9/30/2017

बड़ी लड़ाइयां

कहानी

-डॉ.अभिज्ञात


पेंटिंग -साभार
Alessandro Piras
संदीप टेबल टेनिस खेलने पहुंचा तो उसकी खुशी का पारावार नहीं था। मैच में कैश प्राइज अच्छा खासा था। वह यदि जीत जाता है तो उससे आराम से अपना और अपने छोटे भाई की साल भर की फीस दे पायेगा फिर भी कुछ न कुछ बच ही जायेगा।

और रहा सवाल जीत का तो वह पक्की ही मानकर चल रहा था। उसके सामने वे टिकेंगे कैसे। जिस क्लब में वह खेलता था अच्छा खेलने के लिए लगातार प्रताड़ित होता रहा है। हमेशा कोशिश की है कि वह जीत न जाये। अपनी जीत से ध्यान हटाने के लिए वह फिप्टीन लव से गेम शुरू करता था। अर्थात उसे जीत के लिए 21 प्वाइंट लेने होते जबकि सामने वाला 6 प्वाइंट में ही जीत सकता था। लेकिन वह नौबत ही बड़ी मुश्किल से ही आयी होगी। हालांकि वह जानबूझ कर कई बार ग़लत शॉट मार देता देता ताकि सामने वाले का स्कोर ठीक रहे और उसे खेल में मज़ा आये। क्योंकि उसके खेल से आक्रांत होकर कोई उससे खेलना ही नहीं चाहता था। दूसरे यह कि क्लब के इंचार्ज उसके पीछे हाथ धोकर पड़े रहते थे क्योंकि वह तीन गेम में तीन-चार मिल्टन के बॉल तोड़ ही चुका होता था। जबकि बॉल की क़ीमत के बराबर ही पूरे महीने की फ़ीस थी। उसके खेलने पर बॉल टूटने की वज़ह से रोक लगा दी गयी तो उसने यह शर्त मान ली कि वह अपनी बॉल से खेलेगा ताकि टूटे तो क्लब का कोई नुकसान न हो। उसके पिता बहुत मामूली नौकरी करते थे और अपने दोनों बेटों की पढ़ाई लिखायी और कपड़े लत्ते का ख़र्च वहन करने में ही तमाम दुश्वारियां पेश आती थीं, ऐसे में उसके टेबल टेनिस के जुनून के लिए वे बड़ी मुश्क़िल से पैसे जुटाते। वह बॉल को तेज़ शॉट मारने से पहले सोचता कि कहीं फूट न जाये फिर भी वह खेल की उत्तेजना में अक्सर यह भूल जाता। जब बॉट टूटती तो वह रुआंसा हो जाता। वह नौ में पढ़ रहा था किन्तु उसे पसंद नहीं था कि वह ब्वायज केटेगरी में खेले। वह मैच में बड़ों से भिड़ना चाहता था मगर उसे अलाव नहीं किया जाता था। उसकी महीनों से तमन्ना थी कि कोई ऐसा मैच हाथ लगे जिसकी रक़म जीत कर वह बॉल का ख़र्च वहन कर ले बेफ़िक्र होकर तेज़ शॉट मारे। ऐसा कि हर शॉट पर बॉल टूट पड़े। एक अच्छी रैकेट ख़रीदने का भी सपना उसने पाला था। वह भी याद करे कि किससे पाला पड़ा है बच्चू का। वह सपने में ऐसा कर चुका था कि वास्तविक जीवन में बॉल पर अपना ज़ोरदार शॉट लगाने को तरसा करता था। उसे स्पिन पसंद नहीं थी। उसे कई लोगों ने सलाह दी थी कि वह स्पिनर क्यों नहीं बन जाता, इससे बॉल कम टूटेगी किन्तु उसे इसमें एकदम मज़ा नहीं आता था और उसने कई स्पिन गेंदों पर भी तेज़ शॉट मारकर उसकी ऐंठन दूर कर दी थी।
