढ़ायी के दिनों में एक मित्र के साथ उन्होंने मनोविज्ञान की क्लास की थी और मनोविज्ञान उन्हें इतना भाया कि गणित से एमएससी के बाद मनोविज्ञान की विधिवत पढ़ायी की और उसे ही पेशा भी बनाया। वे कोलकाता में एक केन्द्रीय संस्थान में कार्यरत थे। प्रकोष्ठ के गठन के बाद उन्हें एक विशेष दर्जा दिया गया था और उन्हें जो टास्क दिया गया था केवल उसी पर अपना ध्यान केन्द्रित करना था। उन्हें दस लोगों की एक टीम दी गयी थी जिसका चयन उन्होंने विभिन्न सरकारी कार्यालयों में कार्यरत लोगों में से किया था, जो विभिन्न सेवाओं में थे। उन्होंने डॉक्टरों, शिक्षाविदों से लेकर खुफिया विभाग तक के लोगों को अपनी टीम में लिया था।

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अप्रतिम की बेटी ने पिता की ही रुचियां पायी थी। गणित से उसे भी दीवानगी की हद तक लगाव था और पिता से ज़िद कर वह गणित का विशेष पैकेज विश्वास थियरम आफ आईक्यू लाने की ज़िद कर रही थी जिससे आईक्यू विकसित होता है। अप्रतिम इसके घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि किसी भी चीज़ का स्वाभाविक विकास ही होना चाहिए। बच्चों का कद बढ़ाने, उनके स्वास्थ्य में ताबड़तोड़ सुधार करने की दवाओं उपकरणों के इस्तेमाल के साथ- साथ मानसिक क्रिया कलापों में वृद्धि करने वाले तौर-तरीकों के भी विरोधी थे, जिनमें विश्वास थियरम आफ आईक्यू भी था।

उनकी बेटी के गणित के प्रति लगाव की चर्चा उनके सहकर्मियो में भी थी और एक दिन एक अधिकारी ने उनकी बेटी के जन्म दिन पर तोहफ़े के तौर पर आईक्यू थियरम दिया तो उसे उन्होंने उसे खोलकर उत्सुकता से देखा फिर अपनी आलमारी में लाक कर दिया।

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आतंकियों का एक दल पकड़ा गया था और उनके पास से जो चीज़ें पायी गयी थीं उनमें आईक्यू थियरम भी था। खुफिया विभाग से जुड़े उनकी टीम के अधिकारी ने जब उन्हें बात-बात में यूं ही बताया तो वे एकाएक चौकन्ने हो गये। इस बात की चर्चा खुफिया अधिकारी ने उनमें इसलिए भी की थी क्योंकि उसी ने यह थियमर खरीदकर अप्रतिम की बेटी को जन्मदिन का उपहार दिया था।

अप्रतिम के लिए यह सूचना चौंकाने वाली थी। उन्होंने अपने घर की आलमारी में पड़े थियरम को निकालकर कार्यालय ले गये और उसे गौर से देखा। फिर आतंकियों के पास से बरामद थियरम की कापी प्राप्त की। दोनों का मिलान करने पर उन्हें एक नयी बात पता चली वह यह कि दोनों ही सवाल शुरू तो एक तरह से होतें हैं कि आतंकियों के पास से बरामद सवाल छोटा है वह आगे बहुत विस्तृत नहीं है।

अप्रतिम दोनों की देर तक तुलना करते रहे किन्तु आतंकियों के पास से आईक्यू थियरम के बरामद होने, उसके बाजार में उपलब्ध थियरम से संक्षिप्त होने के सम्बंध की पड़ताल में जुट गये।

वे गणित का छात्र होने के कारण वे थियरम की उत्पत्ति व उसके वैज्ञानिक के सम्बंध मे पढ़ चुके थे किन्तु उन्होंने डॉ.विश्वास की मौत की फाइलें खुलवायीं जो उनकी मौत को स्वाभाविक मौत का मामला मानकर दो साल पहले ही बंद कर दी गयी थीं।

उन्होंने खुफिया शाखा से मदद दी और कई चौंकाने वाली जानकारियां उनके हाथ आयीं। उसका ब्यौरा इस प्रकार थाः

गणित में डॉ.मिहिर विश्वास को गहरी दिलचस्पी विषय थी। और बाकी विषयों में वे अक्सर वह फेल होते रहते थे। उन्हें मौज़ूदा शिक्षा पद्धति से इसलिए बहुत सारी शिकायतें भी थीं। उनका मानना था कि हर व्यक्ति हर कार्य कर ही नहीं सकता। हर आदमी की अपनी शारीरिक और मानसिक बनावट है। उसकी बनावट कै विशिष्ट को जांचने परखने के तरीक़े शिक्षाजगत को विकसित करने चाहिए और कच्ची उम्र में ही उसका निर्धारण कर उसे उन्हीं विषयों शिक्षा का अवसर प्रदान करना चाहिए जिसमें उसकी गति हो। दूसरे यह कि सामान्य विषयों का दस वर्ष तक और उसके बाद भी विशेषीकृत विषय के अध्ययन के निर्धारण में पास साल और बरबाद करने की आवश्यकता क्या है। टेन प्लस टू, प्लस थ्री, प्लस टू तक की 17 वर्ष की शिक्षा के बाद भी शोध की मानसिक ज़मीन पूरी तरह तैयार नहीं होती क्योंकि उसमें से पंद्रह वर्ष को विद्यार्थी की दिमाग विविध विषयों की और बंटता रहता है और अपने प्रिय विषय के अतिरिक्त भी अन्य विषयों का अध्यनन न किया जाये तो आगे की शिक्षा का मार्ग अवरुद्ध हो जायेगा। वे चाहते थे कि आठवीं के बाद ही विज्ञान, कला या वाणिज्य के विषयों का बंटवारा हो जाये और दसवीं के बाद विशेषीकृत एक विषय के अध्ययन का सुयोग छात्रों को मिले जैसा मास्टर डिग्री में होता है। इससे 17 वर्ष की शिक्षा के पहले ही किसी भी विषय में छात्र स्वतंत्र लायक हो जायेगा। यहां तक कि उससे पहले भी। उनके शिक्षा सम्बंधी नज़रिये की शिक्षा जगत में खासी चर्चा थी और वे विवादास्पद माने जाते थे।

लेकिन वे शिक्षाविद नहीं कहलाना चाहते थे वे तो बस गणित की गुत्थियों को सुलझाने में लगे थे और गणित को आम लोगों के लिए उपयोगी बनने दिशा में प्रयत्नशील। वे चाहते थे कि संख्याओं का यह शुष्क लगता संसार आम आदमी के जीवन में तब्दीली लाये। उन्होंने गणित के कई सूत्र दिये थे और ऐसे सवाल रचने में लगे थे जिसको हल करने से लोगों की तर्क शक्ति विकसित हो, उनकी निर्णय क्षमता का विकास हो चाहे और वह हर वर्ग के लिए उपयोगी हो। हर क्षेत्र में कारगर। वे मानते थे कि गणित मनुष्य के विचारों को सुसंगत करने की एक विधि के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। गणित की सामाजिक जिम्मेदारी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। उन्हें जो बात सालती थी वह यह कि सूत्रों को रट कर गणित हल न किया जाये। गणित को हालांकि तार्किक विषय माना जाता है। समस्या को समझने और उसके समाधान के खोजने की क्षमता का विकास ही गणित का मकसद होता है किन्तु फिलहाल यह फार्मूलों पर आधारित है। यह फार्मूले रटे जाते हैं और कुछ दिन के अन्तर में उन्हें याद न किया जाये तो वे दिमाग से निकल जाते हैं और वे याद न रहें तो समस्या को सुलझाना मुश्किल हो जाता है, भले पूरी मैकेनिदज्म का जानकारी हो। वे कुछ ऐसे सवाल बनाना चाहते थे जो बिना सूत्र के हल हो अपनी तार्किक शक्ति के बूते और उसको जैसे जैसे आगे हल किया जाये वैसे वैसे उसकी निर्णय क्षमता का विकास हो।

उन्होंने बरसों गुज़ार दिये जनोपयोगी गणित का एक सवाल बनाने में और उन्होंने पैंसालीस साल में एक सवाल बना लिया। यह एक ऐसा सवाल था जिसमें कई चरण थे और हर चरण पर हां और ना की गुत्थियां थी और एकदम विपरीत जाने वाली संभावित दिशाएं।

इस गणित के इस सवाल से वे खासे परेशान भी होने लगे थे। यह सवाल कई चरणों बाद अत्यधिक जटिल होने लगा था और और उसे हल करने में वे अस्वस्थता महसूस करने लगते थे। दिमागी तनाव बढ़ जाता था। उन्हें लगा कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। उन्होंने एक स्नायुविज्ञानी मित्र डॉ.एमएस माधवन से इसकी चर्चा की। तनाव अध्ययन में मदद मांगी। डॉ.माधवन बरसों तक अमेरिका के एक प्रतिष्ठित संस्थान में निदेशक रह चुके थे। फिलहाल वे भारत में एक विदेशी हास्पिटल के मेंटर थे। वे बारहवीं कक्षा में साथ पढ़े थे। उसके बाद डॉ.विश्वास ने मैथ ले लिया और डॉ.माधवन ने बायलोजी, और दोनों की दिशाएं बदल गयीं। फिर भी दोनों के बीच सम्पर्क बना रहा था।

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दोनों पुराने मित्रों ने मिलकर विज्ञान का एक ऐसा प्रयोग शुरु किया था जहां गणित और स्नायविक अध्ययन की साझेदारी थी। विश्वास के गणित को हल करने से पैदा होने वाले मानिसक तनाव का अध्ययन माधवन कर रहे थे। मानसिक संवेगों के उतार-चढ़ाव के अध्ययन के लिए उपकरण लगाये गये। और विश्वास ने गणित का सवाल हल करना शुरू किया।

और पाया गया कि जैसै-जैसे चरण आगे बढ़ता था मानसिक तनाव क्रमशः बढ़ रहा है। और मार्के की बात यह थी कि यह

क्रमिक था। उसका कारण दोनों को यह समझ में आया प्रत्येक चरण में एक साथ ही हां और ना का लगभग एकसाथ आया खयाल ही उसका कारण है जिसमें से हल करने वाले को हां या ना में से एक को चुनना होता था और अगले चरण में आगे बढ़ जाना था। इस सवाल की अद्भुत विशेषता यह थी कि वास्तव में हां में आगे बढ़े तो भी अगली राहें खुलती थी और ना में भी उसी प्रकार। और यही क्रम आगे बढ़ता था। दरअसल इस गणित का कोई सही हल नहीं था बल्कि यह उलझनों का

एक सिलसिला था जिसको सुलझाने के बाद दूसरी एक और उलझन सामने होती थी।

अब दोनों के सामने प्रश्न यह था कि इस सवाल को आगे कितना बढ़ने दिया जाये कि वह खतरनाक न हो। किस हद तक आदमी का दिमाग मानसिक संवेगों का तनाव बर्दास्त कर सकता है। विश्वास चाहते थे कि मनुष्य की तनाव बर्दास्त करने की क्षमता तक ही इस सवाल को सीमित रखा जाये। आगे का सवाल काट दिया जाये, वरना वह आदमी की जान के लिए घातक हो सकता था।

