3/08/2011

शलभ श्रीराम सिंह के पत्र अभिज्ञात के नाम





एक
शलभ श्रीराम सिंह, मसोढ़ा (सैदही) फैज़ाबाद, उप्र,पिन-224183
19.91.2004
प्रिय श्री,
12.11.91 का कार्ड. हां यह सच है कि मैंने काफ़ी दिनों से तुम्हें पत्र नहीं लिखा. कारण केवल अव्यवस्थित दिनचर्या और वह बहुत कुछ जो तेज़तर रफ़्तार वाली ज़िन्दगी के लिए परेशानी का कारण बन जाता है आदि आदि...
मैं फ़िलहाल तुम्हारे एक लम्बे पत्र का इन्तज़ार कर रहा हूं. इस बीच बाबा (नागार्जुन) का कई बार बुलावा आ चुका है, बुलावा विजय (विजय बहादुर सिंह) का भी आ रहा है, कलकत्ता से कल्याणी (कल्याणी सिंह) का बुलावा और अब तुम्हारा पत्र। इस बीच ढेर सारे मित्रों की मौत और..
मेरी एक क़िताब ‘ध्वंस का स्वर्ग’ दिल्ली के मानक पब्लिकेशन रूम न.111 3ए, सावरकर पार्क, मधुवन, शकरपुर, दिल्ली से आयी है। पुस्तक मुझ तक नहीं पहुंची है. यह केवल सूचनार्थ. इलाजी (डॉ. इला रानी सिंह) के क्या समाचार हैं? भाई सकलदीप सिंह कैसे हैं? अलखनारायण की मौत कैसे हुई? उनके लिखे साहित्य के प्रकाशन की क्या कोई योजना बनायी जा सकती है? कलकत्ता में और क्या-क्या हो रहा है, खबर देना. बहू को आशीर्वाद, बच्चों को प्यार.
सस्नेह तुम्हारा
शलभ

दो
विजय निवास
48 स्वर्णकार कालोनी मार्ग, विदिशा,मप्र-464001
1991.4.10
प्रिय श्री
मेरा एक कार्ड मिला होगा. ‘युद्ध, युद्धबोध और युयुत्सा’ शीर्षक मेरा एक आलेख तुम्हारे पास पड़ा होगा. यदि उसका उपयोग किसी कारण से न हो पा रहा हो तो उसे मेरे पास (फोटो स्टेट भी चलेगा) भेज दो. उसकी ज़रूरत है.
एक क़िताब ‘पृथ्वी का प्रेम गीत’ मेरी, विजय बहादुर और नरेन्द्र जैन की कविताओं का आया है. समय से पहुंचेगा. तुम्हारी प्रति कल्याणी जी के पते पर ही जायेगी.
शलभ
पुनश्चः
एकान्त श्रीवास्तव आये थे पिछले दिनों. उनसे भी तुम्हारे बारे में बातचीत हुई। कविताएं और अन्य सामग्री शीघ्र भेज दो. एक अच्छी काव्य-पत्रिका पर भी विचार हो रहा है. शीघ्र ही कार्यान्वित होगा. विजय की ओर से भी शुभकामनाएं. घर में सबको यथायोग्य.
सस्नेह. शलभ

तीन
विजय निवास, 48,स्वर्णकार कालोनी मार्ग, विदिशा, मप्र-464001
1991.3.3
प्रिय श्री
मसोढ़ा के पते पर भेजा गया कार्ड और विदिशा के पते पर प्रेषित दूसरा कार्ड एकाधिक दिनों के अन्तराल में क्रमशः यहीं मिले.
-जैसा कि आप जानते हैं कि तीनों लेख, कलकत्ता में रहते हुए मैंने आप द्वारा प्रेरित होकर ही लिखे हैं, इसीलिए उन पर आपका भी उतना ही अधिकार है जितना मेरा या कल्याणी या सकलदीप सिंह, कालिका प्रसाद और एकान्त श्रीवास्तव का. बावजूद इसके उनको लेकर की गयी मेहनत के मद्देनज़र क्या उनका व्यवस्थित ढंग से प्रकाशन समीचीन नहीं है? वे शीघ्र ही छपेंगे.
-एक बात जो आप से ख़ास तौर से कहनी है वह यह कि प्रकाशन को लेकर उतावलेपन का परिचय न दें. अभी किसी भी तरह की पुस्तिका की आवश्यकता नहीं है. आप कलकत्ते में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने की आकुलता के शिकार क्यों हैं? अभी तो आपके पहले संग्रह पर ही क़ायदे से बात नहीं हो पायी है. आप लिखिए. लिखिए...
-स्वास्थ्य मेरा पहले से बेहतर है. डॉ.विजय बहादुर सिंह की देख रेख में मैं अपने ढंग से जी और लिख रहा हूं. कुछ कविताएं और लिखी गयी हैं.
कल्याणी जी दूरदर्शन पर आपसे मिलीं अच्छा लगा जानकर. शेष शुभ शुभेच्छान्ते.
शलभ श्रीराम सिंह
(आज बाबा भी पहुंच गये हैं)

