11/25/2015

मेरा नया उपन्यासः कुछ अंश

उपन्यास
-अभिज्ञात

पहला एहसास, जो प्यार कत्तई नहीं था


पूजा चली गयी। मोहित और उसका छोटा भाई रज्जू दूर तक उस रास्ते पर निकल आये जिससे होकर जीप स्टेशन गयी थी। इस उम्मीद से कि शायद पूजा ने कोई फूल अपने जूड़े से निकाल कर रास्ते में गिरा दिया हो ताकि जब वे  रास्ते से गुज़रें तो पहचान लें कि यह फूल पूजा ने ही फेंका है। कुछ सोचकर। संभवतः इसलिए कि वह समक्ष आकर स्वयं नहीं दे पायी थी।
यो पूजा की यह पुरानी आदत है। वह मोहित को उसके हाथों में आज तक कोई फूल नहीं दे पायी है। वह अपने जूड़े का लगा फूल निकालकर ऐसी ज़गह रखे देती है जहां मोहित उसे अवश्य देख लेगा और वहां से उठा लेगा। यह आदत उसे यहां तक थी कि एक बार उसके हाथों में फूल देखकर मोहित ने मांगा था किन्तु उसने देने से स्पष्ट इनकार कर दिया था और चन्द क्षणों पश्चात ही जब मोहित कैंटीन पहुंचा तो एक टेबुल पर बीचोबीच एक ताज़ा फूल रखा हुआ था। ऐसा लगा मानों वह किसी विशेष प्रयोजन से रखा गया हो। जाने किस भावना के वशीभूत मोहित ने वह फूल उठा लिया और उसके होंठ सहस उसे चूम उठे। जाने क्यों उसे होंठों से लगाकर एक सुकून मिला दिल को। शायद उस गंध के कारण जो पूजा की सांसों मे बसी होती है।
बाद में मोहित को रज्जू ने बताया कि पूजा ने उसके सामने ही यह फूल वहां रखा था, व उसे छूने से मना किया था।

थके हारे कदमों से वे घर लौटे। रज्जू घर आकर क्रिकेट की बैट-बॉल लेकर खेलने निकल गया। उसके सिर फटा जा रहा था। पूजा को यह कॉलोनी छोड़कर। एक फैक्ट्री की यह कॉलोनी है जिसमें काम करने वाले लोग ही रहते हैं। इटली के एक आर्किटेक्ट ने बड़ी सूबसूरती से बनाया था इसे। आफिसर्स अपार्टमेंट, क्लर्क्स अपार्टमेंट और लेबर क्वार्टर्स तीनों ही तरतीब से नहीं बने थे बल्कि पूरी कॉलोनी में जगह जगह उद्यान थे। सड़क के किनारे तरह तरह के फूलों की क्यारियां बनी थीं। एक छोटा सा क्लब भी था दो कमरों वाला। एक में टेबुल टेनिस दूसरे में लाइब्रेरी। अधिकतर पत्रिकाएं और अखबार अंग्रेजी के थे लेकिन किताबें हिन्दी की थीं। जो साहित्य की थीं। वहां बैठकर पढ़ने की व्यवस्था थी। बरामदे में भी लोगों के बैठने की व्यवस्था थी और ताश तथा कैरम खेलने का इन्तज़ाम था। पास ही है बैडमिंटन कोर्ट और बॉलीवाल ग्राउंड। वहीं से दिखायी देती है स्टाफ केंटीन। वह भी विदेशी सजा-सज्जा वाला है। वहां बड़ा सा वाटर कूलर लगा है और वहां से गुज़रते हुए लोगों को अपनी ओर अनचाहे ही खींचता है अपनी प्यास बुझाने के लिए। इन्हीं स्थल पर बसी है पूजा की असंख्य यादें। यहां ओर मैगनीज को प्यूरीफाइ करने की एक फैक्ट्री है, जो अंग्रेजी राज में बनी थी। जिसे बाद में लगभग कबाड़ के भाव में एक भारतीय इंजीनियर ने खरीद लिया और उसकी साज-सज्जा को वैसे ही बरकरार रखने का अब तक प्रयास करता