पते की बात यह है कि उन्होंने इस सवाल का कुछ छात्रों पर आंशिक तौर पर प्रयोग भी किया था और पाया था कि इस गणित को हल करने से उनके आईक्यू का विकास हो रहा है। इस एक गणित को जितनी बार भी हल करने की शुरूआत की जाये हर बार नया ही लगता है क्योंकि उसके सवाल याद नहीं होते यह गणित की रंटत सूत्रबद्धता के विपरीत था। इसलिए यह सवाल विश्वास के पूरे जीवन की कुल उपलब्धि हो सकता था किन्तु वे हर तरह के प्रयोग के बाद ही इस सवाल को गणित की दुनिया में सामने लाना चाहते थे।

उन्होंने डॉ.माधवन से कहा कि वे अब और जोखिमपूर्ण स्थिति की ओर बढ़ना चाहेंगे। डॉ.माधवन उपकरणों पर चौकसी से निगाह रखें और जितना तनाव एक आदमी झेल सकता है उसकी सीमा पार होने से पहले ही उन्हें सिगनल दें ताकि वे आगे का सवाल हल न करें।

और दोनों ने प्रयोग शुरू किये। डॉ.विश्वास गणित हल करने लगे और उनके दिमाग अध्ययन के लिए उनके शरीर में उपकरण लगे थे। जिनका अध्ययन डॉ.माधवन उपकरणों की रीडिंग के सहारे कर रहे थे। डॉ.विश्वास हल के चरण बढ़ाते गये और इधर उपकरण उनके दिमागी तनाव की बढ़त दर्शाता गया। विश्वास तनाव बढ़ने के साथ ही असहज महसूस करने लगे किन्तु वे आगे बढ़ते रहे क्योंकि उन्हें यह नहीं पता था कि कोई मनुष्य अधिकतम कितना तनाव बर्दाश्त कर सकता है। इस पर तो माधवन नज़र रखे ही हुए हैं। उनका आगे बढ़ने से रुक जाने का सिगनल अभी तक नहीं मिला है। और यह क्या। एकाएक तनाव से मुक्ति का उन्हें एहसास हुआ। एक ऐसी राहत महसूस हुई जिसका एहसास उन्हें पहले कभी नहीं हुआ था। और फिर एहसास भी गुम हो गया।

डॉ.विश्वास के दिमाग की नसें फट गयीं थीं, जबकि डॉ.माधवन के चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

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डॉ.विश्वास की मौत अखबारों की सुर्खियों में थी। गणित के प्रति एक समर्पित व्यक्तित्व के तौर पर उन्हें याद किया गया था। और उनके शिष्य डॉ.शशांक तिवारी ने उनकी शोक सभा के बाद एक प्रेस कांप्रेंस की थी जिसमें डॉ.विश्वास के बनाये एक गणित के सवाल का खुलासा किया गया जिसको हल करने से किसी भी व्यक्ति का आईक्यू बढ़ जाता है। यह डॉ.विश्वास का वह शोध कार्य था जिसकी चर्चा उन्होंने जीते जी नहीं की थी और यह उनकी ज़िन्दगी की कुल कमाई थी। सवाल के निष्कर्षों पर दुनिया भर में चर्चा हुई और आईक्यू बढ़ाने में उसे कामयाब पाया गया। वियेना में अंतर्राष्ट्रीय गणित सम्मेलन में इसे मान्यता दी गयी और वह सम्मेलन डॉ.विश्वास को समर्पित किया गया। इस अवसर पर डॉ.विश्वास के नाम पर विश्वास थियरम नाम दिया गया और गणित के पाठ¬क्रमों के लिए मान्य कर दिया गया। छात्रों के मानसिक विकास के संसाधनों में एक और इज़ाफा हो गया था। यह गणित का हल विविध आकर्षक सजावटों के साथ पूरी दुनिया के बाज़ार में उपलब्ध था।

बाकी दुनिया की तरह डॉ.शशांक भी अपने गुरु की मौत की वजह बस यह जानते थे कि उनकी मौत ब्रोन हेमरेज की वज़ह से हुई है। गणित के सवाल से दिमागी तनाव बढ़ने की प्रवृति के प्रयोगों के बारे में वे एकदम नहीं जानते थे और ना ही पूरी दुनिया के गणितज्ञों का ध्यान इस ओर गया।

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अप्रतिम के सामने कुछ बातें साफ़ थीं। आतंकियों को थियरम का जितना अंश हल करने को दिया गया था उससे उनका मानसिक तनाव बढ़ता था दूसरे उलझनपूर्ण परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने में भी वह सहायक था। जो लोग आतंकियों का इस्तेमाल कर रहे थे उनका इतना ही मकसद था। आगे का थियरम इसलिए नहीं दिया गया था क्योंकि इसको हल करने से आतंकियों की अपनी जान का खतरा था।

अप्रतिम ने अपनी जानकारियों को वियेना में टास्क फोर्स की इमरजेंसी मिटिंग में रखा। और फिर नयी जानकारियों के आधार पर युवाओं की मौत की जांच शुरू हुई तो पाया गया कि जिनकी मौत हुई है वे किसी न किसी रूप में गणित से जुड़े थे और इस थियरम के अलग-अलग चरणों को हल करते समय अस्वस्थ होने के बाद अस्पताल जाकर या सवाल हल करते समय हुई थी। पाठ¬क्रमों से विश्वास थियरम हटा दिया गया। बाजार से आईक्यू थियरम के जो भी रूप थे वह जब्त करके नष्ट कर दिये गये। थियरम को गलत साबित करके उस पर हर रूप में प्रतिबंध लगा दिया गया। डॉ.विश्वास के गणितीय सिद्धांत को फरेब बताया गया और कहा गया कि उससे आईक्यू में विकास के सारे दावे झूठे हैं और कपोल-कल्पित हैं। अलबत्ता यह नहीं बताया गया कि उनका थियरम खतरनाक़ और जानलेवा है। इससे कानून-व्यवस्था में अराजकता फैल जाने का खतरा था और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तीव्र प्रदशर्नों की आशंका थी। उससे आसान था विश्वास का मानमर्दन। ग़लती दरअसल यह भी थी कि स्वयं डॉ.विश्वास ने इस थियरम का निर्माण तो किया था किन्तु स्वयं उन्होंने उसे न तो सार्वजनिक किया था और न ही स्वयं मान्यता दी थी। वह अभी जांच-परख के स्तर पर ही थी और उनकी मृत्यु के बाद उसे सार्वजनिक कर दिया गया था जिससे यह मुसीबत खड़ी हो गयी थी।

डॉ.विश्वास के क़ातिल डॉ.माधवन की फाइलें तैयार की जाने लगीं और उनकी गतिविधियों पर पहरे लगा दिये गये। वे इन दिनों दुबई में रह रहे थे, जहां एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशाला उन्होंने बना रखी थी जहां विज्ञान के विषयों पर कई प्रकार के काम होते थे।

डॉ.माधवन से जुड़ी सारी सूचनाओं की पल-पल की जानकारी अप्रतिम को मिलती रहती थी। अप्रतिम इस अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक से पूछताछ करने की इजाजत इंटरपोल से मांग रहा था जिसमें दिक्कतें आ रही थीं। डॉ.माधवन ने दुबई की नागरिकता ले रखी थी।

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इधर पूरी दुनिया में मोबाइल फ़ोन, कम्प्यूटर और इंटरनेट का रुतबा लगातार बढ़ रहा था। साथ ही साथ पूरी दुनिया में आतंकी गतिविधियों में इनके उपयोग की घटनाओं की बाढ़ आ गयी थी और आतंकी मोबाइल से लेकर कम्प्यूटर बमों का इस्तेमाल करने लगे थे। दुनिया के अलग-अलग देशों में मोबाइल फोन और कम्प्यूटर बम समय-समय पर फटने लगे थे जो चिन्ता का कारण बना हुआ था। फोन और कम्प्यूटर कैसे बम में तब्दील हो जाते हैं इस बात की खोज चल रही थी।

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अप्रतिम अब दिल्ली के कार्यालाय में बैठने लगे थे। उनका परिवार कोलकाता में ही था। बेटी श्रेया का मैथ के प्रति रुझान बरकरार था। वह उत्साहित थी। सुपर मैथ काम्पीटीशन को लेकर। दुनिया में मैथ को बढ़ावा देने के लिए एक कंपनी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रतियोगिता करा रही थी जिसमें एक हजार विजेताओं को एक-एक करोड़ की राशि पुरस्कार स्वरूप प्रदान की जानी थी। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए आनलाइन नामांकन हो रहे थे जिसमें श्रेया ने भी अपना नामांकन कराया था। नामांकन के बाद आनलाइन सुपरमैथ काम्पीटीशन में भाग लेने की तिथि और नियमों की जानकारी उसे ई-मेल से मिल गयी थी। प्रतियोगिता में घर बैठे आनलाइन भाग लेना था। जिनके घर पर कम्प्यूटर, लैपटाप या इंटरनेट की सुविधा नहीं थी उन्होंने पहले ही अच्छी खासी रकम चुकता कर साइबर कैफै में टेबुल बुक करा ली थी। पूरी दुनिया में एक ही समय प्रतियोगिता शुरू होनी थी। सवाल आनलाइन भेजे जाने थे और आनलाइन ही उसको हल करना था। इस बात का पूरा रिकार्ड उसमें रहेगा कि किस सवाल को कितने सेंकेडं या मिनट में किसने हल किया। उसी के आधार पर मूल्यांकन होना था। धांधली की कोई गुंजाइश नहीं थी। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कई लोगों के घर पहली बार कम्प्यूटर खरीदा गया क्योंकि साइबर कैफै में भी जगहें बुक हो चुकी थीं।

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इधर, अप्रतिम को खुफिया जानकारी मिली कि डॉ.माधवन के रिसर्च सेंटर में मोबाइल और कम्प्यूटर से जुड़े कार्यक्रम भी बनाये जाते हैं तो वह चौंका।

उसने हाल की आतंकी गतिविधियों के तौर तरीकों की जांच शुरू करवाई तो पता चला कि कोई ई-मेल मैसेज आया और उसे खोलते ही मोबाइल फोन डेढ़ मिनट के भीतर बम की तरह फट उठता था। यही हाल कम्प्यूटर का भी था। कोई खास ई-मेल खोलने के डेढ़ मिनट बाद ही कम्प्यूटर बम की तरह फट जाता था।