चार
मसोढ़ा (सैदही), फ़ैज़ाबाद, उप्र-224183
1991-1-17
प्रिय श्री
7 जनवरी का कार्ड मिला. लगता है डाक की गड़बड़ी के चलते चिट्ठियां इधर से उधर हो रही हैं। पुस्तिका मिल गयी है. पूर्वार्द्ध उत्तरार्द्ध के मुकाबले कमज़ोर है. अपने सम्पूर्ण प्रभाव में भी कविता आधी-अधूरी ही जान पड़ती है. ऐसा अभ्यास और अनुभव के अभाव के कारण है. इससे सहमत होने में बहुत दिक्कत नहीं होनी चाहिए.
-इरा का अंक नहीं मिला. कलतिया पत्रकारिता की ज़िम्मेदार परम्परा अब समाप्त हो चुकी है इसीलिए यह सब होना ही चाहिए..
-समय संदर्भ और नया संदर्भ जैसी पत्रिकाओं के लिए लिखने वाले लेखकों की स्थिति बहुत सम्मानित नहीं समझी जाती है और मुझे अपने सम्मान की थोड़ी-बहुत चिन्ता बराबर रही है. गाली गलौज और कीचड़ उछालू लेखन से साहित्य की परम्परा को धक्का लगता है और ये पत्रिकाएं अपनी सीमाओं में इससे आगे नहीं बढ़ पायी हैं.
-कल्याणी जी के पास पड़े लेख मैंने अपने लिए, अपनी ज़िम्मेदारियों के तहत लिखे हैं, उन्हें किसी पुस्तक में सुविधानुसार प्रकाशित होना है. मूल्यवत्ता की दृष्टि से भी उन्हें इसी रूप में छपना चाहिए. क्यों?
-पत्र अवश्य दिया करो. पत्र न आने से मुझे चिन्ता होती है. इधर कुछ कविताएं और लिखी गयी हैं. स्वास्थ्य मेरा पहले से बेहतर है.शायद अभी कुछ दिन और यहीं रहना पड़े. शेष यथावत्. घर में बच्चों को स्नेह और आशीर्वाद रहे.
सप्रेम-शलभ श्रीराम सिंह

पांच
विजय निवास, 48 स्वर्णकार कालोनी मार्ग, विदिशा, मप्र-464001
1991.3.31
प्रिय श्री,
तुम्हारा 14-3-91 का कार्ड. महाराष्ट्र यात्रा के दौरान तुम नागपुर में भाऊ (चित्रकार भाऊ समर्थ) से मिले. 24 को भाऊ का देहावसान हो गया. यह सूचना अब तक तुम्हें मिल चुकी होगी. वह अपनी तरह का अकेला आदमी था. दोस्त और दुश्मन दोनों शक्लों में एक कद्दावर इंसान. अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराओ. दर्ज कराओगे तो मुझे अच्छा न लगेगा.
मैंने लिखा था-अपनी 25 कविताएं, परिचय, कविता पर वक्तव्य और एक छायाचित्र भेज दो. लेकिन ऐसी चुप्पी साधे हुए हो, जिसका जवाब नहीं. क्या बात है? जहां तक तुम्हारी बात है, एकान्त, कालिका और ब्रजेमोहन की बात है, मैं अपनी सीमाओं में पूरी तरह ज़िम्मेदारी के साथ बात करता हूं, करूंगा औरों की नहीं जानता. तुम चिन्ता न करो मेरे लिखे को लेकर. वह शब्द-शब्द छपेगा. तुम तो कविताएं और कविताएं लिखते रहो. शीघ्र ही एक किताब तुम्हारे पास जायेगी. देखना, विनोद के लिए बुरी नहीं होगी. बाबा (नागार्जुन जी) दिल्ली गये. त्रिलोचन, वेणुगोपाल, भगवत रावत और कुछ अन्य मित्र एकाधिक दिनों में विदिशा में होंगे. विजय बाबू की शुभेच्छाएं स्वीकार करो. घर में सबको यथायोग्य.
शलभ श्रीराम सिंह
कवि मृत्युंजय उपाध्याय का पता? मेरे डाकडर बाबू ( डॉ. शंभुनाथ) कैसे हैं? ब्रजमोहन और एकान्त के संग्रह भी आने वाले हैं।