तो यह मैच दूसरे शहर में था। दो घंटे की बस यात्रा कर वह टूर्नामेंट स्थल पर पहुंचा था। अकेले। यह अकेले की उसकी पहली यात्रा थी। पहले तो उसे मैच में भाग लेने की घर से इज़ाज़त ही नहीं मिल रही थी। मां ने हाथ तंग होने की बात कहकर साफ़ इनकार कर दिया था किन्तु उसकी रुआंसी शक्ल पर बाबूजी को तरस आ गया था। उन्होंने कहा था-ठीक है चले जाओ किन्तु अकेले जाना होता। कोई और साथ जायेगा तो बस का ख़र्च बैठेगा।
वह अकेले दूसरे शहर जाने का साहस दिखाने को तैयार हो गया। बाबूजी ने कहा-तुम सुबह की पहली बस से निकल जाओ। मैं अपनी ड्यूटी से नागा नहीं कर सकता वरना अतिरिक्त ख़र्च तो लगेगा ही वेतन भी कट जायेगा। मैं रात में तुम्हें वापस लेने ज़रूर आ जाऊंगा। ड्यूटी से छूटते ही बस पकड़ लूंगा। मेरे पहुंचने तक तुम टूर्नामेंट स्थल न छो़ड़ना।
संदीप टूर्नामेंट स्थल पर पहुंचा। दूरदराज़ से आये खिलाड़ी पहुंच चुके थे। स्थानीय खिलाड़ी समय पर पहुंचने वाले थे। समय काटने का सबको सबसे अच्छा तरीक़ा यह लग रहा था कि थोड़ा वार्मअप कर लिया जाये खेलकर। सुखद यह था कि यहां ब्वायज़ की कोई अलग से केटेगरी नहीं थी। ओपन टूर्नामेंट था। कैस प्राइज़ सुनकर उसकी आंखों की चमक बढ़ गयी थी। वहां मौज़ूद सभी खिलाड़ियों की उम्र उससे अधिक थी। आयोजकों ने भी उसका नाम एंट्री करते समय उसे साफ़ बता दिया गया था कि टूर्नामेंट ब्वायज़ का नहीं है। सो उसे जनरल केटेगरी में ही खेलना होगा। जिस खिलाड़ी के साथ वह वार्मअप के लिए खेल रहा था वह बीए सेंकेंड ईयर का छात्र था और भी जिले के सबसे नामी स्कूल का। संदीप नर्वस नहीं हुआ क्योंकि उसने ऐसे करारे शॉट लगाये कि वह दो गेम क्रमशः थ्री और फ़ोर पर हार गया। चूंकि वह दो गेम लगातार हार गया था इसलिए तीसरे की नौबत ही नहीं आयी थी। जो खिलाड़ी और वालेंटियर वहां थे वे उसका खेल देखकर दंग थे और सब उसके बारे में पूछने लगे और प्यार से बात करने लगे तभी वह अचम्भित हो गया जब उसने पाया कि उसके बाबूजी और भाई मुदित वहां पहुंच आये हैं।
बाबूजी ने आते ही आयोजकों से पता कर लिया कि खेल शुरू होने में अभी कुछ विलम्ब है। वे उसे अपने साथ ले गये पास ही के एक होटल में। उन्होंने बताया कि संदीप के बस पकड़ते ही उन्हें लगा कि उन्होंने ग़लती की है। उसकी मां ने भी उलाहने दिये कि छोटे से बच्चे को अकेले दूसरे शहर भेज कर अच्छा नहीं किया तो उन्होंने ड़यूटी जाने का इरादा छोड़ दिया और उसके पास आने के लिए तैयार हो रही रहे थे कि मुदित ने भी साथ चलने की ज़िद पकड़ ली कि वह भी स्कूल नहीं जायेगा, भैया को जिताने के लिए चीयर्स करेगा। जब होटल में उन्हें पता चला कि भरपेट खाने वाला भोजनालय है। कम खाओ या ज़्यादा पैसा एक ही लगेगा। पिता ने कहा कि चूंकि आना आनन- फानन में बिना किसी योजना के हुआ है इसलिए कोई भी घर से खाकर नहीं आया है और सभी लोग ठीक से खा लें ताकि शाम को फिर भूख न लग जाये वरना और ख़र्च बैठेगा.. अब रात में घर लौटकर ही खाना है।
