पुस्तकों का प्रकाशन विवरण
- लेखकों के पत्र
- कहानी
- तीसरी बीवी
- कला बाज़ार
- दी हुई नींद
- वह हथेली
- अनचाहे दरवाज़े पर
- आवारा हवाओं के ख़िलाफ चुपचाप
- सरापता हूं
- भग्न नीड़ के आर पार
- एक अदहन हमारे अन्दर
- खुशी ठहरती है कितनी देर
- मनुष्य और मत्स्यकन्या
- बीसवीं सदी की आख़िरी दहाई
- कुछ दुःख, कुछ चुप्पियां
- टिप टिप बरसा पानी
- मुझे विपुला नहीं बनना
- ज़रा सा नास्टेल्जिया
- कालजयी कहानियांः ममता कालिया
- कालजयी कहानियांः मृदुला गर्ग
2/27/2025
पैरोकार साहित्य उत्सव
साभारः राजस्थान पत्रिका, कोलकाता
साभारः अखबार ए मशरिक़, कोलकाता
साभारः दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता
साभार-जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ
साभारः जलते दीप, जोधपुर
सदीनामाः कोलकाता
साभारः इंफो इंडिया, कोलकाता
भाटपाड़ा उत्सव में बहुभाषी कवि-सम्मेलन में दिखा कौमी एकता का रंग
साभाऱः आवामी न्यूज़, कोलकाता
साभारः जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ
साभारः वर्तमान पत्रिका, कोलकाता
साभारः स्टेट रिपोर्टर, श्रीनगर
2/18/2025
अभिज्ञात के कहानी संग्रह 'मनुष्य और मत्स्यकन्या' के लोकार्पण के अवसर पर सम्बोधित करते डॉ.ऋषि भूषण चौबे
'भारतीय भाषा परिषद' कोलकाता में 31 जनवरी 2915 को अभिज्ञात के कहानी संग्रह 'मनुष्य और मत्स्यकन्या' का लोकार्पण प्रख्यात चिन्तक एवं शिक्षाविद् प्रो.डॉ.पल्लव सेनगुप्त ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बांग्ला के नामचीन कथाकार डॉ.रामकुमार मुखोपाध्याय। ने की। इस अवसर पर मुखोपाध्याय ने 'रवीन्द्रनाथ टैगोर के मृत्यु एवं परामृत्यु दर्शन' विषय पर व्याख्यान दिया। समारोह में इस कहानी संग्रह की एक कहानी 'इस तरह से आती है मौत' व कहानियों पर चर्चा करते डॉ.ऋषिभूषण चौबे। डॉ. शंभुनाथ ने भी इस संग्रह की कहानियों की चर्चा की।
अभिज्ञात के रूप में कहानी का फिर एक तारा चमका है- संजीव
कोलकाता- अभिज्ञात के रूप में कहानी का फिर एक तारा चमका है। एक जीवंत कथाकार की पुस्तक "तीसरी बीवी" के लोकार्पण में मैं खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। वे उम्र में छोटे हैं, लेकिन उनके अनुभव की एक बड़ी दुर्जेय दुनिया है जो उनके डेग और डग को विरल और विशिष्ट बनाती है। यह कहना है प्रख्यात कथाकार और हंस के कार्यकारी संपादक संजीव का। भारतीय भाषा परिषद सभागार में 6 अप्रैल 2010 मंगलवार की शाम अभिज्ञात के कहानी संग्रह "तीसरी बीवी" का लोकार्पण करते हुए उन्होंने यह बात कही।