इसका मतलब क्या था? इसका डॉ.माधवन से किस तरह का सम्बंध हो सकता है? क्या डॉ.विश्वास के थियरम की कम्प्यूटरीकरण कर दिया गया है? उसने तत्काल कम्प्यूटर विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों से सम्पर्क साधा। उनसे सलाह ली। उनसे अप्रतिम ने पूछा कि क्या कम्प्यूटर में ऐसी प्रोग्रामिंग की जा सकती है कि किसी जगह हां और ना की स्थिति एक साथ पैदा हो और ब्लास्ट हो जाये। उन्होने कहा ऐसा मुमकिन है। और यह भी मुमकिन है कि वह मोबाइल पर एसएमएस खुलने के बाद एक्टीवेट हो जाये और फिर बंद करने पर भी बंद न हो ब्लास्ट हो जाये। ई-मेल से भी यदि वह प्रोग्राम भेज दिया जाये तो वह एक्टीवेट हो सकता है और ई-मेल बम में तब्दील हो सकता है। दरअसल कम्प्यूटर एक सुपर ब्रोन ही है। यदि विपरीत तर्कों से उठने वाली वेब को आपस में टकरा दिये तो ब्लास्ट हो सकता है। सम्भवतः ऐसा ही प्रोग्राम मोबाइल फोन और कम्प्यूटरों पर ई-मेल से भेजा गया हो जिससे विस्फोट हुए।

अप्रतिम ने तुरंत अपनी बेटी को कोलकाता फोन मिलाया। उससे सुपर मैथ काम्पपीटीशन की तारीख और समय पता किया। वह उत्साह में थी। जब उन्होंने उसे काम्पीटीशन में भाग लेने से मना किया तो वह रोने लगी। आखिरकार उन्होंने ही अपनी जिद छोड़ दी और कहा ठीक है भाग लो और एक करोड़ में मेरा आधा हिस्सा रहेगा। वह इस बात पर राजी थी।

दुनिया भर में कई करोड़ लोग इस सुपरमैथ काम्पीटीशन में भाग लेने वाले थे, जिसको मुश्किल से चौबीस घंटे बचे थे। अप्रतिम ने टास्क फोस की वियेना में इंमरजेंसी मीटिंग की बुलाने की मांग की और उसमें भाग लेने के लिए रवाना हो गया। वहां जो आशंका उसने व्यक्त की उसे सुनकर सबके होश उड़ गये। दुनिया भर में इतनी व्यापक तबाही की कल्पना से लोग सिहर गये। यह सुपर मैथ काम्पीटीशन नहीं बल्कि सुपर ब्लास्ट की योजना थी, जिसका प्रोग्राम डॉ.विश्वास के थियरम के आधार पर डॉ.माधवन ने आतंकियों के लिए तैयार किया था। घंटों बैठक चली कि क्या उपाय है इस प्रतियोगिता को रोकने का। प्रचार से कुछ नहीं होगा दहशत फैल जायेगी। और अन्ततः उपाय अप्रतिम ने ही सुझाया।

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अप्रतिम कोलकाता अपने घर लौटा। बेटी के चेहरे पर हंसी नहीं थी। वह क्यों उदास है का जवाब उसी ने दिया। वह मैथ काम्पीटीशन में भाग नहीं ले पायी। वह क्या कोई भी भाग नहीं ले पाया। ऐन वक्त पर सर्वर दगा दे गया। अखबारों में भी प्रकाशित हुआ था कि इतने अधिक लोगों ने सुपर मैथ काम्पीटीशन में भाग लेने के लिए लॉग किया कि सर्वर बैठ गया। कम्प्यूटर टेक्नालाजी अभी भी सर्वर पर निर्भर है और यह प्रणाली दोषपूर्ण है। आनलाइन परीक्षाओं की विफलता की कड़ी के इतिहास में यह विफलता शीर्ष पर है। अखबारों ने नयी टेक्नालाजी का जम कर माखौल उड़ाया था।

हालांकि बाद में एक छोटी सी एक खबर आयी थी कि वैज्ञानिकों ने एक सर्वर जैमर तैयार किया है और उसका चुपचाप तरीके से परीक्षण भी कर लिया गया, जो कामयाब रहा।

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Thursday, November 24, 2011

अभिज्ञात ने कई विलक्षण कविताएं लिखी हैं-केदारनाथ सिंह

हिन्दी-बंगला के दो शीर्ष कवियों ने किया खुशी ठहरती है कितनी देर का लोकार्पण













कोलकाताः अभिज्ञात ने कविता में गद्य का बेहतरीन प्रयोग करते हुए कई विलक्षण कविताएं लिखी हैं। एक अच्छे कवि के लिए अच्छा गद्यकार होना ज़रूरी है और यह अतिरिक्त बात उनके काव्य-व्यक्तित्व को अधिक अर्थवान बनाती है। वे कविता में क्रीड़ा-कौतुक करते हैं और भाषा व भावों के साथ खेलते हुए एक ऐसी रचनात्मकता अर्जित करते हैं, जो उनका अपना क्रिएशन है। यह कार्य हिन्दी कविता में नागार्जुन ही कर सकते थे। यह कहना है प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह का। वे 22 नवम्बर 2011, मंगलवार की शाम डॉ.अभिज्ञात के ‘कविता संग्रह खुशी ठहरती है कितनी देर’ के लोकार्पण समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से उसके कोलकाता केन्द्र में किया गया था। कवि केदारनाथ सिंह एवं बंगला के प्रख्यात कथाकार-कवि नवारुण भट्टाचार्य ने अभिज्ञात के काव्य संग्रह का लोकार्पण किया। केदार जी ने कहा कि यह विस्मयकारी लगा कि अभिज्ञात टूटाने की आवाज़ों का स्वागत करते कवि हैं। गा़लिब की तरह उन्हें भी टूटने की आवाज़ें अच्छी लगती हैं। अपनी कविता ‘तोड़ने की शक्ति’ में कहते हैं-‘जाने क्यों अच्छी लगती है मुझे टूटने की आवाज़ें’। इस भाव का जन्म काफी पहले कलकत्ता में मिर्जा ग़ालिब के यहां उस समय हुआ, वे जब कलकत्ता आये थे, शायद उन्होंने तभी ये शेर कहा होगा-‘ न गुल-ए-नग़्मा हूँ, न परदा-ए-साज़/मैं हूँ अपनी शिकस्त की आवाज़।‘ ग़ालिब कलकत्ता में ढाई साल रहे। यहां उन्हें नयी चेतना मिली।
वे अपने परिवेश के प्रति बेहद चौकन्ने हैं। यह बात उनकी दंगे पर लिखी कविता में विशेष तौर पर उभर कर आयी है। दंगे पर उन्होंने एक अच्छी कविता लिखी है ‘दंगे के बाद’। मेरठ में हुए दंगे पर नागार्जुन ने भी ‘तेरी खोपड़ी के अन्दर’ कविता लिखी थी। दोनों की कविताओं में साम्य यह है कि ये इस क्रिएटिव तरीके से लिखी गयी हैं कि वे दंगे पर सामान्यीकृत प्रतिक्रया नहीं हैं। सामान्य को कविता में किस प्रकार विशिष्ट बनाया जाता है वह काबिलियत अभिज्ञात ने अर्जित कर ली है। अभिज्ञात की एक और बात जो मुझे आकृष्ट करती है वह यह कि वे साहित्य की अतिरिक्त गंभीरता को तोड़ते हैं। कविताओं में कई जगह हास्य या व्यंग्य करते हैं, जिनमें क्रिड़ा भाव अनेक स्थानों पर मिलता है और वे बहुत सहज ढंग से बड़ीं बात कह जाते हैं। उसकी एक छोटी सी कविता ‘भगवान जी से’ का उल्लेख करना चाहता हूं। इसमें कवि ने भगवान से समान स्तर पर बात की है। भगवान का कोई आतंक नहीं है। ऐसा सिर्फ़ नागार्जुन कर सकते थे। एक वैराग्यपन की भाषा है अभिज्ञात की इस कविता में, यथा- ‘प्रभु! तुम्हारी छोटी सी मूर्ति के पास/ठीक नीचे रखे हैं झाड़ू और जूते चप्पल/उन्हें तुम इग्नोर करना वह तुम्हारे लिए नहीं हैं/
तुमसे अपील है कि तुम अपने काम से काम रखो /और वह जो फूल तुम्हारी मूर्ति के पास रखा है/और जली हैं अगरबत्तियां, जला है एक घी का दिया/बस वही तुम्हारे हैं, उतना ही है तुम्हारा तामझाम, माल असबाब/तुम वहीं तक सीमित रहो, और उतने में ही मगन
यह छोटा सा घर है मेरा, उसी में तुम्हें भी ज़गह दी है यही क्या कम है?’
इस संग्रह की बहुत अच्छी कविताओं में एक है ‘हावड़ा ब्रिज’। यह कविता कोलकातावासियों को खास तौर पर पढ़नी चाहिए। मैंने भी पुल पर कविता लिखी है। मेरी जानकारी में हावड़ा ब्रिज पर हिन्दी में ऐसी कविता नहीं लिखी गयी। उनकी कविताओं में हिन्दी से इतर भाषा के शब्द भी आये हैं, जो अच्छी बात है। शुद्धता हमेशा भाषा की शत्रु होती है। इस अवसर पर नवारुण भट्टाचार्य ने कहा कि जिस कवि की पुस्तक का लोकार्पण इस महाद्वीप के महान कवि केदारनाथ सिंह कर रहे हों, उसकी कविता पढ़ रहे हों, उन पर बात कर रहे हों, उसकी श्रेष्ठता अपने आप प्रमाणित हो जाती है। इसके पूर्व विश्वविद्यालय के कोलकाता केन्द्र के प्रभारी डॉ.कृपाशंकर चौबे ने कहा कि कोलकाता के हिन्दी जगत में यह अपूर्व घटना है, जब एक युवा कवि के कविता संग्रह का लोकार्पण हिन्दी व बंगला के दो शीर्ष कवि एक साथ कर रहे हैं।
कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए सुपरिचित आलोचक डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि यह एक कसा हुआ काव्य-संग्रह है। इस संवेदनहीन होते समय में संवेदना की बैटरी को चार्ज करने वाले कवि केदार जी और अभिज्ञात हैं। अभिज्ञात की कविताओं में स्थानीयता अभी बची हुई है। वे स्थान को इतिहास व स्मृति के हवाले नहीं करते। ‘माझी का पुल’ और ‘हावड़ा ब्रिज’ जैसी कविताएं स्थान को बचाये हुए हैं। ये स्थान लोगों की स्मृतियों में झूलते रहते हैं। नागार्जुन की कविता ‘पछाड़ दिया मेरे आस्तिक’ की तरह अभिज्ञात भी कविता लिखते हैं ‘सूर्य की सिंचाई’। दोनों कविताएं अपने-अपने समय की और अपनी तरह की अद्भुत कविताएं हैं। कार्यक्रम का संचालन कर रही कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ.राजश्री शुक्ला ने कहा कि उनकी कविताओं में सामान्य अनुभवों का विशेष आस्वाद है। एक सामान्य अनुभव का अंश हमारे सामने आता है और अपने आपको काटकर विशेष हो जाता है। ये कविताएं स्पंदित करती हैं। इन कविताओं में स्व का विस्तार है। इस कार्यक्रम में अभिज्ञात ने ‘पैसे फेंको’ और ‘वापसी’ कविताओं का पाठ किया।
प्रस्तुति-जीवन सिंह
11/2 केदारनाथ दास लेन, दमदम जंक्शन, पोस्ट-घूघूडांगा, कोलकाता-700030,मोबाइल-9433352976


