9/20/2011

विलास गुप्ते का जाना

विलास गुप्ते के निधन से हिन्दी कहानी ने अपना एक महत्वपूर्ण स्तम्भ खो दिया है। जिन दिनों मैं इंदौर में था उनसे कुछेक मुलाकातें होती रहीं। वे मुझसे मिलने वेबदुनिया के कार्यालय भी आये थे। वह रविवार का दिन था। मुझे याद है उस दिन हमारी खासी गपशप हुई थी जिसके बाद तो मैंने लगेहाथ उनका एक इंटरव्यू भी ले लिया था जो वेबदुनिया के साहित्य चैनल में प्रकाशित हुआ था। मीडिया में उनके निधन की खबर पाकर मन काफी मायूस हुआ और मन नहीं मानता है कि उनसे अब कभी मुलाकात नहीं होगी। उनके व्यक्तित्व की सादगी ने मुझे मोह लिया था। उनकी बातचीत और सोचने के लहजे में गंभीरता थी लेकिन वह आक्रांत नहीं करती थी। वह हमसे संवाद स्थापित कर लेती थी।
उनकी मृत्यु का समाचार इस प्रकार है जिसमें उनका जीवन परिचय है। आप भी देखें-
इंदौर। हिंदी कहानियों के सशक्त हस्ताक्षर विलास गुप्ते का बीमारी के बाद गत बृहस्पतिवार को यहां निधन हो गया। वह 74 साल के थे। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि गुप्ते ने तडके एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान आखिरी सांस ली। उन्हें मांसपेशियों की बीमारी के चलते करीब 20 दिन पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया था। छ: सितंबर 1937 को ग्वालियर में जन्मे गुप्ते की साहित्यिक रचनाओं की करीब 10 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। इनमें कहानी संग्रह, उपन्यास और नाटक शामिल हैं। उनके लिखे नाटक आदमी का गोश्त व आपके कर.कमलों से खूब मशहूर हुए और देश के कई शहरों में इनका मंचन किया गया। गुप्ते को अलग-अलग पुरस्कारों से सम्मानित किया गया और राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में छपी उनकी कहानियां बेहद सराही गईं। गुप्ते का तिलक नगर श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उन्हें उनके बेटे अभिनव ने मुखाग्नि दी।
उनके नाटक-"आदमी का भूत" और "आपके कर कमलों से" काफी लोकप्रिय हुए। विक्रम विवि ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया था। गुप्ते हिन्दी के व्याख्याता पद से सेवानिवृत्त होने के बाद पूरी तरह साहित्य सृजन में लगे रहे। इससे पूर्व उन्होंने समाजसेवा पत्रिका में संपादन का कार्य भी किया था।

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