संजीव ने कहा कि मैंने उनकी दो कहानियां हंस में छापी हैं। उनकी कहानियों के जो पारिवारिक दायरे हैं उनमें द्वंद्व के नये क्षेत्र, आस्था के नये बिन्दु हैं। उन्होंने समकालीन कथासंसार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे धन्य हैं जो प्रयोग के लिए प्रयोग और कला के कला का सहारा लेते हैं। पुनरुत्थानवाद फिर आ गया है जिसके परचम लहराये जा रहे हैं। नये कथाकारों की फौज़ आयी है। भाषा के एक से एक सुन्दर प्रयोग हो रहे हैं। अगर अपनी आत्ममुग्धता को सम्भाल लें तो बहुत है। अभिज्ञात की राह उनसे अलग है। मेरे पास हंस में प्रकाशनार्थ रोज दस से बाहर कहानियां आती हैं। भूमंडलीकरण का प्रकोप मुझ पर भी पड़ा है और कनाडा से लेकर स्पेन तक से फ़ोन आते हैं कि मुझे बताइये मेरी कहानी क्यों नहीं छपेगी। मैं विनम्र निवेदन करता हूं कि साहित्य कूड़ेदान नहीं है। इसमें युयुत्सा व घृणा के लिए जगह नहीं है। मैं कहता हूं साहित्य की शर्त पर आओ। लोग पूछते हैं तो शर्त बतायें क्या शर्त है साहित्य की। मैं कहता हूं-एक ही शर्त है साहित्य की, वह है उदात्तता। वह नहीं है तो शर्त पूरी नहीं होती। अभिज्ञात ने धीमे अन्दाज में उधर कदम बढ़ाये हैं। धन्यवाद के पात्र हैं। क्रेज़ी फ़ैण्टेसी की दुनिया, मनुष्य और मत्स्यकन्या, देहदान जैसी कहानियां बिल्कुल निराले अन्दाज़ की कहानियां हैं। 'कॉमरेड और चूहे' कहानी में लाश को टुकड़े-टुकड़े काटकर बेच दिया जाता है और बता दिया जाता है कि लाश को चूहे खा गये। संजीव ने कहा कि दलित, नारी, शोषण तक कहानी का दायरा सिमटा हुआ था। अभिज्ञात ने दायरे का विस्तार किया है। आस्मां और भी हैं। उनसे मुक्त नहीं हो सकते। पीछे मुड़ के मत देखिये। द्वंद्व, आस्था के नये दिगंत खोले हैं। नये अनछुए दिगंत खोले हैं। कहानी में बिम्ब कैसे बनते हैं और किस प्रकार के निर्वाह से वे अलंकरण नहीं रह जाते इसका निर्वाह बड़ी कला है। इससे भाषिक संरचनाएं दीर्घजीवी हो जाती हैं। अभिज्ञात जी ने विज्ञान को लेकर मिथ बनाया है। कैसे मिथ बनता है यह उनकी कहानी में देखने लायक है।
कार्यक्रम की शुरुआत हितेन्द्र पटेल के वक्तव्य से हुई। उन्होंने कहा तीसरी बीवी की कहानियों पर कहा कि वे कई बार असुरक्षित परिवेश में रह रहे लोगों की ज़िन्दगी से अपनी कहानियां एक संवेदनशील तरीके से उठाते हैं। "उसके बारे में" कहानी ऐसी ही कहानी है। जिसमें दर्द के रिश्ते की शिनाख्त की गयी है। असुरक्षित होते लोगों की बेचैन कहानियां ऐसी हैं जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होनी चाहिए। जबकि "क्रेजी फैंटेसी की दुनिया" इससे भिन्न एक क्लासिक फलक वाली है। इन कहानियों में वह तत्व है जिसे निर्मल वर्मा के शब्दों में "मनुष्य से ऊपर उठने का साहस" कहा है।
जीवन सिंह ने कहा कि क्रैजी फैंटेसी की दुनिया में कहा गया है कि शासन बदलता है लेकिन तंत्र नहीं बदलता। यह वस्तुस्थिति की गहरी पड़ताल से उन्होंने जांचा परखा है। लेखक जिन स्थितियों में जी रहा है उससे लिखने की रसद कैसे प्राप्त करता है उसका उदाहरण कायाकल्प जैसी कहानियां हैं। अभिज्ञात की "जश्न" जैसी कहानियों में एक विद्रोह है, जो थमना नहीं चाहता है, नजरुल की तरह-"आमी विद्रोही रणक्रांत"। अरुण माहेश्वरी ने कहा कि "तीसरी बीवी" संग्रह की कहानियां पढ़कर राजकमल चौधरी की याद आती है। इन्हें पढ़कर एक गहरा व्यर्थताबोध, डिप्रेशन पैदा होता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ बंगला कवि अर्धेन्दु चक्रवर्ती ने की। कार्यक्रम का संचालन भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ.विजय बहादुर सिंह ने किया।