Friday, November 18, 2011

खुशी ठहरती है कितनी देर का लोकार्पण 22 नवम्बर 2011 को

कोलकाताः अभिज्ञात के काव्य संग्रह खुशी ठहरती है कितनी देर का लोकार्पण 22 नवम्बर 2011 को सायं 5 बजे होगा। महात्मा गांधी अंतर्राष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कोलकाता केन्द्र 2ए/2 बी मृगेन्द्र मित्रा रोड, पार्क सर्कस, यूनिवर्थ सेंटर के पास, कोलकाता में यह कार्यक्रम आयोजित है। केन्द्र के प्रभारी डॉ.कृपाशंकर चौबे इस कार्यक्रम के संयोजक हैं। कार्यक्रम में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह, बंगला कवि नवारुण भट्टाचार्य, आलोचक डॉ.शंभुनाथ, कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. राजश्री शुक्ला आदि इसमें शिरकत करेंगे।

Wednesday, November 16, 2011

खुशी ठहरती है कितनी देर













खुशी
ठहरती है कितनी देर कविता संग्रह आ गया। ठीक उस समय जब मैं अपने प्रिय केदारनाथ सिंह के साथ था उन्हें साहित्य अकादमी की ओर से उसका सर्वोच्च सम्मान महत्तर सदस्यता उन्हें मंगलवार को प्रदान की गयी। फेलोशिप साहित्य अकादमी के अध्यक्ष व बंगला कवि सुनील गंगोपाध्याय ने प्रदान की।

वहीं मेरे कार्यालय से फोन आया मेरी किताबों का बंडल आया है।

Thursday, November 10, 2011

तो कविता की किताब आ गयी

मेरा कविता संग्रह खुशी ठहरती है कितनी देर प्रकाशित हो गया है। बोधि प्रकाशन के प्रबंधक निदेशक श्री मायामृग ने आज फोन पर सूचित किया कि किताब प्रकाशित होकर आ गयी है, कल कूरियर से कोलकाता रवाना कर दी जायेगी। मुझे उसका बेसब्री से इन्तजार है, यदि आप जयपुर रहते हैं तो मुझसे पहले देख सकते हैं। मुझे तो बस अभी इन्तजार करना है दो तीन दिन। आज ही आगरा, अमर उजाला से श्री हिमांशु त्रिपाठी का फोन आया था किताब कब आ रही है, और पिछले हफ्ते वहीं से श्री सुखविन्दर पाल सिंह चड्ढा का फोन आया था। दोस्तों में भी बेकरारी है , यह जानकर अच्छा लगा। इस बीच हिन्दुस्तान, भागलपुर से श्री राजेश रंजन और हरिभूमि,हरियाणा से श्री सतीश श्रीवास्तव और प्रभात खबर, नयी दिल्ली से श्री रंजन राजन भी कविता संग्रह के बारे में पूछा तो लगा कि अच्छा किया मैंने जो इस संग्रह को कुछ दोस्तो के नाम समर्पित किया है।

Tuesday, October 25, 2011

सोने की आरामकुर्सी


कहानी
अभिज्ञात
साभाऱ- वर्तमान साहित्य एवं अभिव्यक्ति
चित्रः अभिव्यक्ति
रोज़ की तरह सुरेश आठ घंटे की क्लर्की की ड्यूटी बजाने के बाद घर लौटा था। वह एक निजी जूट मिल में कार्यरत था, जहाँ मज़दूरों और बाबुओं के वेतन में कोई खास फर्क नहीं था। प्रबंधन के लिए सभी नौकर एक जैसे थे और वेतन भी एक जैसा। भले वे अलग-अलग काम जानते और करते हों। इसलिए मजदूर, झाड़ूदार, दरबान और क्लर्क सबके वेतन में लगभग समानता थी।

सुरेश का जीवन-स्तर भी मज़दूरों से कुछ भिन्न नहीं था। उसके पिता को अफसोस था कि बेमतलब ही उन्होंने बेटे को एमए तक पढ़ाया। यदि मैट्रिक के बाद ही दरबानी के काम पर लगा दिया होता आज उसका वेतन कुछ ज्यादा ही होता। खैर पिता तो अब रहे नहीं, सुरेश एक बेटी, एक बेटे और पत्नी के साथ एक झोपड़पट्टी नुमा मकान में अपना जीवन बसर कर रहा था। यह डेढ़ कट्ठा ज़मीन भी उसके पिता ने जैसे-तैसे खरीदी थी और उस पर एक कामचलाऊ मकान यह सोचकर बनाया था कि जब कभी आर्थिक स्थिति सुधरेगी तो ठीक करा लेंगे, लेकिन न उनकी स्थिति सुधरी न बेटे सुरेश की और मकान और जीर्ण-शीर्ण होता गया।

अन्ततः वहाँ एक आलीशान मकान बनाने का ख्वाब लेकर ही वे दुनिया से सिधार गये। मरने के कुछ दिन पहले बुरे स्वास्थ्य की वज़ह से उनका चलना-फिरना बंद हो गया था।
बेटे ने एक लोहे की आराम- कुर्सी खरीद दी थी, जो खिड़की के पास रखी होती थी। जिस पर बैठे-बैठे वे लोगों को आते-जाते देखते अपना पूरा दिन काट देते थे। लोगों की आवाजाही से जुड़कर अपने स्थिर हो जाने को किसी हद तक वे भूल जाते थे। वे एक सीधे-सादे उच्च विचार वाले व्यक्ति थे और दुनिया को बेहतर बनाने का ख़्वाब देखने वाले प्राइमरी स्कूल के शिक्षक थे। बेटे सुरेश पर भी उनके विचारों का प्रभाव पड़ा था और वह तो बचपन से ही कविताएँ भी लिखने लगा था। बेटे की कविताओं को पढ़ना उन्हें अच्छा लगता था और उन्हें यह संतोष होता था कि उनमें से कुछ बातें उनके विचारों का काव्यानुवाद है। बोध के स्तर पर उनका बेटा सचमुच उनका वारिस है।

उनकी मौत आरामकुर्सी पर बैठे-बैठे ही हुई थी। इसलिए सुरेश को वह कुर्सी विशेष प्रिय थी। बीस साल पुराने टेबुल के सामने इस लगभग नई आरामकुर्सी पर अधलेटे बैठ कर कविता लिखता था। कुर्सी उसने बड़ी मुश्किल से किश्तों में ख़रीदी थी। पिता की बीमारी के चलते उसकी आर्थिक स्थिति खराब थी ही क्रिया-कर्म के चक्कर में और बिगड़ गई और नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि बिजली का बिल अदा न कर पाने के कारण उसकी लाइन काट दी गई..और लालटेन और दीये की रोशनी से उसके परिवार को काम चलाना पड़ रहा था।

अर्थाभाव के कारण सुरेश की पत्नी निर्मला का स्वभाव किसी हद तक चिड़चिड़ा हो गया था। हर बात पर लड़ने-भिड़ने को आमादा रहती। घर का कामकाज भी वह ठीक से नहीं करती थी। वह एक सम्पन्न घर की लड़की थी और कालेज के दिनों में वह सुरेश की कविताओं पर इस कदर फिदा थी कि उससे विवाह करने के लिए अपने घरवालों के सामने अड़ गई थी जिसके कारण उन्होंने कुछ अप्रसन्नता के साथ भारी मन से इस पर सहमति दे दी थी।
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उस दिन सुरेश अपनी खटारी साइकिल पर थका-माँदा घर लौटा था। आते ही रोज की तरह स्नान किया क्योंकि जूट मिल में मशीनों के चलने से पटसन का गर्दा उड़ता रहता है और उसमें उस केमिकल के तत्व भी शामिल रहते हैं जिसका छिड़काव पटसन को संरक्षित करने के लिए उस पर किया जाता है। चाँपाकल से पानी निकालकर स्नान करने के बाद वह खाने के लिए बैठा तो पाया कि आज रोटी कुछ अधिक बेस्वाद और जली-जली सी थी। सब्ज़ी में मिर्च और नमक भी रोज की तुलना में अधिक लगा। वह चुपचाप खाता रहा। एकाध बार पहले वह इस मामले में मुँह खोल चुका है, जिस पर पत्नी के मन की भड़ास बाहर निकलने लगी थी। उसने अपने जी को समझा लिया था कि यह पत्नी की निराशा और कड़ुवाहटों की अभिव्यक्ति है। हालात बदलेंगे तो सब ठीक हो जाएगा। हालाँकि कमी उसमें भी थी। उसे आजकल रोटी पिछले दिन की तुलना में अधिक बेस्वाद, सब्ज़ी अधिक तीखी और दाल अधिक खारी लगती थी। शायद उसके आस्वाद को भी विपन्नता ने डस लिया है।

लालटेन की मंद रोशनी में खाने के बाद वह चुपचाप उठा और अपनी टेबिल के आगे आरामकुर्सी पर बैठ गया जिस पर उसके पिता बैठा करते थे। कुर्सी पर बैठने के बाद उसे थोड़ी राहत मिलती थी और लगता था कि वह आराम नहीं कर रहा है बल्क़ि अपनी तकलीफ़ों से निकालने का रास्ता बना रहा है। वह अपने बच्चों के लिए बेहतर कपड़े खरीदने और पत्नी के लिए ज़ेवर गढ़ाने का प्रयत्न कर रहा है। जैसे कुर्सी पर बैठकर अपनी साइकिल को एक दिन कार में बदल देगा और इस चूते मकान को आलीशान बँगले में। यह रास्ता उसे मिलता अपनी कविताओं से। वह देर रात तक कुर्सी पर बैठकर सोचता और इन्तज़ार करता अच्छी भावनाओं और कल्पनाओं के आने का, जो अनायास ही किसी और दुनिया से चली आतीं और वह उन्हें शब्दों में व्यक्त कर देता। एक अच्छी खुशनुमा कविता लिखने के बाद वह कई दिन तक रोमांचित रहता और उसे लगता कि उसका जीवन अब भी जीने लायक बचा हुआ है। वह अब भी अपनी और बाहर की दुनिया को खूबसूरत बनाने में जुटा हुआ है। एक अच्छी कविता लिखने के बाद उसे संतोष होता कि उसने दुनिया को कुछ दिया है। बच्चों और पत्नी के प्रति भी अपने कर्तव्य का अच्छी तरह से निर्वाह किया है, भले ही शब्दों में। कभी-कभार वह अपनी कविताएँ पत्नी और बच्चों को सुनाता जिस पर वे हँसते और कहते-'लिखने भर से हमारी विपदाएँ दूर नहीं हो जाएँगी।'

रोज की तरह सुरेश इस दिन भी देर तक वह जागता रहा और दुनिया की खुशहाली के सपने देखता रहा और जो खयाल आए उन्हें पन्नों पर लिखता रहा। उसका शरीर रोमांचित और मन पुलकित था... क्या अच्छे खयाल आए हैं। वाह!! उसने ख़ुद की तारीफ़ की और कब वह कुर्सी पर ही सो गया पता ही नहीं चला। टेबुल पर जलती हुई डिबरी तेल खत्म होने के बाद बुझ गई। बाकी परिवार पहले ही सो चुका था।