भोजन लज़ीज था कढ़ी का स्वाद  ज़बरदस्त। दोनों भाइयों ने अधिक खाने की प्रतियोगिता कर ली। संदीप सोलह रोटियां खा गया और मुदित सात। भात खाने की पेट में ज़गह नहीं रह गयी थी। किसी तरह पापड़ खाकर समापन किया। भोजन से पूरी तरह से तृप्त होकर वे टूर्नामेंट स्थल पर जल्दी जल्दी लौटे। मुदित को खाने के फेर में उन्हें याद ही नहीं रहा कि वह मैच खेलने आया है। खिलाड़ियों की जो लिस्ट निकली थी उसमें दूसरे नम्बर का मैच संदीप का था। पहला चल रहा था एक गेम हो गया था। तीन गेम का मैच था यदि कोई लगातार दो जीत गया तो दो पर ही ख़त्म हो जाना था वरना तीन होता। और दोनों खिलाड़ियों के एक-एक जीतने की वज़ह से तीसरा गेम भी हुआ। दोनों खिलाड़ियों में उन्नीस -बीस का ही फ़र्क था। संदीप को अधिक खाने की वजह से सुस्ती आने लगी थी और नींद भी। वैसे ही वह रोज़ की तुलना में आज जल्दी उठा था ताकि पहली बस पकड़ सके। दोनों टक्कर के खिलाड़ी थे मगर दोनों का खेल संदीप को बचकाना लगा। न शॉट में ज़ोर था और न स्पिन की कोई लियाक़त। यदि ये उसके साथ खेलने उतरे होते तो वह लव पर उन्हें हराता.. कैसे कैसे लोग टूर्नामेंट में चले आते हैं..उसने सोचा तब तक उसका नाम पुकारा गया। वह टेबल टेनिस कोर्ट में खड़ा हुआ तो विपक्षी खिलाड़ी को देखकर उसे अपार प्रसन्नता हुई। यह वही बीए पार्ट टू का खिलाड़ी था जिसे उसने थोड़ी देर पहले बुरी तरह हराया था। संदीप को देख उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी। वह बिना खेले ही जैसे हार गया हो। टॉस जीतने के बाद उसके विपक्षी ने जैसे ही सर्विस की संदीप बौखला गया..यह क्या उसका पूरा शरीर ही बोझिल हो गया था और उसने जैसे हिलने से ही इनकार कर दिया हो। वह ऊंचे बॉल पर भी शॉट नहीं मार पा रहा था। जबकि आज वह जमकर शाट मार बाल तोड़ सकता था ! उसकी फूर्ति हवा हो गयी थी। पहला गेम उसने सेवन पर गंवा दिया। मुदित ने उसे दो एक बार मरी- मरी आवाज़ में चीयर्स कर हौसला बढ़ाने का प्रयास किया था किन्तु उसे बुरी तरह हारते देख उसने चुप्पी साध ली। पहला गेम हारने के बाद उसने बाबूजी और मुदित की तरफ़ देखा तक नहीं। ऐसा ख़राब खेल उसने आज तक नहीं खेला था। दूसरा गेम तो आलस्य और पिछला गेम  हारने की हताशा और बाबूजी तथा मुदित की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने की हताशा के कारण और बुरी तरह हार गया। उसकी हालत देखकर उसके विपक्षी ने कहा-अरे यार तुम तो अच्छे प्लेयर हो, इतना नर्वस क्यों हो गये। मुझे तुमसे सीखना है, क्या करारे शॉट लगाते हो। फिर कभी मिलते हैं। मुझे कुछ टिप्स देना।
लौटते समय उन्होंने आपस में कोई बात नहीं की। जैसे किसी आत्मीय की मैयत से लौटे हों। संदीप इसके बाद कई दिनों तक टेबल टेनिस की प्रैक्टिस पर नहीं गया।
बाबूजी कई दिन तक उससे कतराते रहे क्‍योंकि भरपेट भोजन का टुच्चा सा सुझाव उनका ही था, जो हार का कारण बना। ग़रीब बड़ी-बड़ी लड़ाइयां अक्सर छोटे-छोटे कारणों से हार जाता है।

