7/12/2010

नाज़ायज़


कहानी
साभारः दि संडे पोस्ट, साहित्य विशेषांक-2010
नन्हकू की मुसीबतों का कारण केवल एक था वक़्त से पहले उसका पैदा होना। इस एक घटना ने उसकी व उसकी मां की ज़िन्दगी बदल कर रख दी। उसका जन्म सतमासा बच्चों से भी पहले हो गया था। बिहार के एक धुर देहात में। जहां से सरकारी अस्पताल साढ़े छह कोस दूर था और गांव से तीन कोस तक कोई सड़क नहीं थी। आवाजाही के लिए थी केवल पगडंडियां। वक़्त से पहले जब उसकी मां के पेट में दर्द उठा तो उसके पिता दीना उसकी मां को साइकिल पर पीछे बिठाकर अस्पताल ले जा रहे थे और तीसरा गांव पार करने के बाद एक खेत में गांव की दाई की मदद से प्रसव हुआ। उसके भोले-भाले पिता वक़्त से पहले हुए पुत्र रत्न को ईश्वर की विशेष कृपा मान कर हर्षित हो रहे थे किन्तु गांव के ज्ञानी गुणी-जन इस पर चुप्पी मार गये। गांव की राजनीनि में दीना के विपरीत खेमे के गांव के कथित डॉक्टर, जो पंद्रह वर्ष पहले रिटायर्ड कम्पाउंडर थे, ने कहीं पीठ पीछे चलती सी टिप्पणी कर दी-दाल में कुछ काला है। यह तो स्वाभाविक प्रसव है, जो वक़्त से पहले संभव नहीं। नन्हकू की शादी के अभी दिन ही कितने हुए हैं और यह बच्चा...!
दीना के कान में बात घूम फिर कर पहुंच गयी और उसकी खुशी काफ़ूर हो गयी। वह गौर से पत्नी के हाव-भाव को पढ़ने की कोशिश करता। उसकी आंखों में देर तक झांकता-"इतना मासूम चेहरा और ऐसी दगाबाज़ी! मायके से यार की औलाद लेकर आ गयी मेरे यहां।"
दीना के दिल में आग सुलगती रही और धीरे-धीरे उसकी आंच तेज़तर होती गयी। पहले तो उसने पत्नी के मायके जाने पर ही रोक लगा दी। ससुराल से जो भी उसे लिवा जाने के लिए आता, खाली हाथ लौटना पड़ता। साफ़ कारण भी नहीं बताया जाता। पत्नी मायके जाने के लिए बिलखती रहती। पत्नी के आंसुओं को देख दीना के तन-बदन में आग और भड़क उठती-यार से मिलने का बहुत मन कर रहा है। अब जीते जी उससे मुलाकात नहीं होगी!
सन्तान को तो दीना ने कभी गोद में लिया ही नहीं। शुरुआत के दो-तीन दिन बाद से। जब से उसके कान में संदेह का बीजारोपण हुआ, उसे लगता-"पता नहीं किसकी औलाद है जिसे मैं अपनी गोद में लिये हुए हूं? जी करता है उसका टेटुआ ही दबा दें लेकिन इससे क्या होगा। ग़ल्ती तो मां ने की है।"
फिर पत्नी के प्रति उसकी नफ़रत स्थायी भाव बनने लगा। वह उसे अक्सर पीटने लगा। जब जब पत्नी के प्रति प्यार उमड़ता वह उसे पीटता क्योंकि तब तब उसकी बेवफ़ाई का ख़याल उसे अधिक सालता। वह तब पराजित महसूस करता जब पत्नी की ओर से वांछित प्रतिक्रिया नहीं मिलती। वह कभी रोई-गिड़गिड़ाई नहीं कि उसे छोड़ दिया जाये, न पीटा जाये। उसके मुंह से कभी यह न निकला कि उससे ख़ता हो गयी है और अब इस बात की उसे माफ़ी दे दी जाये या फिर कोई भी सफ़ाई या ऐसे शब्द, जिससे यह लगे कि उसे अपने किये पर अफसोस या शर्मिन्दगी है। नहीं। पत्नी की निग़ाहों में उसके प्रति तिरस्कार था और चुनौती थी-"मारो मगर पराजित नहीं कर सकोगे।"
वह उसे ऐसी हिक़ारत से देखती जैसे वह उसकी दया का पात्र हो। और सचमुच उसे लगता कि वह पत्नी की दया का ही पात्र है। वह उसे आसानी से माफ़ करने को तैयार था, बशर्ते वह माफ़ी मांग ले। वह स्वभाव से ही क्षमाशील रहा है लेकिन कोई क्षमा मांगे तो। कम से कम अपनी ग़लती तो स्वीकार करे। उसके साथ इतना बड़ा छल करने के बाद पछतावा तो हो। कोई सुलह-सफाई दी जाये।