सुबह पड़ोसी के मुर्गे की बाँग सुनकर उसकी नींद खुली। उसने आँखें खोली लेकिन प्रकाश के कारण उसकी आँखें चुँधिया गयीं। खिड़की से सूर्य की किरणें सीधे मुँह पर आ रही थीं। उसे अब याद आया- अरे वह तो कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गया था। वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसने टेबुल पर देखा वह कागज पड़ा हुआ था जिस पर उसने अपनी जि़न्दगी की संभवत: सबसे बेहतरीन कविता लिखी थी। क्षण-भर को वह कुर्सी पर बैठे-बैठे सोने की वजह से लगभग अकड़ गए शरीर की व्यथा को भूल गया। कविता को उसने मेज की दराज में रखा और एकाएक उसकी निगाह कुर्सी पर गई। वह चौंक गया। सूर्य का प्रकाश कुर्सी पर पड़ रहा था और कुर्सी ऐसे चमक रही थी जैसे वह सोने की हो। उसने मन ही मन कहा- 'वाह प्रकाश भी क्या चीज है! नीले रंग की मामूली लोहे की कुर्सी भी सोने की कुर्सी जैसी लगने लगती है।' उसने ठाना वह प्रकाश पर एक पूरी काव्य-शृंखला ही लिखेगा। उसने खिड़की बंद की और प्रात:कर्म से निवृत्त होने चला गया।
लौटकर जब वह अपने कमरे में आया तो उसने पाया कि उसकी कुर्सी परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई है। कमरे की खिड़की खुली हुई थी किन्तु सूर्य की किरणें हालाँकि अब कुर्सी पर नहीं पड़ रही थीं फिर भी कुर्सी सुनहरे रंग की दिखाई दे रही थी।

बेटे बबलू ने तपाक से पूछा-'आप यह सुनहरे रंग की वार्निश कहाँ से ले आए? मेरे लिए भी ला दीजिए न ! मैं अपनी साइकिल पर लगाऊँगा। उसका रंग जगह-जगह से उतर गया है।'
निर्मला-'मैं भी कहूँ कि रात भर ये कर क्या रहे हैं? मेरी तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए मैं गुस्से से यह देखने नहीं आई कि ये रात भर कुर्सी पर वार्निश लगाने में जुटे हुए हैं। अरे, ऐसा ही शौक था तो छुट्टी के दिन करते। रात भर जागने की क्या जरूरत थी? पर मेरी बात सुनता कौन है?'
सुरेश-'बंद करो तुम लोग अपनी बकवास! मैं बबलू की कारस्तानियों से तंग आ गया हूँ। यदि उसे अपनी साइकिल पर वार्निश लगाने की इच्छा है तो लगाए मैं क्यों मना करूँगा ? पर उसे कुर्सी पर वार्निश लगा कर देखने की क्या जरूरत थी। वह जानता नहीं है.. इस कुर्सी से मेरे बाबूजी की भी यादें जुड़ी हैं। कितनी परेशानियों से यह कुर्सी मैंने उनके लिए खरीदी थी। उसका रूप-रंग बदल कर रख दिया इस कम्बख़्त ने। देखने से अब लगता ही नहीं कि यह वही आरामकुर्सी है। इस पट्ठे ने वार्निश को साइकिल पर लगाने से पहले कुर्सी पर लगाकर देखा। तुम लोग जान लो कि मैं इस घटना से बहुत दुखी हूँ। बबलू से मुझे आज तक कभी कोई शिकायत नहीं रही है पर आज उसने जो किया है उससे मेरा दिल टूट गया है। ..और अगर गलती कर भी दी तो मान लेने में क्या हर्ज़ है? मैं रात में डिबरी की मंद रोशनी में कुर्सी पर लगी वार्निश देख नहीं पाया और उसी पर बैठा रहा सारी रात। मान लो वार्निश ठीक से सूखी न होती तो मेरा पायजामा-कुर्ता भी खराब होता कि नहीं?'
बड़बड़ाते हुए किंचित क्रोध के साथ सुरेश दूसरे कमरे में चला गया। और थोड़ी देर में तैयार होकर काम पर। पिता की डाँट सुनकर बबलू की आँखों से आँसू बहने लगे थे। वह देर तक सिसकता रहा।
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सुरेश रात को काम से लौटा तो अनमना सा था। वह बबलू को डाँटकर गया था शायद इसलिए। पहली बार उसने बबलू से इतना रूखा व्यवहार किया था... लेकिन कुछ देर बाद उसका अफसोस हैरत में बदल गया। बबलू ने रात में अपनी बात दोहराई कि उसने कुर्सी पर वार्निश नहीं लगाई है। उसने आरामकुर्सी को छुआ तक नहीं है। और ना ही घर के किसी अन्य सदस्य ने। कुर्सी पर न तो पानी गिरा था और ना ही उसे धूप में बाहर निकाला गया था।

काफी सोच-विचार के बाद सुरेश इस नतीज़े पर पहुँचा कि यह कुर्सी के रंग के बदलाव का मामला है। कुर्सी पर अच्छा रंग नहीं लगाया गया था, जो अब छूट कर अजीब सा हो गया है। अगला दिन रविवार था। सुरेश कुर्सी दुकान पर गया और उसने दुकान वाले को खरी-खोटी सुना दी। दुकानदार को उलाहने दिये कि उसने कुर्सी के मामले में उसे ठग दिया है। अभी तीन महीने पहले ही वह कुर्सी ले गया था और इतनी जल्दी उसका रंग उतर गया। दुकानदार अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था। उसका कहना था कि कई ग्राहकों ने वह आरामकुर्सी खरीदी है और किसी की भी ऐसी शिकायत नहीं मिली। स्वयं अपने घर में भी वह ऐसी कुर्सी इस्तेमाल करता है पर आठ महीने में उसका रंग जस का तस है। कुर्सी वाले ने आरोप लगाया-'ऐसा है सुरेश बाबू। पिता के लिए कुर्सी खरीदने जब आए थे तो आपके पास पूरे पैसे नहीं थे फिर भी मैंने आपको खाली हाथ नहीं लौटाया था। आपने कहा था कि बाक़ी अगले महीने दे जाऊँगा। साढ़े छह हजार रुपयों में से तीन ही डाउन पेमेंट किया था और दूसरे महीने तीन और दे गए थे और पाँच सौ रुपए अभी आप पर और निकलते हैं। वे रुपए डकार कर बैठे हैं और उन्हें देने के बदले रंग उतरने की शिकायत लेकर चले आए। नेकी कर दरिया में डाल। चलिए निकालिए पाँच सौ रुपए।'

सुरेश ने पासा उल्टा पड़ता देख चुपचाप लौटने में ही भलाई समझी। कहा-'मैं आपका बकाया चुकता कर देता। पैसे मारने की नीयत कभी नहीं रही लेकिन अब कुर्सी का रंग उतर गया तो वह पाँच सौ रुपए नहीं दूँगा। उस रुपए से कुर्सी की रंगाई फिर करानी होगी।'
दुकानदार- 'तो ऐसा क्यों नहीं कहते कि पैसे छुड़वाने हैं..फिर सीधे कहिए रंग छूटने की शिकायत मत करिए। लाइए ढाई सौ रुपए दीजिए और हिसाब साफ समझिये।'
सुरेश ने ढाई सौ रुपए अदा किये और अपना सा मुँह लेकर लौट आया। जब दुकानदार अपनी गलती मानने को तैयार ही नहीं था तो वह क्या करता। उतने तो सोचा था कि यदि वह अपनी गलती मान लेगा तो हो सकता है कि कुर्सी की मुफ्त में फिर रंगाई करा दे।
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सुरेश के लिए कुर्सी का रंग बदलना रहस्य बना हुआ था। उसे दुकानदार की बात में कुछ-कुछ सच्चाई लगी। उसने गौर से देखा कहीं भी पुराने नीले रंग का अता-पता नहीं था। कुर्सी इस तरह से सुनहरे रंग से रंगी हुई लग रही थी कि किसी और रंग का नामोनिशान तक न था। और वह हल्की सी रोशनी में भी ऐसी दमक उठती थी कि क्या कहने। बाहरी लोगों के सवालों से बचने के लिए कुर्सी पर चादर रख दी गई।
इस बीच निर्मला के छोटे भाई धनंजय का काफी अरसे बाद आना हुआ। अब तक सुरेश ड्यूटी से लौटा नहीं था।
कहने को तो धनंजय पड़ोसी शहर में ही रहता था लेकिन बहन के गरीब घर में ब्याहे जाने से खफ़ा-खफ़ा सा रहता था। औपचारिक तौर पर कभी-कभी आना होता था। वह भी दस -पाँच मिनट के लिए। वह किसी काम से गुजर रहा था तो बहन की याद आई तो चला आया। उसकी आलीशान कार दरवाज़े के बाहर खड़ी थी। निर्मला ने उसे बैठने के लिए वही आरामकुर्सी दी। हालाँकि अब भी उस पर चादर पड़ी हुई थी। निर्मला चाय बनाने गई थी इसी बीच धनंजय किसी काम से कुर्सी से उठा कि चादर कु्र्सी पर से गिर गई।