2/09/2025
गजल संग्रह 'तीरगी में रौशनी' का लोकार्पण
'चमकता आसमां का हर सितारा चाहिए मुझको'
कोलकाता : कृत्रिम मेधा जैसे चुनातीपुर्ण विषयों पर अपनी पुस्तकों से चर्चा में रहे पर डॉ. सुनील कुमार शर्मा अब अपने गजल संग्रह 'तीरगी में रौशनी' के लिए चर्चा में हैं। संग्रह का लोकार्पण अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला में वाणी प्रकाशन के स्टाल पर हुई। इसे दौरान हुई परिचर्चा में डॉ. शर्मा ने अपनी गजलें भी सुनायीं। उनकी एक गजल का शेर यूं था-'मुझे पहले यूं लगता था सहारा चाहिए मुझको/मगर अब जा के समझा हूं किनारा चाहिए मुझको।' परिचर्चा में डॉ. शंभुनाथ, डॉ.अभिज्ञात, रामनिवास द्विवेदी, मृत्युंजय श्रीवास्तव, आदित्य गिरि, सुषमा कुमारी और रुपेश कुमार यादव ने हिस्सा लिया। अध्यक्षीय वक्तव्य में रामनिवास द्विवेदी ने कहा कि सुनील जी ने अपने ग़ज़लों में जीवन की विविधताओं को शामिल किया है। डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि इनकी कई ग़ज़लें व्यक्ति सत्य से बाहर के सच को देखने की एक कोशिश है। मृत्युंजय श्रीवास्तव ने कहा कि ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जो स्वयं ख़ुद को संप्रेषित करती है, इसके लिए किसी आलोचक की ज़रूरत नहीं पड़ती। डॉ.अभिज्ञात ने कहा डॉ.शर्मा इश्क के जरिये विषय वस्तु में प्रवेश करतें हैं और शायरी को दर्शन की ऊंचाई तक ले जाते हैं। उन्होंने संग्रह के कुछ शेर सुनाये-'अगर दुनिया से भी लड़ना पड़े तो मैं अकेला ही/लड़ूंगा बस तुम्हारा इक इशारा चाहिए मुझको/जो मेरा चांद है उसको सजाने के लिए हर दिन/चमकता चांद का हर इक इशारा चाहिए मुझको।' आदित्य गिरि ने कहा की इनमें शोषित व्यक्ति की पीड़ा है। शोधार्थी सुषमा कुमारी ने कहा कि समकालीन प्रासंगिकता का दस्तावेज है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि ग़ज़लें प्रेम और प्रतिरोध का आख्यान है। मधु सिंह ने सुनील जी की एक गजल का पाठ किया। इस अवसर पर विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रमोद कुमार प्रसाद, प्रो. संजय यादव, अनिल शाह, कंचन भगत, कुसुम भगत, सहित अन्य साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन वाणी प्रकाशन के दिनेश कुमार सिंह ने दिया।
नवभारत, भोपाल, 09.02.2025
जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ, 09.02.2025
विश्वामित्र दैनिक, 09.02.2025
छपते छपते, 09.02.2025
वर्तमान पत्रिका, 09.02.2025
सदस्यता लें
संदेश (Atom)