पत्नी को प्रताड़ित व बेटे को उपेक्षित करते-करते वह क्रमशः अपनी ही निग़ाहों में गुनहगार बनता चला गया और उसे लगा हालात से निपटने का एक ही तरीक़ा है कि पत्नी व इस नाजायज संतान को उसके असली हक़दार के हवाले कर दिया जाये। प्रताड़ना का जो बोझ उसकी आत्मा पर है वह कम होगा। पत्नी ने जो किया उसकी सज़ा वह उसे दे चुका है। वह माफ़ी नहीं मांग रही है इसका मतलब साफ़ है, वह अपने यार को नहीं भुला सकती और उसे अपने जीवन में स्थान नहीं दे सकती..तो फिर वह रहे अपने यार के ही साथ।
एक दिन तड़के ही वह उठा और पत्नी व बेटे को मय उनके माल-असबाब उसके गांव छोड़ आया सदा-सदा के लिए। कहा-"अब रहो तुम अपने मायके। मेरी ओर से तुम मुक्त हो। मेरे घर कभी लौट कर मत आना। हमारा तुम्हारा साथ यहीं
तक बदा था। हमने तुम पर जो ज़ुल्म ढाये हो सके तो हमें माफ़ कर देना और तुम्हारे पिता मान जायें तो अपने प्रेमी के साथ घर बसा लेना। बेटे को अपने पिता की बहुत ज़रूरत होती है।"
पत्नी पहली बार फफक कर रोयी थी। दीना भी गीली आंखों के साथ मज़ूबत कलेजा किये अपने गांव लौट आया।
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अगले दिन उसने तय किया वह कोलकाता जायेगा। वहीं नौकरी करेगा। अब वह गांव में नहीं रहेगा। यहां बहुत सी कड़वी यादें हैं जिनसे उसे छुटकारा चाहिए। शहर में ही नहीं जायेगा बल्कि नये सिरे से अपनी गृहस्थी भी बसायेगा।
गांव में लोगों को कानोकान ख़बर हो गयी कि वह अपनी पत्नी से छुटाकारा पा चुका है सदा के लिए उसे अलविदा कह आया है। रिश्तेदारों ने लड़कियां दिखानी शुरू कर दी और आनन-फानन में उसने दूसरी शादी कर ली। और कोलकाता कूच कर गया रोजगार की तलाश में।
कोलकाता में एक संस्थान में दीना चपरासी हो गया। कुछ दिन बाद ही कोलकाता से गांव लौटा नयी नवेली पत्नी को साथ ले जाने तो वह यह जान चुका था कि उसके साथ छल हुआ है क्योंकि वक़्त से पहले भी संतान हो सकती है और वह स्वस्थ भी रह सकती है। यह ज़रूरी नहीं कि उसकी पहली पत्नी ने उसके साथ बेवफ़ाई की ही हो। उल्टे पत्नी ने उसकी प्रताड़नाओं का जैसा ज़वाब दिया था इससे लगता था कि वह कितनी स्वाभिमानी और दृढ़ चरित्र की औरत थी। अब तो यह रास्ता भी बन्द हो चुका था कि वह पत्नी को उसके मायके से क्षमा मांग कर मना ले आये क्योंकि न सिर्फ़ उसने शादी कर ली थी बल्कि उसकी शादी की ख़बर उसकी ससुराल पहुंची तो उन्होंने भी अपनी बेटी का ब्याह फिर कर दिया था। उसका दूसरा पति संतानवान विधुर था, उम्र में उससे ड्योढ़ा. सो उसने बच्चे सहित दीना की परित्यक्ता पत्नी को अपना लिया था। उस व्यक्ति के अपनी पत्नी का यार होने का कोई प्रश्न नहीं पैदा होता था और ना उससे नाजायज संतान का।
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दीना को पहली पत्नी की याद तो कम आती किन्तु उससे हुए बेटे के प्रति दिल तड़पता। एक कारण यह भी था कि नयी पत्नी से उसे विवाह के दस साल बाद भी कोई औलाद नहीं हुई थी। उसे लगता, उसे पहली पत्नी की आह लग गयी है। हाय इतने प्यारे बेटे को वह कैसे तिरस्कृत करता रहा। उसने दूसरी पत्नी को इस बात के लिए आख़िरकार मना लिया कि वह बेटे को वापस लायेगा। इससे दोनों का दिल बहलेगा और संतानहीन होने का ग़म नहीं सालेगा। और एक दिन वह बेटे को वापस लाने में क़ामयाब भी हो गया। जब पहली पत्नी की ससुराल गया तो पाया कि उसका जीवन खुशहाल है। धनाभाव नहीं था बल्क़ि दीना से बेहतर घर था, ज़मीन-ज़ायदाद भी अधिक थी। उसके अपने भी दो बेटे हुए थे नये पति से। उसके दिल में हूक उठती रही और आशंका भी कि कहीं बेटे को देने से वह इनकार न कर दे किन्तु उसे क्षमा की निशानी के रूप में अपना बेटा वापस मिल गया।