हिन्दी फ़िल्म चिपकू का ट्रेलर, जिसमें मैं डॉक्टर बना हूं


9/24/2017

महाभीम का जीवन

कहानी

-डॉ.अभिज्ञात


(यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है!! कृपया इसका किसी भी रूप में उपयोग करने से पहले इज़ाजत ले लें, इसका कॉपीराइट रिजर्व है)
महाभीम की चर्चा जोरों पर थी। उस प्रतिष्ठान ने बच्चों के लिए एक भव्य आयोजन किया था। बच्चे उसमें महाभीम से मिलने वाले थे। वह महाभीम जिसे उन्होंने धारावाहिकों में देखा था। उससे साक्षात् मिलने का अवसर बच्चों के लिए कम रोमांच भरा न था। बच्चे खासा उत्साहित थे। उन्होंने एक सप्ताह पहले ही अपने अभिभावकों पर दबाव डालकर, मनुहार करके अपना नाम आयोजकों के पास रजिस्टर्ड करवा लिया था। कई अभिभावक स्वयं इसे लेकर प्रफुल्लित थे कि उनका बच्चा कुछेक घंटे मजे करेगा। अपने हमउम्र बच्चों के साथ हंसीखुशी के क्षण गुज़ारेगा और साथ ही वह खाने पीने के प्रति भी जागरुक बनेगा क्योंकि महाभीम बात बात में खाने पीने की बातें करता है और उसके फायदे- नुकसान भी साथ ही बताता चलता है।
आयोजक एक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान के थे। प्रतिष्ठान के प्रमुख की पत्नी ने अपनी दिवंगत बच्ची की स्मृति में इसका आयोजन किया था। वह दूसरे बच्चों के साथ साल में एक दिन सोल्लास मनाना चाहती थीं।

तय समय से पहले ही बच्चों के अभिभावक उन्हें निर्दिष्ट स्थल पर लेकर पहुंचने लगे थे और बच्चे को आयोजकों के सुपुर्द कर तीन घंटे बाद उन्हें वापस लेने आने वाले थे। इधर आयोजन के कार्यभार की प्रभारी महाभीम की समय पर उपस्थिति सुनिश्चित करने को लेकर चिंतित हो उठी। योजना थी कि जब बच्चे आ जायें तो तय समय पर उनके बीच हाथ हिलाता महाभीम उपस्थित हो ताकि इन्तज़ार करते बच्चों को रोमांचक लगे। लेकिन मजबूरन उन्हें घोषणा करनी पड़ी कि महाभीम कुछ विलम्ब से उनके बीच आ पायेगा क्योंकि जिस एजेंसी ने  को उनके बीच लाने की जिम्मेदारी ली थी उसके प्रतिनिधियों ने विलम्ब के लिए तरह- तरह के बहाने बनाने शुरू कर दिये थे। खैर..कुछ विलम्ब से ही सही  उनके बीच उपस्थित हो गया। आते ही उसने बच्चों को हाथ लहराकर विश किया। कई बच्चों के मुंह से चीख सी निकल गयी उसे अपने बीच पाकर।
फिर संगीत पर वह गीत बजने लगा जो सीरियल में महाभीम गाता है-महाभीम ये बतलाता है बच्चों क्या क्या खाओ। खाकर हेल्दी फूड फटाफट तुम हेल्दी हो जाओ। नया मैं फंडा देता हूं। नया हथकंडा देता हूं वह गीत बजने लगा और महाभीम बच्चों के बीच नाचने लगा। बच्चे भी उसके साथ नाचते रहे और तमाम बच्चे अपने मोबाइल फोन और टैब से उसकी तस्वीरें खींचने और वीडिओ बनाने में जुट गये। बच्चों ने महाभीम के साथ सेल्फी भी ली। दूसरा दौर था जब महाभीम बच्चों को तरह-तरह के खाने पीने की चीजें देने लगा और फायदे भी साथ ही संक्षेप में गिनाने लगा। चाकलेट..फल.. तरह- तरह की मिठाइयां, बिस्कुट आदि। बच्चे आनंदित थे। और उन्हें आनंदित देख आयोजक प्रसन्न। प्रतिष्ठान की मालकिन महाभीम के साथ सेल्फी ले ही रही थी कि अचानक यह क्या..महाभीम लड़खड़ा कर गिर पड़ा। किसी को कुछ समझ में नहीं आया सभी हतप्रभ थे। आनन फानन में कार्यक्रम के समाप्ति की घोषणा करनी पड़ी और कहना पड़ा कि महाभीम की तबीयत अचानक खराब हो गयी है। बच्चे महाभीम की अस्वस्थता से उदास होकर लौटे। महाभीम को उठाकर दो लोग भीतर कमरे में ले गये और एक बेंच पर लिटा दिया। दरवाजा अंदर से बंद कर उसका मुखौटा हटाकर उसके मुंह पर पानी मारा गया तो वह होश में आया।
महाभीम को लाने वाली एजेंसी के प्रतिनिधि अब तक आयोजकों द्वारा पर्याप्त फटकार सुन चुके थे और उनका भुगतान खटाई में पड़ गया था। उन्हें जो रकम मिलनी थी उससे बहुत कम मिली थी। महाभीम होश में आने के बाद अपनी अस्वस्थता पर शर्मिंदा था क्योंकि बच्चों का एक खुशनुमा कार्यक्रम उसने खराब कर दिया था। उसे अपनी बच्ची याद आयी जिसे वह अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचा कर भागा भागा आया था ताकि इस कार्यक्रम के बाद उसे जो मजदूरी मिले उससे वह अपनी बच्ची की दवाएं खरीद सके। वह जब बच्चों के साथ ठुमके लगा रहा था उसे अस्पताल में जीवन मौत से जूझती बच्ची याद आ रही थी। जिसका नतीज़ा सामने था . उसे एजेंसी ने आज के काम की मजदूरी देने से इनकार कर दिया। महाभीम उन लोगों से पास ही रखी खाने पीने की चीजें भी नहीं मांग पाया हालांकि वह भूख के कारण अचेत हो गया था।