छह
मसोढ़ा, सैदही, फ़ैज़ाबाद उप्र-224183
1990.8.1
प्रिय श्री
इससे पूर्व मेरा एक पत्र आपको मिला होगा. मेरे प्रकाशित आलेखों और कविताओं की कटिंग एक लिफ़ाफ़े में डालकर भेज दें. ‘प्रतिकविता की पृष्ठभूमि’ निबन्धों की किताब का नाम कैसा लगा आपको? सकलदीप सिह को मेरा नमस्कार कहें. आशा है आपकी लिखाई पढ़ाई चल रही है. बहू को आशीर्वाद. बच्चों को प्यार. सानंद होंगे. शलभ

सात
मसोढ़ा, सैदही, फ़ैज़ाबाद उप्र-224183
1990.11.27
प्रिय श्री,
पत्र आपका मिला. 'समकालीन संचेतना' का कथा पर केन्द्रित अंक भी. अपने संक्षिप्त कलेवर में यह अंक महत्वपूर्ण और उपयोगी है. आलोचना पर केन्द्रित अंक के लिए मैं शीघ्र ही कुछ भेजूंगा. अच्छा लगने पर काम में ले लीजिएगा अन्यथा अपनी फाइल के हवाले कर दीजिएगा. किताब आपकी अब तक नहीं पहुंची. सकलदीप भाई कैसे हैं घर में सब को यथायोग्य.
सस्नेह.शलभ श्रीराम सिंह

आठ
विदिशा 454001, 48, स्वर्णकार कालोनी मार्ग
1992.8.17
प्रियवर,
मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही कि आप इन दिनों कर क्या रहे हैं? न कोई ख़त न ख़बर. कलकत्ते में इन दिनों क्या हो रहा है? ज़रा उस शहर से पूछो-'भूलने वाले तुझे भी याद क्या आता हूं मैं?' कुमारेन्द्र जी को लेकर आपके मन में कोई योजना कोई विचार आया है? मेरे कवि मित्र और कठिन समय के साथी श्री मृत्युंजय उपाध्याय कुछ कर रहे हैं उनका हाथ मज़बूत किया जाना चाहिए. बहुत हुई साहित्यिक स्पर्धा एक-एक कर लोग चले जा रहे हैं, जो बचे हैं उनके साथ अब प्यार से रहने में ही भलाई है? इला जी कैसी हैं? नवल के क्या हाल हैं? डॉक्टर बाबू का क्या समाचार है? 'कोण' की योजना का क्या हुआ?
अपने समाचार दें. बहू को आशीष बच्चों को प्यार. बेलूर जाकर एक बार वहां की भी विस्तृत जानकारी दो, चिन्तित हूं-शलभ

नौ
रामकृष्ण ग्रंथालय, सावित्री सदन, तिलक चौक, विदिशा, मप्र.464001
14.2.1993
प्रिय श्री
तुम्हारी चुप्पी का मतलब समझ में नहीं आ रहा है. तुम स्वस्थ सानंद होगे. तुम्हारी काफी पहले भेजी गयी कविताओं को उपयोग में लाने का समय आ गया है. 'उत्तर संवाद' निकाल रहा हूं.और हां, समकालीन परिदृश्य की पड़ताल करते हुए ज़रूरत हो तो बंगला कविता को सामने रखकर एक लम्बा लेख (सतर्क भाव से विश्लेषणपरक) लिखकर भेज सकोगे तो मुझे अच्छा लगेगा.
शलभ श्रीराम सिंह

दस
विजय निवास, 48 स्वर्णकार कालोनी मार्ग,विदिशा-मप्र-464001
1992.4.6
प्रिय श्री
'सरापता हूं' की दो प्रतियां पहुंचीं. क़िताब मुझे जैसे नारकीय नराधम को समर्पित करके जो बोझ तुमने मुझ पर डाला है, उसे उठा पाने की क्षमता मुझ में कहां है. कविताएं अच्छी हैं. सकलदीप भाई कैसे हैं. घर में सबको यथायोग्य. सस्नेह-शलभ श्रीराम सिंह
तीन चार दिन पहले ही आया हूं विदिशा.