चादर हटते ही कुर्सी की सुनहरी आभा देख वह दंग रह गया। वह देर तक कुर्सी को चारों ओर से देखता रहा। तब तक निर्मला चाय लेकर आई। उसने धनंजय से कहा- 'अरे खड़े क्यों हो बैठो न।'
धनंजय-'मेरी इतनी बड़ी औकात नहीं है कि मैं इस कुर्सी पर बैठूँ। लाओ कुछ और दो। कोई स्टूल बेंच कुछ भी।'
निर्मला-'क्यों कुर्सी में क्या बुराई है। इसका रंग तुम्हारे कपड़ों में नहीं लगेगा। एकदम सूखा है। फिर भी चाहो तो चादर डाल लो।'
धनंजय नहीं माना तो निर्मला दूसरे कमरे से स्टूल ले आई। धनंजय ने चाय पीते हुए कहा-'जीजा जी सचमुच कवि के कवि रह गए। अरे वे चाहते तो तुम्हारी और तुम्हारे बच्चों की ज़िन्दगी आराम से कटती मगर उनमें व्यवहारिकता की कमी है।'
निर्मला- 'जाने तो। वे बेचारे क्या करें। अब इस उम्र में उन्हें दूसरी नौकरी मिलने से रही। गरीब पिता के बेटे हैं।'
धनंजय- 'भगवान करे ऐसी गरीबी सबको मिले। विरासत में सोने की आरामकुर्सी मिली हुई तो इसका मतलब यह तो नहीं होता कि कोई उसे बचाने में ही लगा रहे और जीवन कष्ट में व्यतीत करे।'
निर्मला- 'मैं तुम्हारी बात नहीं समझ पा रही हूँ।'
धनंजय- 'सीधी सी बात है। जिसके पास सोने की आरामकुर्सी हो उसे गरीबी की ज़िन्दगी बसर करने की क्या जरूरत है? कम से कम जीवन के लिए जरूरी चीज़े तो होनी चाहिए। इस कुर्सी को बेचने से ही तुम लोगों की ज़िन्दगी बदल जाएगी।'
निर्मला-'ये कुर्सी..।' और वह ठठाकर हँस पड़ी तुम भी धनंजय गजब करते हो। अरे यह सोने की नहीं लोहे की कुर्सी है। इसके रंग पर मत जाओ।'
धनंजय-'दीदी अब मुझे बनाने की कोशिश मत करो। तुम्हें पता नहीं है तुम्हारा यह भाई देश की प्रमुख आभूषणों की दुकान का प्रमुख डिज़ाइनर है। मैं एक नजर देखकर ही सोने की असलियत भाँप जाता हूँ। यह सोना है एकदम खरा सोना।'
निर्मला-'ठीक है तुम गुणी हो... पर इस बार चूक गए। यह साढ़े छह हज़ार की लोहे की आरामकुर्सी है जिसे सुरेश पास ही के बाज़ार से खरीद कर लाए थे। और यह तीन महीने से हमारे यहाँ है, जिस पर हम लोग बैठते हैं। यह नीले रंग की थी और अब इसका रंग उतर कर सुनहरा हो गया है। जान गए पूरी हकीकत या और कुछ पूछना है?'
धनंजय परेशान हो उठा- 'मैंने इतना बड़ा धोखा कभी नहीं खाया। मैं इसका परीक्षण करता हूँ। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। परीक्षण करने का सामान लेकर अभी आया।'
एक घंटे बाद जब वह फिर लौटा तो सुरेश ड्यूटी से घर लौट आया था। निर्मला ने उसे धनंजय की बातें बताई तो वह भी खूब हँसा था। धनंजय लौटते ही कुर्सी की धातु के परीक्षण में जुट गया। और अगले ही कुछ ही पलों में उसने हँसते हुए कहा-'जीजाजी, दीदी मुझे बेवकूफ़ बनाना बंद करो। यह खरा सोना है। कुंदन। एक रत्ती भी मिलावट नहीं। ऐसा खरा सोना मैंने पहले कभी नहीं देखा। आज के बाज़ार में इसकी क़ीमत कम से कम पचास लाख रुपए होगी। यह एक नायाब चीज है। यह कहाँ से आई, कैसे आई के किस्से में मैं नहीं पडऩा चाहता। आप लोग कहें तो मैं इसके बिकने का इन्तज़ाम कर देता हूँ। वरना मैं चलूँ।'
अब सकते में आने की बारी सुरेश और निर्मला की थी।
सुरेश-'धनंजय बाबू। आप ही देखिये इस मामले को.. जो दिला दीजिए वही काफी है और पचास लाख तो हमारे लिए सपने जैसा ही है। बाक़ी यह इतमीनान कर लीजिए कि सोना ही है न। वरना मैं नहीं चाहता हूँ कि हम और आप दोनों धोखाधड़ी के मामले में फँस जाएँ।'
धनंजय-'जीजाजी। आप निश्चिंत रहिए। मैंने ठीक से परख कर ली है। अलबत्ता चूँकि इसके पेपर वगैरह नहीं हैं इसलिए माल दो नम्बर का हुआ और उसकी पूरी क़ीमत मिलने से रही फिर भी इसकी कीमत कम नहीं मिलेगी क्योंकि यह एंटीक पीस है।'

और सुरेश तथा निर्मला की रज़ामंदी से कुर्सी को दो चादरों की सहायता से अच्छी तरह लपटकर धनंजय की बुलेरो में डाल दिया गया। धनंजय ने कहा-'जैसे ही इसका खरीदार मिलेगा मैं इसे झाड़ दूँगा। आप निश्चिंत रहे अधिक से अधिक दिलवाऊँगा।'
धनंजय की गाड़ी दरवाजे से गई और इधर सुरेश और निर्मला की आँखों से नींद हवा हो गई। वे खुशी और आशंकाओं के सागर में डूबने-उतराने लगे।... तो क्या उनके बुरे दिन अब दूर हो जाएँगे। उनकी अधूरी ख्वाहिशें पूरी हो जाएँगी। दोनों ने सपना देखा जो पचास लाख तक का था। एक आलीशान मकान, आलीशान कार.. और तमाम सुख-सुविधाएँ।
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धनंजय अगले चार दिन काम पर नहीं गया। ज्वेलरी की दुकान से फ़ोन पर फ़ोन आते देख उसने फ़ोन का स्विच आफ़ कर दिया। इधर एक बड़े पूंजीपति की शादी के आभूषण बनाने का जिम्मा उसके ज्वेलरी हाउस ने ले रखा था और उसकी डिजाइनें धनंजय को ही तैयार करनी थीं। शादी की तिथि क़रीब आती देख और धनंजय की अनुपस्थिति के कारण जेवरों के निर्माण का कार्य खटाई में पड़ता नजर आ रहा था। सेठ पहले तो ज्वेलरी के कार्यालय में गया फिर वह धनंजय का पता लेकर उसके घर जा पहुँचा।
उसने काफी गुजारिश की कि वह उनकी बेटी के आभूषणों को तैयार करने के लिए काम पर जल्द लौटे। धनंजय से उसकी काफी दिनों से पहचान थी क्योंकि वह उसके मालिक की दुकान का पुराना ग्राहक था। धनंजय ने अपनी समस्या उसे बताई कि उसके पास एक नायाब सोने की कुर्सी है और वह उसे बेचने की फिराक में लगा हुआ है इसलिए अभी किसी और काम पर वह अपना ध्यान एकाग्र न कर सकेगा। जब कुर्सी पूंजीपति ने देखी तो वह कुर्सी का दीवाना हो गया और उïसने साठ लाख रुपए में खरीदने की पेशकश कर दी... और मामला पट गया।
सारा लेन-देन ब्लैक में था। सेठ ने यह कुर्सी अपनी बेटी को शादी में देने की योजना बना डाली थी। उसने सोचा यह बेटी के लिए एक अनमोल तोहफ़ा होगा और बाकी आभूषणों की समस्या हल हो गई क्योंकि धनंजय काम पर लौटने को राजी हो गया। वह जिस कार्य के लिए काम पर नहीं जा रहा था वह पूरा हो चुका था।
धनंजय ने प्राप्त राशि में से दस लाख रुपए निकाल लिये और पचास लाख रुपए अपनी बहन व जीजा के यहाँ पहुँचा आया। उन दोनों को तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था लेकिन यह सच था।
अगले ही कुछ दिनों में सुरेश ने बना बनाया एक आलीशान सुसज्जित मकान खरीद लिया और एक कार भी। और वह सब कुछ जिसकी उसके परिवार ने तमन्ना की थी। धनंजय खुश था कि उसकी बहन की ज़िन्दगी भी संवर गई और एक अच्छी-खासी रकम उसे भी मिल गई।
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सेठ के यहाँ बेटी का शादी की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं। अब गिने -ने दिन ही बचे थे कि वह मुश्किल में फंस गया। आयकर वालों ने उसके यहाँ छापा मारा। पहले से ही वे सेठ को टारगेट किये हुए थे। उन्हें पता था कि बेटी की शादी के वक्त़ उसकी काली कमाई सामने आएगी। और वही हुआ। सबसे बड़ी मुश्किल उस आरामकुर्सी को लेकर हुई। बाकी मामलों में तो आयकर वाले मोटी रकम ले- देकर मान गए लेकिन वे कुर्सी अपने साथ ले जाने पर अड़ गए। उन्हें विश्वास था कि कोई और बहुत बड़ी मछली हाथ आने वाली है। और सेठ से मूल स्रोत को लेकर पूछताछ में जुट गए। आखिरकार सेठ ने धनंजय का नाम बताकर मुसीबत से छुटकारा पाया।
धनंजय धर लिया गया लेकिन वह बेंतों की धुनाई के आगे नहीं टिक पाया। मरता क्या करता, उसने अपने जीजा का नाम ले ही लिया।
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पुलिस और आयकर विभाग का संयुक्त छापा सुरेश के घर पड़ा। पहले वे उसके पुराने जीर्ण-शीर्ण मकान में गए जहाँ से पता चला कि वह तो अपने नए मकान में चले गए हैं। उसके नए मकान के चप्पे-चप्पे की तलाशी ली गई। बाथरूम टायलेट तक देखा गया लेकिन वहाँ सोने की कोई और वस्तु बरामद नहीं हुई। उसकी पत्नी के कुछ आभूषण जरूर मिले जिन्हें आयकर वालों ने अनदेखा कर दिया। उन्हें तो सोने की आरामकुर्सी जैसी ही किसी अन्य भारी-भरकम वस्तु की तलाश थी, जिसमें उन्हें विफलता हाथ लगी। सुरेश को वे अपने साथ लेते गए। निर्मला और बच्चे भयातुर होकर रोने लगे थे। उन्हें आश्वासन दिया गया कि वे सुरेश से कुछ पूछताछ करेंगे फिर छोड़ देंगे।
सुरेश ने इस सम्बंध में निर्मला से किसी वकील से सम्पर्क करने को कहा और उनसे साथ चला गया।
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सुरेश की रिहाई आसान नहीं थी। वह तमाम पूछताछ के बाद भी कुछ ऐसा नहीं बता पाया जिससे पूछताछ अधिकारियों को सोने की आरामकुर्सी बनाने वाले या उससे जुड़े रैकेट का कोई सुराग मिले। सुरेश कुर्सी के बारे में जो कुछ बता रहा था वह एक किस्सा भर ही था जिस पर यकीन करना नामुमकिन था। भला यह कैसे सम्भव है कि कोई लोहे की कुर्सी सोने की कुर्सी में तब्दील हो जाए।
पुलिसकर्मियों ने सुरेश की धुनाई भी की ताकि वह भयवश सच उगल दे लेकिन वह अलग- अलग शब्दों में एक ही बात कहता रहा। अपनी बात पर ऐसा टिका रहने वाला आदमी पूछताछ अधिकारियों ने दूसरा न देखा था। सुरेश का पिछला रिकार्ड भी बेदाग था। किसी बड़े अपराध की क्या कहें कोई छोटा-मोटा अपराध भी उसने कभी नहीं किया था। एक ईमानदार मास्टर का बेटा था जो खुद साहित्य और आदर्श की दुनिया में जीता था। घर से काम पर जाना और काम से घर पर आना ही उसकी दिनचर्या थी।
सुरेश ने अपने पर ढाए जाने वाले जुल्म से तंग आकर पूछताछ अधिकारियों को सुझाव दिया कि क्यों न उसे किसी मनोवैज्ञानिक को दिखाया जाए क्योंकि स्वयं उसे भी लोहे की कुर्सी के सोने की कुर्सी में बदलने की घटना पर यकीन नहीं है। संभव है कि कुछ ऐसी घटना घटी हो जिसकी स्मृति उसके दिमाग से किन्हीं कारणोंवश निकल गई हो क्योंकि कुर्सी में जो बदलाव आए हैं वे उसकी आँखों के सामने नहीं आए। रात में वह कुर्सी पर बैठा तो उसमें किसी तरह का परिवर्तन उसने नोट नहीं किया। वह उस पर बैठकर सोचता रहा और कविता लिखी तथा सो गया। सोने के बाद उठा तो कुर्सी सोने की हो चुकी थी। इसका यह आशय हुआ कि उसके सोने के बाद और नींद से उठने के पहले कोई घटना घटी जिससे उसकी लोहे की कुर्सी सोने की कुर्सी से बदल गई। हो सकता है यह बदलाव का घटनाक्रम उसके सामने ही हुआ हो लेकिन किन्हीं मनोवैज्ञानिक कारणोंवश घटना याद न आ रही हो।
अधिकारियों को चूंकि कोई और विकल्प नजर नहीं आ रहा था, उन्होंने सुरेश की बातों पर अमल करने का मन बना लिया।
मनोवैज्ञानिकों की टीम ने सुरेश से गहन पूछताछ शुरू की। उन्हें भी यह लगा कि संभव है कि किन्हीं कारणवश वह आंशिक स्मृति-लोप का शिकार हो गया हो। उन्होंने सुझाव दिया कि सुरेश को उन्हीं परिस्थितियों में ले जाया जाए जिसमें यह घटना घटी। संभव है कि इससे सुरेश को कुछ याद आ जाए।
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मनोवैज्ञानिकों के निर्देशानुसार सुरेश को उसके पुराने घर ले जाया गया। उसके घर के बाहर चारों ओर तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई। उसे आवश्यक निर्देश दे दिये गए कि वह उस विशेष रात की तरह की सब कुछ करे। उसे बीच में टोका नहीं जाएगा। उस पर बाहर से निगरानी रखी जाएगी। रात हुई। फिर उसी रात सा अंधेरा था। लालटेन की रोशनी में निर्मला ने उस रात जैसी कुछ जली-जली सी रोटियां बनाई और नमक-मिर्च कुछ अधिक डालकर आलू-बैंगन की तरकारी। हल्की रोशनी में ही पीढ़े पर बैठकर सुरेश ने भोजन किया। उसके बाद वह उस आरामकुर्सी पर बैठ गया, जो अब सोने की हो चुकी थी। वह कुर्सी विशेष तौर पर यहाँ लाई गई थी ताकि वह खोज में सहायक हो सके।