9/21/2017

अगर करूं ना मैं बात इनकी

देशभक्ति गीत

 -डॉ.अभिज्ञात


ये मेरी धरती, ये मेरा अम्बर
ये मेरी नदियाँ ये मेरे पर्वत
अगर करूं ना मैं बात इनकी
तो मेरे जीवन में क्या रखा है !


वो सरहदों पे सजीले फौजी
वो राह तक तक थकी निग़ाहें
अगर करूं ना मैं बात इनकी
तो मेरी धड़कन में क्या रखा है !!

हमारे खेतों का अन्न सोना
हमारी गायों का दूध अमृत
अगर करूं ना मैं बात इनकी
तो प्रभु के अर्चन में क्या रखा है !

हमारे संतों की वाणी राहें
हैं साझी संस्कृति हमारी बाहें
अगर करूं ना मैं बात इनकी
तो मेरे चिन्तन में क्या रखा है !

अगरचे थानों में लुटती अस्मत
और अस्पतालों में मरते बच्चे
जो इसपे बादल न फट पड़े तो
बरसते सावन में क्या रखा है!!

9/03/2017

जो पूछे जान किसकी है..

देशभक्ति गीत/-डॉ.अभिज्ञात

जो पूछे जान किसकी है, कहोगे मातृभूमि की !
तरक्कियों की सीढ़ियाँ, गढ़ोगे मातृभूमि की!
मातृभूमि प्यारी है, जहां में सबसे न्यारी है
इसलिए तो जान उसपे देने की तैयारी है।।

युद्ध के समय अगर पुकारें माता भारतीl
जवान बेटे ख़ुद कहें उतारो मेरी आरती l
हो काफ़िलों पे काफ़िलों का अन्तहीन सिलसिला l
कफ़न को ओढ़ दुश्मनों पे टूटने का हौसलाl
तुम स्वाभिमानी हार ना, सहोगे मातृभूमि की !!

हो शांतिदूत विश्व के, यही तुम्हारी अस्मिताl
विपत्तियों को रोक ले, वही है सच्ची वीरताl
डरो नहीं हटो नहीं, हो कोई बाधा सामनेl
तुम्हारा कीर्ति पथ वही, जिसे चुना था राम नेl
तुम संस्कृति की बन नदी बहोगे मातृभूमि की !!

7/27/2017

इतिहास कभी कायर का नहीं

जब जब धरती ने मांगी है बेटों की कुर्बानी !
सबसे पहले निकल के आये सारे हिन्दुस्तानी !
वंदे मातरम् वंदे मातरम्‌ ! वंदे मातरम् वंदे मातरम् !
मेरी आन है, मेरी शान है, मेरा इंडिया तू महान है
तेरी बात सबसे जुदा है और तेरी ठोकरों में जहान है!


दिलदार नहीं इनके जैसा, पर सावधान जब अनबन हो !
तब देख इरादे फौलादी सीना छत्तीस या छप्पन हो!
रुख तूफ़ानों का मोड़ दिया जब भी दिल ने जिद ठानी!
वंदे मातरम् वंदे मातरम्‌ ! वंदे मातरम् वंदे मातरम् !
तू ही धर्म है, तू ईमान है, मुझे देश रब के समान है
ये गुलाम तेरा मुरीद है, तू बुलंदियों का निशान है!