रहा। यहां तक कि नाम भी। इस कॉलोनी का मालिक कोई नार्बट था और उसने इस कॉलोनी का नाम ही नार्बट रख दिया था, वह नाम अब तक बरकरार रखा गय था। इंजीनियर कोलकाता से आया बंगाली भद्रलोक था, सो कलाप्रियता उसके स्वभाव का हिस्सा थी, जो यहां के कण-कण में दिखायी देती थी। और उसने इस खूबसूरत परिवेश को बरसों तक इसलिए बचाये रखा था कि दो प्यार करने वाले दिलों को एक खूबसूरत सी जगह की ज़रूरत होगी।
जब मोहित पहले पहल नार्बट आया था, उस समय एक चंचल, इठलाकर ठुमकती चलती सांवली बच्ची थी पूजा। आज दस वर्ष हो गये हैं मोहित को यहां आये। मेरी वजह से नार्बट छोड़कर जाना पड़ा है पूजा को। उसके मां-बाप ने बोझिल हृदय से हैदराबाद भेज दिया उसके मामा के पास।
अपने सत्रह-अठारह वर्षीय बेटी को अपने से ज़ुदा करना सहज नहीं होता। इस उम्र तक आकर वह यह एहसास दिलाने लगती है कि अब उसे और अधिक दिन मां-बाप के निकट नहीं रहना है। चन्द दिनों पश्चात ही उसे इन प्रियजनों को खुशी-खुशी त्यागकर एक नये संसार में प्रवेश करना है। इस घटना में उसे सबी अपने बेगाने हो जाते हैं और चन्द नितांत बेगाने अपने बन जाते हैं। इस बिछोह पूर्व की अवधि सुखद होती है सामान्यतः। लेकिन क्या करते पूजा के मां-बाप, बेटी को बदनामी से बचाने का कोई दूसरा कारगर उपाय भी तो न था उनके पास। पूजा बदनाम हो गयी थी। पूजा का नाम अब उसके नाम के साथ लिया जाता था, जहां-तहां चर्चाओं में।
प्रणय, जो कि समाज की दृष्टि में अपराध है। इस अपराध के भागीदार वे दोनों ही हैं। मोहित भी और पूजा भी। यह बात दीगर है कि उसका अधिकतम श्रेय मोहित को जाता है और न्यूनतम पूजा को। यों निश्चिंत तौर पर नहीं कह सकता कि इस भावना का जन्म हमारे दरम्यान कब हुआ, मगर हमारी नोंकझोंक काफी पुराने दिनों से चली आ रही है। दो-चार दिनों में हमारी नोंकझोंक झगड़े के कगार तक पहुंच जाती। परिणाम होता कि इन दिनों हमारे बीच बातचीत बंद हो जाती। फिर वही नोंकझोंक फिर वही झगड़े। यह सिलसिला चार-थह महीनों नहीं अपितु वर्षों का था। जहां तक अनुमान है हमारे प्रणय सम्बंधों को गठित करने में मंचों का अनन्य योगदान रहा है।
नार्बट में मनोरंजन के साधन बंधे बंधाये हैं। लोगों की दिनचर्या में क्लब है। सिनेमा देखने के लिए कंपनी की जीप से पास के बरौल टाउन जाना पड़ता है। स्कूल आदि भी वहीं हैं, जहां कंपनी की बस कॉलोनी में रहने वालों के बच्चों को लेकर जाती है। पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को कंपनी की ओर से कॉलोनी में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं जिसके कलाकार कर्मचारियों के बच्चे व दर्शक उनके परिजन हुआ करते हैं।
कलाकार पंद्रह-बीस दिन पहले ही तैयारियां शु डिग्री कर देते हैं। गाने, नृत्य व छोटी एकांकी तैयार की जाती है। यह कार्यक्रम शाम साढ़े छह से साढ़े नौ के बीच होते हैं।