बेटे को कलेजे से लगाकर उसे आत्मिक शान्ति का आभास हुआ। और इस बात की तसल्ली भी कि पहली पत्नी की याद के रूप में बेटा सदैव उसके साथ रहेगा। दोनों के साथ की निशानी। बेटे की आंखे अपनी मां पर गयी थीं इसकी दीना को खुशी थी। पहली पत्नी के नये पति ने अलबत्ता पंचों के सामने दीना से यह लिखवा लिया कि अब वह अपने बेटे को अपनी ही ज़िम्मेदारी पर ले जा रहा है और उसे अपने पास रखेगा, सगे बेटे के तौर पर उसकी ज़मीन-ज़ायदाद समेत तमाम हक़ देगा तथा बेटे का अपनी मां तथा नये पिता की सम्पत्ति से अब कोई वास्ता न होगा।
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दीना बेटे को लेकर अपने घर खुशी-खुशी लौटा तो पाया कि उसकी दूसरी पत्नी के भी पांव भारी हैं। अर्थात् बड़े बेटे के पैर शुभ हैं उसके घर आगमन पर खुशी की ख़बर सुनने को मिली। लेकिन अधिक दिन नन्हकू का महत्त्व कायम नहीं रह सका। नयी मां से उसके दो भाई व एक बहन पैदा हुए। उन सबके आने के बाद और वह हर बार पहले से अधिक उपेक्षित होता चला गया। एक बार मन में आया कि वह लौट जाये अपनी मां के पास किन्तु वहां से वह दूसरे ही दिन बिना अपने दिल का राज़ खोले लौट आया क्योंकि उसे उतनी ही देर में पता चल गया कि वहां उसकी स्थिति और बदतर हो जायेगी और उसके कारण उसकी मां की भी। वहां लोग उसे पहले ही पराया मान चुके थे। उसकी मां से पैदा हुए भाई-बहन उसे अपना सगा मानने को कत्तई तैयार नहीं लग रहे थे।
पिता के घर नयी मां के उपेक्षापूर्ण व्यवहार के कारण वह अपने भाई-बहन में सबसे कम पढ़ लिख पाया। वह अपनी नयी मां और भाई- बहन और पिता की ज़िम्मेदारी खुद बढ़-चढ़ कर उठाता और उनकी सेवा में अपनी ज़िन्दगी की सार्थकता पाता। उम्र में काफी छोटे होते हुए भी उसके दोनों भाइयों को पिता ने कोलकाता में सिफ़ारिश कर नौकरी लगवा दी। उसकी नौकरी सबसे अन्त में लगी क्योंकि गांव पर रहकर खेती बारी कौन देखता। इसका उसने बुरा न माना था आख़िर वह सबसे कम पढ़ा लिखा था और गांव में भी तो आदमी चाहिए था रहने वाला। अब पिता रिटायर होने वाले थे जो जल्द गांव आयेंगे यह सोचकर उसे कोलकाता में नौकरी लगवा दी गयी।
और हुआ भी यही उसकी नौकरी लगी और दूसरे साल पिता रिटायर होकर गांव लौट आये। वह कोलकाता, पिता गांव में। कोलकाता में सबसे कम वेतन उसी का था क्योंकि उसकी नौकरी सबसे नयी थी लेकिन पिता को गांव सबसे अधिक रकम वही भेजता। बाद में तो उसे यह भी पता चला कि दोनों भाई कभी कभार ही पैसा भेजते थे और उससे झूठ कहा जाता रहा कि वे दोनों अधिक पैसे गांव भेजते हैं ताकि वह भी प्रेरित होकर भेजे। तीनों भाई कोलकाता में ही थे कि गांव से पिता का पत्र गया कि उनकी तबीयत बहुत खराब है। बाकी दोनों भाई छुट्टियों की बांट देखते रहे और नन्हकू ने नौकरी की परवाह किये बिना गांव की गाड़ी पकड़ ली। गांव आकर पता चला कि उसकी नयी मां पिता के साथ बदसलूकी से पेश आती है और सेवा नहीं करती उल्टे जो भी पीएफ, ग्रेज्युटी की रकम थी वह उनसे किसी न किसी बहाने ले चुके हैं। नन्हकू को यह देखकर बड़ी