जहां स्वाभिमान की ख़ातिर सिर कटते हैं मगर झुकते ही नहीं !
जहां रणभेरी की सुन पुकार बढ़ चले क़दम रुकते ही नहीं !
ये लाजवाब, ये बेमिसाल, इनका न कोई भी सानी !
वंदे मातरम् वंदे मातरम्‌ ! वंदे मातरम् वंदे मातरम् !
मेरे शब्द का तू ही अर्थ है, मेरे लब पे तेरी ज़ुबान है
मेरा बोलना मेरी बतकही, तेरा राग है तेरा गान है !

जो देश के काम नहीं आये धिक्कार जवानी उनकी है !
इतिहास कभी कायर का नहीं, जो शहीद कहानी उनकी है!
उनके ही पांव पखारेगा हर आंख का बहता पानी!!
वंदे मातरम् वंदे मातरम्‌ ! वंदे मातरम् वंदे मातरम् !
तेरी ख़ुशबुओं की कसम मुझे, मैं तेरा हूं इसका गुमान है
तेरे इक इशारे पे मर मिटूं, तेरा तीर हूं तू कमान है!

7/18/2017

अस्सी पार के दोस्त

कविता/डॉ.अभिज्ञात
अस्सी पार के दोस्तों को
जब मैं करता हूं किसी भी कारण अकारण फ़ोन
छूटते ही कहते हैं
अभी ज़िन्दा हूं
जैसे साल में एक बार लिखकर देते हैं पेंशनधारी अपने बैंक को!


दोस्त बताते हैं
अब जब थोड़ी भी होती है उनकी तबीयत ख़राब वे ख़बर नहीं देते
अन्यत्र रहने वाले बाल -बच्चों को
आनन- फानन में पहुँच जाते हैं सब उनके पास एक अघोषित आशंका में
कुछ दिन बाद जब वे लौटते हैं
शर्म आने लगती है अपने जीवित होने पर
आखिर निराश लौटा दिया
कर दी कुछ छुट्टियां ख़त्म बेवजह
इसलिए
अस्सी पार के दोस्त
अपने सम्बंधियों से पहले ही कहते हैं ज़ोर देकर
एकदम ठीकठाक हूं अपनी सुनाओ !!
और उन्हें लगता है
काश ऐसा ही होता !!

अस्सी पार के दोस्त
ज़रा कम पहचानते हैं आवाज़ें, सुनते हैं कुछ कम
उससे भी कम पहचानते हैं चेहरे
पर इस धुंधलके में साफ़-साफ दिखने लगता है बहुत कुछ
जिसे छिपाकर वे ले जाते हैं अपने साथ किसी और जहां में !!

7/14/2017

मेरे गांव की खुशबू

कविता /डॉ.अभिज्ञात
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तुम्हारी केसर क्यारियों से अधिक खुशबूदार है
मेरे गांव से उठ रही ताज़ा होरहे की गंध!

गम- गम महकता अदहन में खौलता मेरे खेतों के ताज़ा धान से बना भात!

भेली बनने को बेताब पाग की खुशबू, जो गन्ने के रस से औंटकर इतरा रही है!

संक्राति के लिए भुजा रहा तिल...
बोरसी में कोयले की आंच पर आवाज देदे पक रहा भुट्टा अपनी खुशबू से कर रहा है निहाल!

घोसार के भाड़ में उछल-उछल कर कूद रहे चने की खुशबू!

खुशबू है पाल खुलते आमों की!

खुशबू है चैत में पककर पेड़ से चुए महुए की !

मेरे उपलों में खुशबू है
खुशबू है गोबर लिपे घर- आंगन में!

कहीं गूलर पका है!
कहीं कोहंड़ा!
कहीं अपनी खुशबू पर दांत चियार रहा है कटहल का कोआ!

यहां आम के मोजर की गंध है
गंध है सरसों के फूलों की
कहीं हरा धनिया पिस रहा है!

खुशबू बता रही है
कहीं ढल रही शाम को पिसा जा रहा है मसाला
और बटलोई में पकने को तैयार है ताज़ा गोश्त !

कहीं महक रहा है अभी- अभी ब्यायी गाय के दूध का फेंसा!

कहीं जतसार की लय पर उठ रही है खूशबू सत्तू के लिए जांत में पिसे जा रहे चने की!

तुम्हारी केसर क्यारियों से अधिक कुछ है मेरे गांव में रची बसी खुशबू में !!