मोहित को याद है पहली बार मोहित पूजा के साथ मंच पर उस समय उतरा था जब मोहित आठवीं में पढ़ता था और वह
सातवीं में। एकांकी का नाम "चश्मा" था। वह उन दिनों आठवीं के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता था। उसमें मोहित एक फिलासफर बना था। उसमें केवल एक ही नारी चरित्र था जिसे एक लड़की ने पहले ही हथिया लिया था। वह मराठी भाषी थी और लाख सावधानियों के बावज़ूद जानवर को जनावर कह बैठी थी। पूजा निराश थी कि एकांकी में उसे अभिनय का अवसर नहीं मिलेगा किन्तु मोहित ने उसका काम आसान कर दिया। एकांकी के निर्देशक सुनील धवन साहब को मोहित ने इस बात के लिए मना लिया कि एक पुरुष पात्र का रोल पूजा को दिया जाये। पूजा ने पहले तो ना-नुकुर की फिर मान गयी। धवन साहब कंपनी में एक अधिकारी थे। बड़े विनोदप्रिय थे। उन्होंने मूल एकांकी में कतिपय तब्दीलियां करते हुए अपने मन से संवाद जोड़ दिये थे जिससे अच्छा-खासा हास्य पैदा हुआ। रिहर्सल के दौरान उन्होंने नाटक में अभिनय के कई गुर सिखाये जिसमें ओभरएक्टिंग शामिल है। वे जीवन में आने वाली उन तमाम स्थितियों का अभिनय कर हमें समझाते रहे कि कैसे हालत में कैसा एक्सप्रेशन देना चाहिए। सामान्य अभिनय क्या है और उसे लाउड करके कैसे एक्सप्रेशन को उभारा जा सकता है। चूंकि नाटक का अभिनय परदे के अभिनय से अलग होता है इसलिए ओवरएक्टिंग की आवश्यकता होती है वरना वह मंच से दूर बैठे दर्शक को दिखायी ही न देगी। फिल्म व टीवी पर अभिनय के दौरान कैमरा चेहरे व शरीर की भंगिमाओं को करीब से कैच करता है इसलिए उसमें अभियन संतुलित होना चाहिए। हमारे लिए यह नयी रंगमंच की भाषा थी और वे अपने हर एक्सप्रेशन को ओवरएक्टिंग में बदलने में दिन रात जुटे रहते थे। छोटी खुशी का एक्सप्रेशन, अधिक खुशी से एक्सप्रेशन से कैसे अलग होगा हमें उन्होंने बताया। मुस्कुराना, हंसना और कहकहे लगाना तीनों में कितना फर्क है, उदास होना, आंसू बहाकर रोना, फूट-फूट कर रोना, चकित होना, घबरा जाना, सदमे की स्थिति में आना ही उनसे उन्होंने नहीं सीखा बल्कि केवल आवाज़ के जरिये विभिन्न भावों को कैसे व्यक्त किया जाये यह भी बताया। जब शरीर और आवाज़ दोनों अभिनय करने लगे तब बात बनती है। और बात तब अधिक इम्प्रेसिव होगी जब दूसरे के संवाद के दौरान प्रतिक्रिया देते रहना हो। उन्होंने जीवन के तमाम एक्सप्रेशंस को एक दूसरे के साथ सीखा। प्यार का पहला अहसास, प्यार में डूब जाने से कितना अलग है और अपने प्यार को खो देने की क्या भंगिमा होती है उन्होंने प्यार करने से पहुत पहले ही सीखा, उसका अभिनय किया और एक दूसरे को इसमें साझा किया। जब सुनील धवन साहब नहीं होते तब भी। अभिनय के यह गुर उन्होंने बाद में सीखे। चश्मा के मंचन के कुछ दिन बाद। दरअसल उसी दौरान रिहर्सल में हमें यह पता चला कि अभिनय उतनी आसान चीज नहीं है जितना उन्होंने सोचा था। इसमें बहुत कुछ सीखने और लम्बे समय तक उसके अभ्यास की आवश्यकता है। उन्होंने तय कर लिया था कि चश्मा हो जाये उसके बाद कभी लम्बी क्लासेस वे अभिनय की अटेंड करेंगे।
चश्मा में पूजा खूब जमीं पुरुष वेष में। उसने अपने बाल पीछे स्वेटर में डाल रखे थे। कुछ छोटी-मोटी गल्तियां भी हुईं जैसे कि उसे मुझसे टाइम पूछना था किन्तु घड़ी उसने पहनी थी मोहित ने नहीं। लेकिन उन्होंने रटे-रटाए ढंग से संवाद की अदायगी की।
पूजा के पास शर्ट नहीं थी। वह तीन बहनें ही थीं। पुरुष के नाम पर उनके घर में पिता थे, जो ड्यूटी से लौटने के बाद अपनी पूजा-पाठ में तल्लीन रहते। बेटियों से भी कम बात होती। इसलिए उन्हें न तो यह पता था कि उनकी बेटी नाटक में लड़के का रोल कर रही है, और ना ही इस तरह के किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाते थे। पूजा के लिए मोहित अपनी शर्ट ले गये था। मंच पर एनांसमेंट हो चुकी था हमारे नाटक का अब कलाकारों के नाम लिये जा रहे थे। और ग्रीन रूम का दरवाज़ा खोल पूजा ने मोहित को अंदर बुलाया। चेहरे पर मूंछ थी, लेकिन शर्ट की बटन बंद नहीं हो रही थी। मोहित ने कहा मोहित कोशिश करता हूं। इससे पहले कि वह कुछ कहती उसके हाथ बटनों तक पहुंचे चुके थे। मेरी कोशिश भी विफल रही उसके सीने का उभार कुछ अधिक ही था। इस कोशिश में उसके हाथ शर्ट के अंदर की गोलाइयों तक पहुंच गये थे। एक नर्म सुखद और अनजाने एहसास के बाद उसके बदन में एक सिहरन दौड़ गयी और शरीर उसके बाद भी काफी देर तक कांपता रहा। सांसें एकदम गर्म आती रहीं। लगा मोहित को तेज़ बुखार हो गया हो। नाटक के संवाद उसके मुंह से बड़ी मुश्किल से निकले थे।
खैर शर्ट के ऊपर एक-दो बटनों के न लगने की समस्या का निदान सुनील धवन के ढीले ढाले स्वेटर को पहन कर हल कर लिया गया।
यह प्यार का पहला अहसास था। बिल्कुल नहीं। यह एक नया एहसास था, अजाना। पर प्यार का कत्तई नहीं। यह तो कुछ और था। कुछ और ही। प्यार से एकदम अलग। जो धीमे-धीमे उसके जिस्म में सुलगने लगा था। मोहित ने वह शर्ट सहेज कर रख दी थी। काफी दिनों तक मोहित उसे पहन नहीं सका। वह उस समय सांतवीं कक्षा में पढ़ता था और  पूजा छठवीं में। सात-आठ महीने बाद जब पहना तो वह छोटा हो चुका था। शर्ट छोटा नहीं हुआ था, उसका जिस्म बड़ा हो गया था।
क्रमशः
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