पूर्व मिले निर्देश के अनुसार वह कागज कलम लेकर कविता लिखने की कोशिश करने लगा। काफी देर तक मन में कोई भाव नहीं आए। उल्टे उसके शरीर का पोर-पोर दुख रहा था। पुलिस ने उसे इस बेरहमी से पीटा था कि उसने उस वक़्त भगवान से मनाया कि उसकी जान चली जाए तो बेहतर। कम से कम तकलीफ़ों से तो मुक्ति मिलेगी। असह्य यातना से दुबारा गुजरने की कल्पना मात्र से ही उसका रोम-रोम सिहर उठा। उसके साथ जिस गाली-गलौज की भाषा में बातचीत की जा रही थी, वह सोच कर ही शर्म से गड़ गया। उसने अपने मन की थाह ली। मन में तमाम कड़ुवाहटें थीं इस व्यवस्था के खिलाफ, इन लोगों के खिलाफ... जो उसे प्रताडि़त कर रहे थे। खिड़की से आती हवा उसके जख्मों में और जलन भर रही थी। बाहर निकली चांदनी उसके बदन को भी छू रही थी और लग रहा था कि उसमें शीतलता नहीं तपिश है।
उसने पहली बार जाना कि कविता जबरन नहीं लिखी जा सकती और न लिखाई जा सकती है। उसे कविता लिखने की ड्यूटी लगाई गई है.. वह इसका निर्वाह कैसे करे! उसे याद आया कि यदि उसने कविता नहीं लिखी तो उसे लाल मिर्च की धुनी से फिर गुजरना पड़ेगा। बर्फ़ की सिल्लियों पर भी दुबारा सुलाया जा सकता है।

उसने अपने मन को खुला छोड़ दिया और लिखने लगा... वह सब जो उसके मन में आ रहा था। उसने पहली बार अपने मन की भड़ास जम कर निकाली। क्रोध, नफ़रत, हिंसा, निराशा, बदला लेने की इच्छा और यहाँ तक कि गालियां उसकी कविता में व्यक्त हुईं। उसे अच्छा लगा... मन का बोझ कुछ कम हो रहा था। धीरे-धीरे वह आरामकुर्सी पर कब सो गया..पता न चला।

सुबह फिर पड़ोसी के मुर्गे ने बांग दी और खिड़की से आती सूर्य की किरणों ने उसके चेहरे पर दस्तक दी तो उसकी नींद खुली। वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। कुर्सी पर निगाह पड़ी तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया। वह नीली आरामकुर्सी सामने थी.. जो उसने अपने पिता के लिए खरीदी थी। उसने प्यार से उस पर हाथ फेरा जैसे बहुत दिन बाद उससे मिल रहा हो। इस कुर्सी से उसके पिता की कितनी ही यादें जुड़ी थीं और जिस पर बैठकर उसने कई बेहतरीन कविताएँ लिखी थी। फिर एकाएक उसे याद आया कि वह यहाँ किस उद्देश्य से लाया गया है! उसने जोर से पुकार कर पूछताछ अधिकारियों को बुलाया। वे जब कमरे में आए तो उनके हाथों से तोते उड़ गए।

सोने की आरामकुर्सी कमरे में कहीं-नहीं थी। सुरक्षाकर्मी रात भर बाहर तैनात थे। ऐसे में सोने की कुर्सी कहाँ और कैसे गई? आनन-फानन में पूरे कमरे की जमीन गहराई तक खुदवाई गई कि कहीं ऐसा न हो कि उसे जमीन में गाड़ दिया गया हो लेकिन वह नहीं मिली तो नहीं मिली। सुरेश समझाता रहा कि यही वह कुर्सी है जिस पर मैं रात भर बैठा रहा और सो गया फिर क्या हुआ उसे याद नहीं.. वह एकदम नहीं जानता कि सोने की कुर्सी फिर कैसे लोहे की कुर्सी में बदल गई।
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अगले दिन उसे आयकर विभाग के अधिकारियों व उन्हें सहयोग दे रहे पुलिसकर्मियों ने रिहा कर दिया और उससे माफी भी मांगी। कहा-'अब किसी मानवाधिकार कर्मी या वकील को हमारे पीछे मामला-मुकदमा के लिए न लगा देना। तुम तो जानते ही हो कि क्या चमत्कार हुआ है। कुर्सी के लोहे से सोने में बदलने और फिर सोने से लोहे में बदलने की घटना पर कोई यकीन नहीं करेगा। तुम्हें तो लोग सिरफिरा कहेंगे ही हम पर भी आँच आएगी। जाओ ऐश करो। तुम तो मालामाल हो ही गए हो.. हम सस्पेंड नहीं होना चाहते।'

यह कहानी हालाँकि यहीं खत्म होती है। जो लोग इस घटना से वाकिफ़ थे उन्होंने इसका ज़िक्र किसी और से नहीं किया इसलिए वैज्ञानिक इस शोध से वंचित रह गए कि आदमी के मन की उच्च भावनाएँ उसके शरीर में ऐसा कौन सा रासायनिक परिवर्तन लाती हैं जिससे देह के स्पर्श से लोहा सोने में बदल सकता है।

Tuesday, October 04, 2011

सर्पदंश


कहानी
डा. अभिज्ञात
साभारः हमलोग, डेली न्यूज़, जयपुर, 2 अक्टूबर 2011
शिखा पाण्डेय के लिए इंटर्नशिप एक चुनौती बन गई थी। उसने सोचा भी न था कि डॉक्टरी का यह कॅरियर उसे उस मुकाम पर पहुंचा देगा, जहां उसे कठिन विकल्पों में से ही एक को चुनना होगा।

कहां तो उसने सोचा था कि वह साइंस की तरक्की का लाभ इस देश के लोगों को पहुंचा सकेगी। खासतौर पर वह गांवों में उन लोगों को राहत देना चाहती थी, जो चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में असमय ही दुनिया से कूच कर जाते हैं अथवा उपयुक्त इलाज न हो पाने के कारण छोटी-मोटी बीमारियों से भी बरसों जूझते रह जाते हैं और वह बीमारी देखते-देखते ही तिल से ताड़ बन जाती है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से वह बीएससी कर रही थी कि उसके सपनों को पंख मिल गए और वह प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई और कोलकाता के एक मेडिकल कॉलेज में उसका दाखिला हो गया।

चार वर्ष का पाठ्य-क्रम उसने पूरा कर लिया था। अब छह माह की इंटर्नशिप उसे करनी थी, जिसके बाद वह स्वतंत्र थी मेडिकल प्रैक्टिस के लिए। इस बीच उसके घर की हालत सोचनीय होती चली गई थी। पिता ने जमीन बंधक रख दी थी। छोटी दो बहनें कुंवारी थीं और पिता को उम्मीद थी कि डॉक्टर बेटी अपनी कमायी से उन्हें पार लगाएगी। आखिर बेटी का भी तो कुछ कर्तव्य बनता है ऎसे पिता के प्रति जितने लोगों के तमाम भड़कावे के बावजूद उसे इतनी ऊंची तालीम हासिल करने दी।

शिखा की उम्र भी निकली जा रही थी, किन्तु उन्होंने उस पर विवाह के लिए जोर नहीं डाला और उसके बाद वाली बेटी निशा का ब्याह दो साल पहले ही कर दिया और हाथ खड़े कर दिए कि अब किसी और बेटी को ब्याहने की उनकी स्थिति नहीं है शिखा ही अपनी नौका खुद पार लगाए और अपनी दो अन्य छोटी बहनों के लिए भी वक्त आने पर घर-बार खोजे। लोग उन्हें समझाते थे बेटियां दूसरे के घर जाने वाली होती हैं उनसे उम्मीद नहीं पाली जानी चाहिए। बहुत होगा तो वह इतना करेगी कि अपने लिए कोई डॉक्टर वर खोज लेगी, लेकिन अन्य कोई उम्मीद करना बेकार है। लेकिन पिता को अपनी आस्था के लिए एक ठौर मिल गया था और वह थी उनकी बेटी शिखा।

ईश्वर और शिखा उनके जीवन के दो ध्रुव बन गए थे, जिसके बीच उनका जीवन परिक्रमा करता रहता था। इसमें भी शिखा की मुख्य भूमिका होती और ईश्वर उसके सहायक। उनकी चर्चा शिखा से शुरू होती और शिखा पर खत्म। कभी शिखा छुिओं में बनारस से कुछ किमी दूर स्थित अपने गांव लाखी जाती, तो पिता की अपने से लगाई गई उम्मीदों से सहम जाती। यदि वह उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, तो जाने क्या होगा...!