कोफ्त हुई। वह अपनी पत्नी को गांव में छोड़ गया ताकि पिता की सेवा हो सके। शहर में पढ़ रहे अपने दो बच्चों के साथ वह बिना पत्नी के रहता। बच्चों को अपने हाथों से खाना बनाकर खिलाता और ड्यूटी जाता। नन्हकू ने कर्तव्य के निर्वाह के समय इस पर कभी ध्यान नहीं दिया कि वह मां और भाइयों के लिए सौतेला है। वह तो अपने पिता को दुखों से उबारना चाहता था इसलिए उसने यह नहीं देखा कि उसके बाकी भाई क्या कर रहे हैं। अकेले में दीना ने उसके सामने कबूल किया था कि उसकी मां को खोकर वह कभी चैन से नहीं रह सका। वह आत्मा से आज भी उसकी मां को ही चाहता है और उसका असली बेटा वही है। बाकी बेटे उसके सौतेले बेटे हैं और उसकी नयी पत्नी के मन में भी सौतेलापन ही है। वह उसकी पहली पत्नी को लेकर लगातार तंग करती रहती है। नन्हकू को लेकर भी कि आखिर उसे उन्होंने क्यों अपनाया?
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दीना का देहान्त हो गया। अंतिम संस्कार का अभिभावकत्व बड़ा होने के नाते नन्हकू ने स्वयं ओढ़ लिया। कम्पनी और दोस्तों से कर्ज़ा लेकर उसने धूमधाम से भोज-भात किया। उसे लगा कि जब सब हो- हवा जायेगा तो ख़र्च का हिसाब होगा। आख़िर पिता तो सबके थे। ख़र्च बराबर बंटेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दोनों भाई यह कहकर मुकर गये-"हमने कब कहा कि इतनी शान से खर्च किया जाये और उनसे यह तो पूछा नहीं गया कि वे खर्च में हिस्सा देंगे कि नहीं? अपने मन से सब खर्च किया है तो अपने समझो।"
नन्हकू मुश्किल में पड़ गया। उसने इस बूते पर खर्च किया था कि सब भाई बराबर वहन करेंगे। अकेले कर्ज़ अदा करना उसके लिए मुश्किल था क्योंकि साल भर बाद बेटी का विवाह करना था। बेटों की पढ़ाई का ख़र्च भी बढ़ गया था। उसने भाइयों से कहा-"पिता रहे नहीं। गांव की खेती अब कौन देखेगा? मैं तो देख नहीं पाऊंगा क्योंकि बच्चे शहर में पढ़ रहे हैं। अच्छा हो कि ज़मीन बंट जाये। मैं अपने हिस्से की ज़मीन बेच कर कर्ज़ भी चुका दूंगा और बेटी की शादी के लिए भी कुछ पैसे बच जायेंगे।"
भाइयों ने उसकी बात को तवज़्जो नहीं दी। उल्टे कहा-"कल पंचायत बैठ जाये। जो पंचों का फ़ैसला होगा वही मान्य होगा।"
दूसरे दिन पंच बैठी। नन्हकू को अपनी बात कहने का पहले मौका दिया गया। नन्हकू ने सारी बात विस्तार से कही और फ़रियाद की कि ज़मीन बांट दी जाये ताकि वह कर्ज़ से मुक्त हो जाये। और वह ज़मीन का बंटवारा भी वह इसलिए चाहता है क्योंकि दोनों भाई पिता के अन्तिम संस्कार में खर्च हुई राशि में से अपना हिस्सा नहीं दे रहे हैं।
भाइयों ने जो दलील दी उसे सुनकर उसे काठ मार गया। वह चुपचाप उठा। अपना समान उठाया और गांव से निकल गया। उसके बाद नन्हकू गांव में कभी नहीं लौटा।
भाइयों का पंचों के सामने कहना था-"पिता के अंतिम संस्कार में जो रुपये लगे हैं वे क्यों दें आख़िर उनके पिता ने पूरी ज़िन्दगी नन्हकू को पाला-पोसा है। उसे शहर में ले जाकर नौकरी भी दिलायी है। क्या उसके एवज में नन्हकू को कुछ नहीं करना चाहिए? रहा ज़मीन-जायदाद में हिस्से का सवाल, तो नन्हकू तो उनका भाई है ही नहीं। नन्हकू की मां विवाह से पहले ही उसे अपनी कोख में ले आयी थी। नन्हकू उनका भाई नहीं है और ना ही उनके पिता की औलाद। वह नाजायज औलाद है। उसका हक़ कैसा?"
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4 टिप्‍पणियां:

हिमान्शु मोहन ने कहा…

मार्मिक, बहुत अच्छी बुनावट और ज़िन्दा कथानक। बस संवादों की कमी खलती है - जो इसे एक किस्सागो की ज़ुबानी बयान होने का आभास देती है - और इसी नाते दर्द-टीस का अहसास थोड़ा कम सा हो जाता है।
शैली बदल कर आपबीती होती तो?
मैं कथाकार नहीं हूँ - अधिकारी नहीं ऐसी टिप्पणी करने का, इस धृष्टता के लिए क्षमा करें। बस एक पाठक होने के नाते जो लगा सो कह दिया - शिल्प पर मेरा अधिकार नहीं। आभार अच्छी प्रस्तुति के लिए!

डॉ.अभिज्ञात ने कहा…

मोबाइल फोन पर एसएमएस से मिली प्रतिक्रिया
हैलो सर,
गुड इवनिंग। आई रीड यूवर स्टोरी 'नाज़ायज़' इन पाखी विशेषांक। इट इज़ अ वैरी हार्ट टचिंग स्टोरी. आई फील. थैक्स सर
फ्राम
अनुपम चौहान
आईटी इंजीनियर (इटावा)
+918899152522

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मार्मिक कहानी....

आपके रही सही ब्लॉग पर कमेन्ट पोस्ट नहीं हो रहे हैं

अमलेन्दु उपाध्याय ने कहा…

राजनैतिक, आर्थिक, संस्कृतिक मुद्दो और आम आदमी के सवालो पर सार्थक हस्तक्षेप के लिये देखें
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