ग्यारह
मसोढ़ा सैदही, फ़ैज़ाबाद, उप्र-224183
1990.8.25
प्रिय श्री
13 अगस्त 90 का कार्ड. आपने मेरा पता खोया, डाकखाने ने आपके नाम लिखा गया मेरा पहला पत्र. अख़बार मिल गया. कुछ अध्यापक मित्र उसे पढ़ रहे हैं. शमशेर की कविता पर आपकी टिप्पणी ठीक रही. सकलदीप सिंह का लेख भी रोचक है. इस बीच कालिका प्रसाद सिंह की एक किताब आयी है. देख मैं भी नहीं सका हूं. आपकी किताब छप गयी है यह जानकर अच्छा लगा. गांव में रहकर केवल स्वास्थ्य लाभ कर रहा हूं. दिल्ली से कुछ मित्रों का बुलावा आया है लेकिन अभी प्रस्थान की मानसिकता नहीं बन पा रही है. घर में सब को यथायोग्य.कभी बेलूर जाइये. अपने समाचार दें. सस्नेह.शलभ

बारह
रामकृष्ण प्रकाशन, सावित्री सदन, तिलक चौक,विदिशा-मप्र-464001
1996.1.4
प्रिय अभिज्ञात,
तुम्हें भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता. प्रिय श्री पलाश (विश्वास) को लिखे गये प्रायः सबी पत्रों में तुम्हें याद करता रहा हूं. तुम्हारा नया पता अब मिला तो यह पत्र.तुम्हें जो पाण्डुलिपि भेजनी हो तैयार करके भेज दो. छपेगी.
और हां, क्या शलभ श्रीराम सिंह की कविताओं पर कोई आलेख तैयार है या हो सकता है यदि हां तो उसे श्री विजय कान्त को भेज दो. वे 'पुरुष' का एक शलभ केन्द्रित अंक निकाल रहे हैं. उनका पता है-श्री विजय कान्त, सम्पादक-पुरुष, निराला नगर, गोशाला रोड, मुज़फ्फ़रपुर, बिहार.
तुम चाहो तो व्यक्ति और कवि शलभ को मिलाकर भी कुछ लिख सकते हो. प्रतिभा और बच्चों को आशीर्वाद कहो. सस्नेह.शलभ श्रीराम सिंह
तुम्हारा
पलाश की पत्नी की तबीयत कैसी है अब उनका उपन्यास तैयार हो गया हो तो कहो पाण्डुलिपि भिजवाएं. कहानी संग्रह तो छपेगा ही। कलकत्ता का समाचार सविस्तार दो.
श.
हमारे डॉक्टर बाबू कैसे हैं? मेरा आशय शंभुनाथ जी से है और भाई श्रीनिवास जी (शर्मा) और सकलदीप जी कैसे हैं? सकलदीप जी का पता क्या है?
श.
'उत्तर संवाद' के लिए उनके कोई आलेख भिजवाओ. कविताएं भी।

तेरह
विजय निवास
48. स्वर्णकार कालोनी मार्ग, विदिशा. म.प्र. 464001
1991.5.17
प्रिय श्री, तुम्हार कार्ड 20, मई, 91 की अग्रिम तारीख़ के साथ मिला. बेलूर मैं ख़त लिखता हूं. किताब अभी बाइण्ड नहीं हो सकी है. तैयार होते ही जायेगी. तुम संग्रह में शामिल होओ. यदि तुम्हारे माध्यम से लोग भूमिका मुझसे लिखवाना चाहते हैं तो वह भी होगा लेकिन उसमें एक शब्द भी इधर-उधर नहीं होना चाहिए. तुम्हारी कविताएं मिल गयी हैं. तुम्हारे साथ एकान्त, कालिका, ब्रजमोहन और एक कविता लेखिका, वह अर्चना वर्मा या कोई और भी हो सकती है.
सस्नेह
-शलभ
वि.ब. दिल्ली गये हुए हैं। श.
भूमिका के लिए छपे हुए फर्मे ही आने चाहिए.
कोण को सहयोग दूंगा.

1 टिप्पणी:

धर्मेन्‍द्र पारे ने कहा…

शलभ श्रीराम सिंह के पत्र पढकर मेरी भी बहुत सी यादें ताजा हो गई । उनके विषय में विस्‍तार से पढने को मिलेगा तो खुशी होगी । धर्मेन्‍द्र पारे हरदा मध्‍यप्रदेश