यूं तो शिखा ने सारी बाधाएं पार कर ली थी। घर-परिवार व जीवन के अन्य उतार-चढ़ाव की बाधाओं को अपने दिलोदिमाग से निकालकर अपने कॅरियर के बारे में सोचती और ध्येय को पाने में जुटी रहती।

अब मंजिल करीब थी। वह जल्द से जल्द मेडिकल प्रैक्टिस शुरू कर अपने परिवार की आर्थिक बाधाओं को दूर करना चाहती थी। मिट्टी का घर भी अब गिरनेे को था। पिछली बरसात वह झेल गया था जैसे-तैसे, लेकिन इस बार की वर्षा वह निकाल पाएगा इसमें संदेह था।

शिखा को इंटर्नशिप के लिए पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के एक ग्रामांचल का सरकारी अस्पताल दिया गया था,जहां उसे छह महीने चिकित्सा करनी थी। उसे अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टरों के दिशा-निर्देश में काम करना था। कोलकाता से दो घंटे के बस के सफर के बाद वह अस्पताल पहुंचती और काम के बाद वापस लौटती। अस्पताल के हालत उसके लिए विस्मयकारी थे। किताबों से बाहर निकलकर व्यवाहरिक दुनिया में प्रवेश उसके लिए नया अनुभव था। उसने सोचा भी न था कि उसके ख्वाबों की हकीकत ऎसी होगी और उसके आदर्श धरे के धरे रह जाएंगे।

मेडिकल सांइस की तरक्की को यहां की व्यवस्था मुंह चिढ़ा रही थी। अस्पताल में कुछ आठ दवाएं थीं, जिनसे उसे लोगों की तमाम बीमारियों का इलाज करना था। ऊपर से तुर्रा ये कि किसी भी मरीज को यह नहीं बताना था कि अमुक दवा नहीं है। दवा न भी हो, तो मरीज के इलाज का नाटक जारी रखना था, क्योंकि ऎसा न करने पर लोगों की नाराजगी का अस्पताल निशाना बनेगा और सरकार भी।

व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लग जाएगा। मामला विधानसभा में उठ सकता है। मीडिया तो यूं भी फुटेज के चक्कर में तिल को ताड़ बनाता रहता है। विपक्ष को बैठे-बिठाए राज्य सरकार के खिलाफ मुद्दा मिल जाएगा। अधिक से अधिक उन्हें आजादी थी मामले को कोलकाता के किसी अन्य अस्पताल को रेफर कर दिया जाए। किन्तु ऎसे मामलों में भी कैफियत देनी पड़ेगी। शिखा ने गांव के किसी अस्पताल में प्रैक्टिस का विचार सिरे से खारिज कर दिया। ना वह बिना दवा के इलाज का स्वांग नहीं करेगी।

शिखा को अभी कुल चार दिन ही हुए थे और वह यहां की व्यवस्था से परिचित हो चली थी। परिचित ही नहीं हुई थी, बल्कि वह इस व्यवस्था का हिस्सा बनने का मन बना चुकी थी। उसके पास कोई विकल्प नहीं था। इंटर्नशिप उसे पूरी करनी थी। मन कड़ाकर लिया था और वह व्यवस्था का कोई असर दिलोदिमाग पर न पड़े इसकी पूरी कोशिश में लगी थी। वह अपने मन को विचलित नहीं करना चाहती थी। वह लक्ष्य पर निगाह गड़ाए हुए थी। उसकी आंखों के सामने पिता थे। उनके सपने थे। बहनें थीं, उनकी जिम्मेदारियां थीं। गांव के लोग थे, जिनकी वह शान व पहचान थी। गांव की पहली डॉक्टर वह बनेगी।

अस्पताल में उस दिन जैसे ही वह पहुंची, तो पाया कि सर्पदंश का मामला आया हुआ है। बाइस साल का युवक था, जिसे गांव वाले चारपाई पर लिटाकर ले आए थे। विधवा मां, दो कुंवारी बहनें धाड़ें मार-मार के रो रही थीं और गांव के लोग थे, जो उन्हें दिलासा दे रहे थे कि वह ठीक हो जाएगा। लो डॉक्टर आ गई...! लोगों के चेहरे का तनाव थोड़ा कम हुआ। अस्पताल में फिलहाल कोई और डॉक्टर न था, सो जिम्मेदारी उस पर थी। उसने पता किया सर्पदंश से निजात का कोई इंजेक्शन अस्पताल में नहीं था। उसे इलाज का अभिनय भर करना था। उसके समक्ष एक चुनौती थी और उसके इम्तहान की घड़ी।

उसने मन कड़ा कर लिया। उसने पढ़ा था ज्यादातर सांप विषैले नहीं होते, किन्तु कई लोग दहशत से मर जाते हैं। उसका अभिनय काम आ सकता था। इलाज के अभिनय से प्रभावित व्यक्ति का मनोबल ऊंचा उठ सकता था उम्मीद थी वह ठीक हो जाएगा। दवा से नहीं अपने-आप। उसने भगवान से मनाया कि जिस सांप ने काटा है, वह विषैला न हो। किन्तु उसकी कामनाएं भलीभूत होती नजर नहीं आ रही थीं।

इसी बीच एक और घटना घटी, जिसने उसे झकझोर कर रख दिया। युवक की हम-उम्र एक युवकी रोती-बिलखती अस्पताल पहुंची। उसने अपने पास सिंदूर की डिबिया रखी थी। लगभग बेसुध होते युवक के समक्ष वह फूट पड़ी-मैं नहीं जानती तुम बचोगे कि नहीं, लेकिन तुम जान लो कि मैं तुम्हारी हूं। मैं तुम्हारी विधवा बनकर जी लूंगी, मगर दूसरे से हरगिज शादी नहीं करूंगी। मैंने बहुत कोशिश की कि गांव वालों से अपना प्रेम छिपा लूं। मैं जानती हूं कि मेरे पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे, फिर भी मैं कोशिश में थी कि कभी न कभी उन्हें मना लूंगी, मगर अब वक्त नहीं बचा है। पता नहीं क्या होगा। तुम नहीं भी बचोगे, तो यह जानकर जाओ कि मैं तुम्हारी हूं।

और उसने अस्पताल में गांव वालों के सामने युवक से सिन्दूर अपनी मांग में भरवा ली। शिखा दहल गई। उसकी आंखों से सब्र आंसू बनकर बह निकला। इस बीच युवक अचेत हो गया था। शिखा ने मन कठोर कर लिया और युवती से कहा- क्या तुम्हारे पास गाड़ी है?

युवती के हां कहने पर उसने कहा- मैं जान गई हूं कि इसे किस सांप ने काटा है। वह बहुत जहरीला है। उसका इलाज आसान नहीं। तुम इसे लेकर जल्द से जल्द कोलकाता मेडिकल कॉलेज चली जाओ। यहां उसका इलाज नहीं हो पाएगा।

युवती ने लोगों की मदद से फौरन युवक को कार में बिठाया और गाड़ी चल पड़ी। लोगों को जैसे ही पता चला कि अस्पताल में इलाज संभव नहीं गुस्सा फूट पड़ा। अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों के लिए गालियां दागी जाने लगीं। इधर गांव के लोगों ने अस्पताल में तोड़-फोड़ शुरू कर दी थी। शीशे की खिड़की को तोड़ता हुआ एक सनसनाता पत्थर उसके सिर पर लगा था और वह अचेत हो गई।

उसे जब होश आया, तो पाया कि वह अस्पताल के एक बेड पर पड़ी है और भारी संख्या में पुलिस-बल अस्पताल में तैनात है। उसके कमरे के बाहर भी पुलिस थी। उसे सिर पर लगी चोट का भी अहसास हुआ, किन्तु मन में संतोष का भी अनुभव किया कि सब कुछ के बावजूद वह एक युवक की जान बचाने में सफल रही। इस बीच उसका बयान लिया गया। वहां उसके सीनियर डॉक्टर्स भी थे। पता चला कि सर्पदंश से युवक की मौत हो गई है। लोग अस्पताल के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं एहतियात के तौर पर पुलिस बुलायी गयी है।

Sunday, October 02, 2011

मेरा नया कविता संग्रह जल्द आपके हाथ में होगा

दोस्तो! मेरा सातवां कविता संग्रह और मेरी दसवीं पुस्तक 'खुशी ठहरती है कितनी देर' जल्द ही आपके हाथों में होगी। इसका प्रकाशन बोधि प्रकाशन, जयपुर कर रहा है।
मेरा यह कविता संग्रह लगभग ग्यारह साल बाद आ रहा है। पिछला काव्य संग्रह 'दी हुई नींद' सन 2000 में छपते छपते प्रकाशन, कोलकाता से आया था। इस संग्रह का आपकी तरह मुझे भी बेताबी से इन्तज़ार है।

Tuesday, September 20, 2011

विलास गुप्ते का जाना

विलास गुप्ते के निधन से हिन्दी कहानी ने अपना एक महत्वपूर्ण स्तम्भ खो दिया है। जिन दिनों मैं इंदौर में था उनसे कुछेक मुलाकातें होती रहीं। वे मुझसे मिलने वेबदुनिया के कार्यालय भी आये थे। वह रविवार का दिन था। मुझे याद है उस दिन हमारी खासी गपशप हुई थी जिसके बाद तो मैंने लगेहाथ उनका एक इंटरव्यू भी ले लिया था जो वेबदुनिया के साहित्य चैनल में प्रकाशित हुआ था। मीडिया में उनके निधन की खबर पाकर मन काफी मायूस हुआ और मन नहीं मानता है कि उनसे अब कभी मुलाकात नहीं होगी। उनके व्यक्तित्व की सादगी ने मुझे मोह लिया था। उनकी बातचीत और सोचने के लहजे में गंभीरता थी लेकिन वह आक्रांत नहीं करती थी। वह हमसे संवाद स्थापित कर लेती थी।
उनकी मृत्यु का समाचार इस प्रकार है जिसमें उनका जीवन परिचय है। आप भी देखें-
इंदौर। हिंदी कहानियों के सशक्त हस्ताक्षर विलास गुप्ते का बीमारी के बाद गत बृहस्पतिवार को यहां निधन हो गया। वह 74 साल के थे। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि गुप्ते ने तडके एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान आखिरी सांस ली। उन्हें मांसपेशियों की बीमारी के चलते करीब 20 दिन पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया था। छ: सितंबर 1937 को ग्वालियर में जन्मे गुप्ते की साहित्यिक रचनाओं की करीब 10 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। इनमें कहानी संग्रह, उपन्यास और नाटक शामिल हैं। उनके लिखे नाटक आदमी का गोश्त व आपके कर.कमलों से खूब मशहूर हुए और देश के कई शहरों में इनका मंचन किया गया। गुप्ते को अलग-अलग पुरस्कारों से सम्मानित किया गया और राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में छपी उनकी कहानियां बेहद सराही गईं। गुप्ते का तिलक नगर श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उन्हें उनके बेटे अभिनव ने मुखाग्नि दी।
उनके नाटक-"आदमी का भूत" और "आपके कर कमलों से" काफी लोकप्रिय हुए। विक्रम विवि ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया था। गुप्ते हिन्दी के व्याख्याता पद से सेवानिवृत्त होने के बाद पूरी तरह साहित्य सृजन में लगे रहे। इससे पूर्व उन्होंने समाजसेवा पत्रिका में संपादन का कार्य भी किया था।